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    ऐसी बरसी सतगुरु की रहमत, छा गए इलमचंद इन्सां

    Ilamchand Insan

    एक वक्त शूगर के चलते मौत के मुहाने पर पहुंचकर हार गए थे हिम्मत

    ‘‘मुसीबतों से ही निखरी है
    इंसान की शख्सियत,
    जो चट्टानों से न टकराए
    वो झरना किस काम का।’’

    सरसा (सच कहूँ/सुनील वर्मा)। वयोश्रेष्ठ पुरस्कार से सम्मानित 84 वर्षीय युवा इलमचंद इन्सां पर ये पंक्तियां बिल्कुल सटीक बैठती हैं। इलमचंद इन्सां कहते हैं कि मेरा जीवन हमेशा से इतना खुशनुमा नहीं था। एक वक्त ऐसा था जब मैं शुगर के चलते बहुत ज्यादा गंभीर रूप से बीमार था, डॉक्टरों के पास जाता तो कोई कैंसर बताता तो कोई टीबी, ये सभी रिपोर्टें हैं मेरे पास। मुझे भी ये हो गया था कि अब तो मरने वाला ही हूँ, कब्र में पहुंचने वाला हूँ। तब पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने मुझे उस भयावह दौर से बाहर निकाला और मेरे अंदर आत्मविश्वास को जगाया।

    वे कहते हैं कि योगा, मैराथन सहित खेलों के प्रति मेरे अंदर जो ये जुनून है, इसे जगाने वाले मेरे पापा कोच पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ही हैं। आज बेशक मेरी जीत पर लोगों को आश्चर्य होता हो, लेकिन इन सब उपलब्धियों का श्रेय मेरे सतगुरु जी को ही जाता है।

    इलमचंद इन्सां ने बताया कि जब वो बेहद परेशान होकर पूज्य गुरु जी से मिले तो पूज्य गुरु जी ने उन्हें योगाभ्यास करने के लिए वचन फरमाया। इस पर हैरान होते हुए इलमचंद इन्सां ने कहा कि पिता जी (पूज्य गुरु जी) इस उम्र में योगा कैसे होगा? इतनी बुजुर्ग अवस्था में मेरी हड्डियां मुड़ेंगी कैसे? कहीं टूट तो नहीं जाएंगी। तब पूज्य गुरु ने वचन किया कि ऐसा कुछ नहीं होगा, आप योगा करो। पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि बेटा गर्भासन करना शुरू करो। तब इलमचंद इन्सां ने कहा कि पिता जी मैंने तो गर्भासन के बारे में सुना ही आज है। इसके बाद पूज्य गुरु जी के बताए अनुसार उन्होंने गर्भासन का अभ्यास शुरू किया।

    शुरू में थोड़ा मुश्किल हुआ, इसके बाद किताब आदि में पढ़कर योग के विभिन्न आसनों का अभ्यास की कोशिश की तो गर्भासन के साथ ही पदमासन भी लगना शुरू हो गया। पहले जहां आगे की ओर मुड़ने पर कमर में बहुत दर्द होता था, सब अपने आप ठीक होने लगा। हैरानी इस बात की थी कि जिस भी आसन को करता वो स्वयंमेव ही सही होने लग जाता। ये सब पूज्य हजूर पिता जी के वचनों का प्रताप था, जो ये सब करवा रहे थे। यहां तक कि सुमिरन करते-करते पश्चिमुक्तासन लगना भी शुरू हो गया।

    बड़े-बड़े हो जाते हैं हैरान

    इलम चंद इन्सां बताते हैं कि मैं जब भी शीर्षासन करता हूँ तो सभी लोग आश्चर्य करते हैं कि मैं इतनी देर तक कैसे इस मुश्किल आसन को कर पाता हूँ। क्योंकि बच्चे और युवा ये जानते हैं कि शीर्षासन को एक अंगुली पर करना, फिर दो अंगुली पर, एक हाथ से और उसमें घुमना चक्र बांधना आदि बहुत कठिन हैं, लेकिन मुझे इसमें बिल्कुल भी थकान नहीं होती। ये सब करवाने वाले पूज्य गुरु जी ही हैं।

    पूज्य गुरु जी ने दी जवान की उपाधि

    इलम चंद इन्सां कहते हैं कि पूज्य गुरु जी ने मुझे जवान की उपाधि दी। तब मेरे अंदर ख्याल आया कि जवान तो खूब दौड़ते-कूदते हैं, मैं कैसे कर पाऊंगा। फिर पूज्य गुरु जी के वचनों को ध्यान में रखकर मैंने दौड़ना और कूदना शुरू किया। सतगुरु जी ने मेरी दौड़ और कूद ऐसी करवाई कि हाई जंप, लॉन्ग जंप और ट्रिपल जंप, तीनों में मैंने अच्छी पॉजीशन के साथ मेडल जीते। इसी तरह फर्राटा दौड़ और सामान्य दौड़ में तो 2003 में ही इंफाल और हैदराबाद में गोल्ड मेडल जीत गया। इसके बाद 100 मीटर और 800 मीटर में भी मैंने गोल्ड मेडल जीते। न सिर्फ इन दौड़ों में बल्कि 22 किलोमीटर की मैराथन दौड़ में भी मेडल जीता।

    1974 में मिला डेरा सच्चा सौदा से जुड़ने का सौभाग्य

    इलम चन्द इन्सां ने बताते हैं कि डेरा सच्चा सौदा के साथ सन् 1974 से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उस वक्त पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने उनके स्कूल में सत्संग किया था और उनके घर पर भी आपजी ने पवित्र चरण कमल टिकाए थे। आगे वे बताते हैं कि सन् 1996 में जब शाह सतनाम जी शिक्षण संस्थान शुरू हुए तो प्रिंसीपल के रूप में उनका चयन हुआ। तब पूज्य गुरु जी ने उन्हें योग के वचन किए।

    वे बताते हैं कि तब मेरे दिल में ख्याल आया कि लगता है पूज्य गुरु जी पहले तेरी बीमारी ठीक करना चाहते हैं, फिर आगे सेवा करवाएंगे। 2000 में पूज्य गुरु जी ने पावन वचनों से हमारी टीम बनी और योगाभ्यास शुरू किया। कमाल तो तब हुआ जब 2001 में हमने नेशनल में भी गोल्ड मेडल जीता और पोन्डीचेरी में इंटरनेशनल में भी मेडल जीता। तब से शुरू हुए उस सफर पर आज तक वे स्वयं और शाह सतनाम जी शिक्षण संस्थान की गर्ल्ज और ब्वॉयज टीमें कामयाबी के शिखर को छू रहे हैं।

    सतगुरु जी ने हर मुराद पूरी की

    इलमचंद इन्सां बताते हैं कि 1994 में पहली बार उन्हें पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उस वक्त उनके कुछ साथी भी उनके साथ मौजूद थे। उस वक्त पूज्य गुरु जी से उनमें से कोई कुछ मांग रहा था, कोई कुछ कह रहा था। इलमचंद इन्सां ने पूज्य गुरु जी के चरणों में अर्ज की कि सतगुरु जी मुझे तो सेवा दे दो जी। तब पूज्य गुरु जी ने वचन फरमाया कि बेटा यहां सभी सेवाएं हैं, जो आपको अच्छी लगे वो सेवा कर लेना। इसके बाद मैंने अप्लाई किया और मेरा चयन हुआ।

    पूज्य गुरु जी के वचनों पर चलकर विश्व गुरु बनेगा भारत

    इलमचंद इन्सां कहते हैं कि भारत की संस्कृति दुनिया में सबसे महान है। अगर हमारा देश पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के दिखाए मार्ग पर चले तो हमारी संस्कृति पूरी दुनिया में फैल सकती है और हमारा देश विश्व गुरू बन सकता है। उन्होंने आगे कहा कि अगर पूज्य गुरु जी के अनुसार हम जीवन यापन करें तो जवान कभी बूढ़ा नहीं होगा और बूढ़ा बीमारियों से ग्रस्त नहीं होगा। क्योंकि मैंने उनके वचनों को फॉलो करके इतनी कामयाबी हासिल की है तो आप क्यों नहीं कर सकते।

    ये है डाइट

    इलम चंद इन्सां से जब उनकी डाइट के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मैं सब्जियां, फल, दूध के साथ बादाम और किश्मिश खाता हूँ। इसके अलावा जब कोई मेहमान आ जाता है तो हलवा और खीर आदि। वे कहते हैं कि रोटी मैं बहुत कम खाता हूँ।

    सतगुरु का देन नहीं दे सकता

    इलम चंद इन्सां कहते हैं कि पूज्य गुरु जी ने मुझ पर इतने उपकार किए हैं, जिनका लिख बोलकर वर्णन कर पाना मुश्किल है। पूज्य गुरु जी पल-पल मेरी संभाल कर रहे हैं। अब उनके चरणों में यही अरदास है कि वे जल्दी से जल्दी हम सभी के बीच देह रूप में पधारे और हमें अपना अनमोल प्रेम और खुशियां बख्शें।

    Ilamchand Insan

    इलम चंद मूल रूप से यूपी के बागपत जिले के बड़ौत तहसील के गांव अनछाड के रहने वाले हैं। वे शिक्षाविद रहे हैं और 1996 में यूपी के विजयवाड़ा के बीपी इंटर कालेज के प्राचार्य रहे हैं। वर्ष 2000 में वे सिरसा में डेरा सच्चा सौदा में आ गए और यहां आकर 61 वर्ष की उम्र में उन्होंने पूज्य गुरु संत डा. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की पावन प्रेरणा से योग शुरू किया। जिसके बाद योग, एथेलेटिक्स में 425 से अधिक मेडल जीत चुके हैं, जिनमें राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं शामिल हैं।

    इलम चंद ने बताया कि 22 किलोमीटर लंबी हाफ मैराथन में वर्ष 2011 से लेकर सीनियर सिटीजन श्रेणी में जीतते आ रहे हैं। चीन, मलेशिया में हुई पोल वाल्ट प्रतियोगिता में 70 वर्ष से अधिक उम्र में भाग लिया। मलेशिया में आयोजित 800 मीटर दौड़ में 65 वर्ष से अधिक उम्र वालों में गोल्ड जीता। 2013 में चीन में आयोजित पोल वाल्ट में दूसरे स्थान पर रहे। एथलेटिक्स में उन्होंने 130 से अधिक मैडल जीते हुए हैं जबकि योग में करीब 300 मैडल हैं। उनके मार्गदर्शन में अनेक योगा खिलाडिय़ों राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन कर चुके हैं। वर्तमान में 250 से अधिक खिलाडिय़ों को वे प्रशिक्षित कर रहे हैं।

     

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