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    1947 से अब तक गांधी ग्राम नहीं बन पाया है मेवात का गांव घासेड़ा

    19 दिसम्बर 1947 को घासेड़ा गांव पहुंचे थे महात्मा गांधी

    • यहां के मुसलमानों को महात्मा गांधी ने पाकिस्तान जाने से रोका था
    • करोड़ों के बजट पास हुए, लेकिन नहीं बदली गांव की किस्मत

    गुरुग्राम/नूंह(संजय कुमार मेहरा)। गुरुग्राम जनपद से 40 किलोमीटर दूर बसा है गांव घासेड़ा। कभी गुरुग्राम जिले का हिस्सा यह गांव होता था, लेकिन बाद में सत्यमेव पुरम और अब नूंह जिले में यह गांव भारत के मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान रखता है। बंटवारे के समय मोहनदास कर्मचंद गांधी (राष्ट्रपिता महात्मा गांधी) ने 19 दिसम्बर 1947 को यहां आकर मुसलमानों को पाकिस्तान जाने से रोका था। उनके निवेदन पर हजारों मुसलमानों ने यहीं पर यानी भारत में ही रहने का निर्णय लिया।

    आजादी के समय जब बंटवारा हुआ तो मेवात के करीब 30 हजार मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान जा रहे थे। यह जानकारी महात्मा गांधी तक पहुंची तो वे घासेड़ा गांव पहुंचे। गांधी जी सबसे पहले गांव के मंदिर में पहुंचे थे। वहां कुएं पर गांव के मौजिज व्यक्तियों के साथ उन्होंने मंत्रणा की। फिर उन्होंने पास में ही गुज्जर बाड़ा में पंचायत की। इस पंचायत में करीब 20 हजार लोगों की मौजूदगी रही। उस समय पंचायत में मौजूद रहे वर्तमान में 101 साल के अब्दुल मजीद बताते हैं कि मेवात के हजारों मुसलमान यहां से पलायन करके राजस्थान की सीमा तक पहुंच चके थे।

    काफी लोग पलायन की तैयारी कर यहां से चल चुके थे। तभी महात्मा गांधी यहां पहुंचे। उन्होंने समझाया कि देश की आजादी में उनका भी (मुसलमानों) बराबरी का योगदान है। यह देश हम सबका है। किसी की बातों में ना आएं कि यह देश मुसलमानों की नहीं है। जो ऐसा कह रहे हैं वे गलत हैं। आपके पूर्वजों ने देश के लिए कुर्बानी दी है। महात्मा गांधी का यह कथन और प्रेरणा पूरे मेवातियों तक पहुंची तो उन्होंने यहां से पलायन रोक दिया। जो राजस्थान तक भी पहुंच गए थे, उनकी भी वापसी हो गई। इस तरह से गांधी जी ने 80 साल पहले मेवात आकर एक मजबूत भाईचारे की नींव रखी थी।

    सरकार की ना कोई चिट्ठी आई, ना संदेश

    आजादी के बाद महात्मा गांधी के पदार्पण से घासेड़ा गांव भले ही सुर्खियों में रहा हो, लेकिन गांव के लोगों को आज भी यह टीस है कि गांव का नाम बदलकर गांधी ग्राम करने में किसी भी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। ग्रामीणों के मुताबिक साल 1950 से लेकर अब तक 150 से अधिक चिट्ठियां सरकारों को भेजी गई हैं। किसी भी सरकार ने इस चिट्ठियों का ना तो कोई जवाब दिया और ना ही ग्रामीणों की मांग को पूरा किया। यानी घासेड़ा गांव आज भी गांधी ग्राम होने के इंतजार में है। गांव के सरपंच अशरफ अली का कहना है कि गांव का नाम बदलकर गांधी ग्राम करने के लिए कई बार ज्ञापन भी सरकार तक पहुंचाए हैं। किसी सरकार में कोई ध्यान नहीं दिया गया। हां, ग्रामीण आपसी बोलचाल में अपने गांव का नाम घासेड़ा नहीं, बल्कि गांधी ग्राम बोलकर ही संबोधित करते हैं।

    आजादी आंदोलन में 8 लोगों ने दी शहादत

    इसमें कोई दोराय नहीं कि आजादी के आंदोलन 1857 से 1947 तक मेवात के लोगों ने कुर्बानियां दी थी। इन कुर्बानियों को अगली पीढिय़ों तक पहुंचाने के लिए गांव में गौरव पट्ट भी स्थापित किया गया है। यह गौरव पट्ट गांव का पूरा इतिहास समेटे हुए है। इस पर 8 लोगों ने विशेषतौर पर नाम दर्ज हैं, जिन्होंने आजादी आंदोलन में शहादत दी थी।

    घासेड़ा में गांधी जी का स्वच्छता मिशन है बेमानी

    स्वच्छता को लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस तरह के संदेश दिए, जो अभियान चलाए, काम किए, उनका अनुसरण आज भारत देश कर रहा है। भले ही गांव जी घासेड़ा गांव में आए हों, लेकिन उनका स्वच्छता मिशन यहां दम तोड़ रहा है। गांव में गदंगी के ढेर जहां-तहां नजर आते हैं। गांव में जो ऐतिहासिक दरवाजे हैं, वे भी जीर्ण-शीर्ण हो रहे हैं। देखरेख के अभाव में एक ऐतिहासिक दरवाजा तो टूट भी चुका है। कहने को तो वर्ष 2007 में घासेड़ा को आदर्श गांव घोषित किया गया था। यहां करीब सात करोड़ रुपये राशि विकास के लिए मिली थी। गांव में कुछ काम भी हुए, लेकिन हालात आज भी बदहाल ही हैं।

    इसा का भाई नाटूला आज भी पाकिस्तान में

    गांव के बुजुर्ग इसा अपना दर्द बयां करते हुए कहते हैं कि बेशक हजारों मुसलमान गांधी जी की प्रेरणा से पाकिस्तान ना गए हों, लेकिन उनका बड़ा भाई नाटूला आज भी पाकिस्तान में है। वह हालत का जायजा लेने के लिए पाकिस्तान के टोबा टेक सिंह जिले में भेजा गया था। वह वहीं पर रह गया।

    पांच वर्ग किलोमीटर में फैले घासेड़ा गांव में कुल 25 हजार की आबादी, 9 हजार मतदाता और 20 छोटी-बड़ी मस्जिदें हैं। भले ही यहां 99 फीसदी मुसलमान हों, लेकिन 1 प्रतिशत हिंदुओं के साथ भाईचारा कायम है। घासेड़ा के ग्रामीण आज भी गांधी जी से प्रेरित हैं। उनके आग्रह पर पलायन रोकने का निर्णय लेने को वे अच्छा मानते हैं। यहां उनके अनुकूल माहौल है। जो आजादी मिली थी, उस आजादी को वे आज भी महसूस करते हैं।

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