इजरायल की गठबंधन सरकार, रिश्ते हों प्रगाढ़

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इजरायल में जैसी सरकार अभी बनी है, पहले कभी नहीं बनी। 120 सांसद के सदन में सत्तारूढ़ दल के 61 सदस्य हैं और सत्ता से हटे विपक्षी दलों के पास 59 सदस्य। जब नई सरकार के लिए विश्वास प्रस्ताव आया तो पक्ष में 60 वोट पड़े और विपक्ष में 59 वोट। एक वोट नहीं पड़ा। यानी कुल मिलाकर एक वोट के बहुमत की सरकार इजरायल में बनी है। क्या आपने दुनिया में कहीं इतने कम बहुमत वाली सरकार बनते देखी है? इतने अल्प बहुमत की सरकार के प्रधानमंत्री हैं नफ्ताली बेनेट, जिनकी यामीना पार्टी के केवल सात सदस्य हैं। 8 सदस्यों के गठबंधन का नेता बेनेट को कैसे बना दिया गया और वह आठों पार्टियों को साथ रख पाएंगे या नहीं, यह सबसे बड़ा सवाल है।

इस नए गठबंधन को बांधनेवाले असली नेता हैं, याएर लापिड, जिनकी यश आतिद पार्टी को 17 सीटें मिली हैं। उनके और बेनेट के बीच यह तय हुआ कि दोनों दो-दो साल के लिए प्रधानमंत्री रहेंगे। पहला मौका बेनेट को मिला है। बेनेट के पास इतने कम सदस्य होते हुए भी उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बैठने का मौका इसलिए मिला क्योंकि वह काफी अनुभवी और प्रखर नेता रहे हैं। बेनेट फलस्तीन को अलग राज्य बनाने के पूरी तरह खिलाफ हैं। इस नई गठबंधन सरकार के गठन का सबसे शक्तिशाली तत्व नेतन्याहू-विरोध रहा है। नेतन्याहू लगातार बारह साल और उसके पहले तीन साल तक प्रधानमंत्री रह चुके हैं। लोग नेतन्याहू से ऊब चुके थे। पिछले दिनों फलस्तीनी संगठन हमास के साथ हुए युद्ध के बावजूद नेतन्याहू बहुमत नहीं जुटा सके। यदि वह युद्ध नहीं होता तो नेतन्याहु की लिकुद पार्टी को जो 30 सीटें मिली हैं, वे भी शायद नहीं मिलतीं। वैसे भी इज्ररायली सर्वोच्च न्यायालय में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मुकदमे चल रहे हैं।

नेतन्याहू ने अपने कार्यकाल में अमेरिका के साथ इज्ररायल के संबंधों को घनिष्ठतर तो बनाया ही है, उन्होंने मुस्लिम राष्ट्रों- सऊदी अरब, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के साथ भी अपने संबंधों को भी सुदृढ़ बनाया है। नेतन्याहू के निमंत्रण पर मोदी इज्ररायल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने और नेतन्याहू भी भारत आए। जैसे डॉनल्ड ट्रंप के जाने के बाद जो बाइडन से, वैसे ही अब बेनेट से भी मोदी सरकार को रिश्ते घनिष्ठ करने चाहिए। लेकिन यहां एक जोखिम बना रहने वाला है कि बेनेट की सरकार कितने दिन चलेगी और कैसे चलेगी? यदि इस गठबंधन की एक पार्टी या सिर्फ दो सदस्य भी खिसक गए तब नेतन्याहू फिर से प्रधानमंत्री पद पर काबिज हो जाएंगे। अत: भारत सरकार को राजनीतिक तौर पर लिकुड पार्टी की नीतियों को ध्यान में रखकर चलना होगा।

 

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