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Monday, February 2, 2026
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    महंगाई पर नियंत्रण जरूरी

    On inflation

    थोक मूल्य सूचकांक दर तेजी से बढ़ रही है और इस माह 8 प्रतिशत दर को पार करने की संभावना है। नि:संदेह आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि चिंताजनक है और आम जनता के लिए बड़ी परेशानी है। प्याज की कीमतें 100 रुपए के करीब टिकी हुई हैं। आलू के भाव में 45 फीसदी महंगे होना भी महंगाई दर को शिखर पर पहुंचा रहा है। केंद्र सरकार लगातार दावा कर रही है कि सरकार महंगाई पर कड़ी नजर रख रही है, लेकिन महंगाई पर नियंत्रण दिख नहीं रहा। इस मामले का समाधान एक मिनट में होने वाला नहीं बल्कि नीतिगत मामला दरअसल कृषि नीतियों व व्यापारिक नीतियों के बीच तालमेल से ही सुलझता है जो नहीं दिख रहा।

    कृषि प्रधान देश में कभी प्याज व आलू की भरमार होती है और कभी इनकी कीमतें आसमान को छू जाती हैं। किसान फसलों का वाजिब मूल्य प्राप्त करने के लिए सड़कों पर धरने दे रहा है और सरकारों को ज्ञापन दिए जाते हैं, लेकिन किसान से फसल खरीदने के बाद बिचौलिया उसी वस्तु को किसानों की मांग से कई गुणा ज्यादा कीमत पर खरीददार को बेच रहा है। पिछले दो दशकों से महंगाई की मार आवश्यक वस्तुओं पर ज्यादा पड़ रही है, जिसका सीधा सम्बन्ध कृषि के साथ है। किसानों से खरीदे जाने के बाद व्यापारिक व्यवस्था में वस्तु का भाव दस गुणा बढ़ जाता है, न किसान संतुष्ट होता है और न ही उपभोक्ता की आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता है। इस कमी को दूर करने के प्रयास केवल छापामारी तक सीमित रह जाते हैं। छापामारी की वास्तविकता भी कुछ और ही होती है।

    फिर राजनीति में भी प्याज जादूगरी का काम करता है जिसने कई बार राजनीतिक घमासान भी मचाया है। तकनीकी भाषा में प्याज प्रशासनिक कर्मियों की कमियां उजागर करने में सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है। यहां बात केवल सब्जियों की नहीं बल्कि संपूर्ण कृषि उत्पादों की है। यदि किसान से लेकर उपभोक्ता तक को मुख्य रखकर कृषि नीतियां नहीं बनाई जाएंगी, तब तक खुदरा वस्तुओं में महंगाई की मार से बचा नहीं जा सकता। यह भी तथ्य है कि गेहूँ व धान की फसल खरीदना सरकार के लिए चुनौती बनी हुई है, लेकिन किसानों को सब्जियों व अन्य फसलों की तरफ प्रोत्साहित करने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किए जा रहे।

    पिछले साल महाराष्ट के प्याज की कीमत से किसानों के लागत खर्च भी पूरे नहीं हुए थे अब किसानों से औने-पौने दाम पर ज्यादा खरीदकर महंगे भाव बेचा जा रहा है। किसान ठगा सा महसूस कर रहा है, ऐसे में किसान खेती करने की गलती क्यों करेंगे? कृषि नीतियां व व्यापार संबंधी नीतियों में सुधार किए बिना महंगाई से मुक्ति पाना संभव नहीं।

     

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