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    बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत-जापान संबंध

    याद होगा दिसंबर, 2015 में जब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे भारत की यात्रा पर आए थे तो कहा था कि दोनों देशों के रिश्तों की कलियां फूलों में बदल गयी हैं। अब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान की यात्रा कर संबंधों को सुगंधियों से भर दिया है। दोनों देशों के बीच नौ द्विपक्षीय सहयोग संधियों समेत उस असैन्य परमाणु समझौते पर भी मुहर लगी है, जिसका भारत को वर्षों से इंतजार था। असैन्य परमाणु समझौता इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है कि भारत ऐसा पहला देश है जिसने अभी तक एनपीटी (परमाणु हथियार अप्रसार संधि) पर हस्ताक्षर नहीं किया है, के बावजूद भी जापान ने उससे एटमी करार को आकार दिया है। गौरतलब है कि जापान अभी तक इस निर्णय पर कायम था कि जब तक भारत परमाणु हथियार अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं करेगा तब तक उसके साथ एटमी करार नहीं होगा। इधर, भारत भी इस संधि पर हस्ताक्षर के लिए तैयार नहीं था। कारण, भारत की नजर में यह संधि भेदभावपूर्ण है। यहां जानना आवश्यक है कि जब 1998 में भारत ने पोखरण परमाणु परीक्षण को अंजाम दिया तब भारत पर आर्थिक और तकनीकी प्रतिबंध थोपने वाले देशों में जापान भी शामिल था। लेकिन मोदी की कूटनीतिक करामात का नतीजा है कि जापान अपने रुख में परिवर्तन लाया। जापान के समर्थन के बाद अब भारत का पक्ष मजबूत होगा और उम्मीद है कि चीन भी विरोध के केंचुल से बाहर निकलने को मजबूर होगा। गौरतलब है कि चीन एनएसजी में भारत के प्रवेश का विरोध कर रहा है। जापान से असैन्य परमाणु संधि होने के बाद अब भारत को भी परमाणु परीक्षणों पर एकतरफा रोक का वादा, जो उसने 2008 में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से किया है उसे निभाना होगा। असैन्य परमाणु संधि के अलावा दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष, पर्यावरण एवं कृषि क्षेत्र में भी सहयोग के कई अहम समझौते हुए हैं जिससे भारत में जापानी निवेश बढ़ेगा और रेलवे एवं परिवहन क्षेत्र का बुनियादी ढांचा मजबूत होगा। दो समझौते अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए भी हुए हैं जिनमें एक समझौता इसरो और जापानी स्पेस एजेंसी जाक्सा के बीच हुआ है जिससे आउटर स्पेस में सैटलाइट नेविगेशन एवं खगोलीय खोज में मदद मिलेगी। मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया को धार देने के लिए भी दोनों देशों ने हाथ मिलाए हैं। याद होगा जापानी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान मारुति सुजुकी द्वारा विनिर्मित कारों के आयात के एलान के साथ ही 83 हजार करोड़ रुपए का मेक इन इंडिया कोष स्थापित करने का फैसला किया जा चुका है। अब भारत-जापान के बीच असैन्य परमाणु करार होने से दक्षिणी चीन सागर में चीन के बढ़ते हस्तक्षेप पर लगाम लगेगा और संभवत: इसी बौखलाहट में वह भारत को चेतावनी दे रहा है। लेकिन सच तो यह है कि चीन हतोत्साहित है और अब उस पर अपनी हद में रहने का दबाव बढ़ गया है। कहना गलत नहीं होगा कि भारत और जापान के साथ आने से भारत की पूर्वोंन्मुख नीति को नई धार मिली है। यह सच्चाई भी है कि भारत और जापान दोनों हिंद महासागर, प्रशांत महासागर और चीन सागर में चीन की बढ़ती दादागिरी से परेशान हैं। एक कहावत है कि शत्रु का शत्रु मित्र होता है। अगर ऐसे में भारत और जापान के बीच निकटता बढ़ती है तो यह स्वाभाविक ही है। वैसे भी गौर करें तो भारत और जापान का 1400 साल पुराना संबंध है। कारोबारी लिहाज से संपूर्ण दक्षिण एशिया में जापान सबसे बड़ा दाता और भारत सर्वाधिक जापानी आधिकारिक विकास सहायता यानी ओडीए प्रा΄त करने वाला देश है। वह भारत को 1986 से ही अनुदान देता आ रहा है। जापानी ओडीए भारत के त्वरित आर्थिक विकास प्रयत्नों विशेषकर उर्जा, पारगमन, पर्यावरण और मानवीय जरुरतों से जुड़ी परियोजनाओं को सहायता प्रदान करता है। भारत की सभी मेट्रो रेल परियोजनाएं भी जापानी आधिकारिक विकास सहायता की ही घटक हैं। जापान भारत के दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा में भी भागीदार है। यह गलियारा 90 अरब डॉलर की एक वृहत आधिकारिक संरचना परियोजना है जो जापान के वित्तीय और तकनीकी सहयोग से फलीभूत हो रहा है। गौरतलब है कि दिसंबर 2006 में इस परियोजना के एमओयू पर दोनों देशों ने हस्ताक्षर किया। 2011 में इस परियोजना के क्रियान्वयन हेतु मंत्रिमंडल ने दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा विकास निगम ने 18500 करोड़ रुपए की मंजूरी प्रदान की। इस पर काम तेजी से हो रहा है। गौरतलब है कि समर्पित मालभाड़ा गलियारा यानी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर भी जापान द्वारा वित्तपोषित है। यह गलियारा भारतीय रेलवे की एक महत्वकांक्षी परियोजना है जो देश के दो सबसे व्यस्त मार्गों पश्चिमी गलियारा व पूर्वी गलियारा की परिवहन आवश्यकताओं को अगले 20 वर्षों में पूरा करने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। दिसंबर 2009 में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने इस गलियारे के निर्माण पर अपनी प्रतिबद्घता जताई है।
    इस परियोजना में पश्चिमी गलियारा के निर्माण हेतु जापान ने ‘आर्थिक भागीदारी की विशेष शर्तांे’ के तहत ओडीए कर्ज के द्वारा इनके वित्त पोषण को स्वीकार किया। आज की तारीख में भारत में दाइची सांक्यों, हिताची, सुजुकी, पैनासोनिक, यामाहा मोटर, मात्सुशिता जैसी सैकड़ों कंपनियां हैं जो भारत के विकास में सहायक बनी हुई हैं। गौर करना होगा कि जापान अपनी विदेशनीति का पुनर्निरुपण कर रहा है। वह भारत के साथ अपने हित मूल्य और रणनीति का साम्य देख रहा है ताकि वह एशिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके। भारत के साथ असैन्य परमाणु करार को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। अरविंद जयतिलक

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