प्रकृति से वैर पड़ रहा महंगा
विश्व के विकसित देश और समाज जहां प्रकृति के प्रति संवेदनहीन होकर मानव जनित वो तमाम सुविधाएं भोगते हुए स्वार्थी जीवन जी रहे हैं जो पर्यावरण के लिए घातक हैं। वहीं विकासशील देश भी विकसित बनने की होड़ में उसी रास्ते पर चल रहे हैं। यह भी स्पष्ट है कि आज विश्व समाज इनके प्रति बिलकुल गंभीर नहीं है जिसका खामियाजा प्राकृतिक आपदाओं के रूप में हमें भुगतना पड़ रहा है।


























