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    Indo-US relations : भारत-अमेरिका सम्बंध: खुलकर खेलने का समय

    Indo-US relations
    भारत-अमेरिका सम्बंध: खुलकर खेलने का समय

    Indo-US relations : भारत और अमेरिका के सम्बंधों की एक ऐसी पिच बीते कई वर्षों में तैयार हुई है जिस पर खुल कर खेलने को लेकर भारत को कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। मोदी शासनकाल की प्रथम अमेरिकी यात्रा जब सितम्बर 2014 में शुरू हुई तब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से गहरी दोस्ती हुई। ओबामा के बाद डोनाल्ड ट्रंप के साथ भी मोदी असरदार बने रहे और अब एक बार फिर जो बाइडन और मोदी की केमिस्ट्री पूरी दुनिया को एक नई चेतना और नए पथ का अनुगमन करा रही है। देखा जाए तो एक ओर जहां रूस और यूक्रेन एक दूसरे पर हमलावर हैं तो वहीं अमेरिका सहित नाटो के सभी देश रूस के खिलाफ बाकायदा खड़े हैं। जबकि भारत इन सभी के साथ समन्वय और सहृदयता को ध्यान में रखते हुए सम्बंधों की पिच को कहीं अधिक पुख्ता किये हुए है।

    अमेरिका जानता है कि भारत महज दक्षिण एशिया का ही नहीं बल्कि दुनिया में एक अलग रसूक रखने वाला देश बन चुका है। ऐसे में जो बाइडन ये जरूर सोचते होंगे कि एशिया समेत वैश्विक फलक पर उभरे मुद्दों के मामले में मोदी एक अच्छा समाधान हो सकते हैं। गौरतलब है कि भारत धार्मिक बहुलवाद और सबसे बड़े लोकतंत्र का हिमायती है जो इस बात को मजबूत करता है कि वैश्विक पटल पर वह सशक्त है।

    ओबामा ने 7 मुस्लिम देशों पर 26 हजार से अधिक बम गिराए

    हालांकि बराक ओबामा का प्रधानमंत्री मोदी और भारत में मुसलमानों पर दिया गया बयान चर्चा में है। ओबामा ने कहा था कि अगर मैं मोदी से मिलता तो हिन्दू बहुल भारत में अल्पसंख्यक मुसलमानों के अधिकार का मुद्दा उठाता। फिलहाल ओबामा के मन में ऐसा क्या है यह कहना मुश्किल है और उन्हें यह आभास कैसे हो रहा है इसकी पड़ताल भी जरूरी है मगर ये वही ओबामा है जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान एक साल के भीतर 7 मुस्लिम देशों पर 26 हजार से अधिक बम गिराए और अब भारत को ज्ञान दे रहे हैं।

    भारत और अमेरिका के बीच की बातचीत पहली बार तो नहीं है मगर हर बार की तरह यह दौरा भी मजबूत दिशा लिए हुए है। अमेरिका के तीन दिवसीय राजकीय दौरे पर गये पीएम मोदी जो बाइडन के साथ द्विपक्षीय बातचीत को जिस गति से आगे बढ़ाने में सफल दिखे और जिस प्रकार व्हाइट हाउस में उनकी उपस्थिति को महत्व मिला है उसे देखते हुए एक सफल यात्रा करार दी जानी चाहिए। हर बार की तरह समझौतों की फहरिस्त भी अच्छी-खासी है जिसमें दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व में पहले समझौते में भारत निर्मित स्वदेशी विमान तेजस के लिए सेकेंड जेनरेशन जीई-414 जेट विमान के निर्माण पर हस्ताक्षर देखा जा सकता है।

    भारत सिएटल में अपना मिशन स्थापित करेगा

    इसके अलावा रक्षा क्षेत्र में बातचीत सहित प्रौद्योगिकी की आपसी साझेदारी आदि कई ऐसे संदर्भ इस दौरे में शामिल हैं। देखा जाये तो पिछले ढ़ाई दशक में भारत और अमेरिका द्विपक्षीय सम्बंधों में मजबूती को लेकर कहीं अधिक सशक्त प्रयास से युक्त रहे हैं। हालांकि इसमें भारत कहीं अधिक शामिल दिखाई देता है। तमाम अड़चनों और मजबूत नकारात्मकता को दूर करते हुए दोनों देशों ने सम्बंधों को जो मुकाम दिया है इसे मील का पत्थर कहना अतार्किक न होगा। आपसी कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका, बंगलुरू और अहमदाबाद में दो नए वाणिज्य दूतावास खोलने के लिए सहमत हुए जबकि भारत भी सिएटल में अपना मिशन स्थापित करेगा। दोनों देशों के बीच अर्टेमिस संधि पर बनी सहमति भी महत्वपूर्ण है। भारत ने भी इस संधि में शामिल होने की स्वीकृति दी है।

    गौरतलब है कि इसके अंतर्गत समान विचारधारा वाले देशों को आंतरिक खोज के मुद्दों को एक करना है। भारत का पड़ोसी चीन अमेरिका के लिए लम्बे अरसे से सिरदर्द बना हुआ है और भारत के लिए तो वह एक बीमारी है जिससे निपटने के लिए भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया मिलकर क्वॉड का गठन पहले ही कर चुके हैं। वैश्विक फलक पर अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का अलग-अलग स्थितियों में भिन्न-भिन्न स्वरूप है मगर भारत-अमेरिका द्विपक्षीय सम्बंध स्वयं में एक ऐसा फलक लिए हुए है जो चीन जैसे देशों को व्याकुल कर सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत की नीति और रीति में बड़ा बदलाव तो है पर बड़ा फायदा भारत को कितना और कब मिलेगा इस पर भी दृष्टि रहेगी।

    भारत की वैदेशिक नीति कहीं अधिक खुली है  | Indo-US relations

    दुनिया के तमाम देशों व संगठनों के साथ भारत का सकारात्मक रूख इस बात का संकेत है कि संसार भारत को हल्के में तो नहीं लेता। भारत की वैदेशिक नीति कहीं अधिक खुली है और मैले-कुचैले भावना से इसका दूर-दूर तक वास्ता नहीं है। वहीं पड़ोसी पाकिस्तान आतंकवाद को संरक्षण देने के चलते कूटनीतिक और वैदेशिक दोनों स्तर पर विफल है और जबकि आर्थिक स्तर पर कहीं अधिक जर्जर। दोनों शीर्श नेताओं ने पाकिस्तान के आतंकी परिवेश और स्वभाव को देखते हुए लताड़ लगाई है। जाहिर है चीन अमेरिका के साथ भारत की इस प्रगाढ़ता से परेशान होगा तो पाकिस्तान अपने लिए बेहतर न कहे जाने को लेकर माथे पर बल जरूर लाया होगा।

    फिलहाल अमेरिका जानता है कि भारत दुनिया का बड़ा बाजार है और एशियाई देशों में संतुलन की दृश्टि से भी भरोसे से भरा देश है। विदित हो कि रूस और अमेरिका के बीच सम्बंध कहीं अधिक खटास और खटाई से युक्त रहे हैं जबकि भारत दोनों के साथ क्रमश: नैसर्गिक और स्ट्रैटेजिक रिश्तों के साथ बेझिझक आगे बढ़ रहा है। देखा जाये तो मौजूदा समय में कई हिस्सों में बंटी दुनिया का हर हिस्सा भारत से संलग्न है दूसरे शब्दों में कहें तो भारत एक ऐसे मैदान में है जहां किसी भी खिलाड़ी से खुलकर खेलने में कोई दिक्कत नहीं है। बीते कुछ वर्शों से वैश्विक ताना-बाना बिगड़ा है दुनिया के हर देश मुख्यत: यूरोप और अमेरिका और चीन जैसे देश प्रथम के सिद्धांत को अंगीकृत करने की होड़ में है।

    चीन और पाकिस्तान से बड़ा भारत का कोई दुश्मन नहीं | Indo-US relations

    चीन मानो दुनिया से जंग करने के लिए तैयार बैठा हो जबकि भारत बाजार, व्यापार, आदान-प्रदान और सहिष्णु वैदेशिक नीति के चलते सभी को एक साथ लेकर चलने के बड़े प्रयास में रहा है। यही कारण है चीन और पाकिस्तान को छोड़ दिया जाये तो भारत का कोई बड़ा दुश्मन दुनिया में है ही नहीं। भारत की वैदेशिक नीति कहीं अधिक सकारात्मक और घुलनशील है। ऐसे में भारत को अपने लाभ की चिंता बढ़ा देनी चाहिए। संयुक्त राष्टÑ सुरक्षा परिषद् में स्थाई सदस्यता को लेकर एड़ी-चोटी का जोर दशकों से लगाया जा रहा है। हालांकि अमेरिका सहित दुनिया के सैकड़ों देश भारत का इस मामले में समर्थन करते हैं।

    न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में भारत को शामिल करने का इरादा भी बरसों पहले अमेरिका जता चुका है मगर चीन की वजह से यह मामला भी खटाई में है। हालांकि इसे लेकर बिना सदस्यता के ही भारत को मिलने वाला लाभ जारी है। हिन्द महासागर में चीन को संतुलित करने के लिए भी भारत-अमेरिकी सम्बंध कहीं अधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। मोदी का अमेरिकी यात्रा हमेशा एक यादगार परिस्थिति को पैदा करती है। समय के साथ किसी भी रिश्ते में बदलाव स्वाभाविक है मगर भारत और अमेरिका एक बेहतरीन दौर के रिश्ते में हैं। देखना यह है कि दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र और सबसे बड़े लोकतंत्र भारत वैश्विक फलक पर कल्याणकारी दृष्टिकोण के साथ स्वयं को कितना मजबूत कर पाते हैं।

    डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तंभकार एवं प्रशासनिक चिंतक (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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