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Wednesday, February 11, 2026
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    Editorial : संवैधानिक पदों की गरिमा कायम रहे

    Lok Sabha Election

    Editorial: संवैधानिक पद पर आसीन राज्यपाल एवं चुनी हुई सरकारों के बीच टकराव की स्थितियां अनेक बार बनती रही हैं। गैर-भाजपा शासित राज्यों में सरकारों और राज्यपालों के बीच इस तरह का टकराव एक सामान्य बात हो गई है, लेकिन यह टकराव न केवल लोकतंत्र के लिए बल्कि शासन-व्यवस्थाओं पर एक बदनुमा दाग की तरह है। तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में ऐसी स्थितियां बढ़-चढ़कर देखने को मिली हैं। इन सभी राज्यों में गैर-भाजपा सरकार है और एक बात कॉमन है वो बात है राज्य सरकार का राज्यपाल के साथ विवाद। बीते कुछ समय से इन पांचों राज्यों में राज्यपाल बनाम राज्य सरकार का वाक-युद्ध भी देखने को मिला। Politics

    सभी राज्यों में सरकारों और राज्यपालों के बीच बयानबाजी चलती रहती थी। हाल ही में यह विवाद पंजाब मं देखने को मिला। पंजाब सरकार ने विधान सभा में बिल पारित कर राज्यपाल को राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के पद से हटा दिया है। ऐसे माहौल में राज्यपाल के संवैधानिक पद की महत्ता और प्रासंगिकता का चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है। वास्तव में राज्यपाल के पद के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। यह पद केंद्र और राज्यों की तर्ज पर संसदीय प्रणाली को लागू करने के लिए सृजित किया गया था। Politics

    राज्यपाल के पद पर स्थापित व्यक्ति की राजनीतिक पृष्ठभूमि ही समस्या पैदा करती है। पिछले 4-5 दशकों से यह चलन रहा है कि केंद्र में सत्तापक्ष दल ही अपने किसी एक नेता को राज्यपाल नियुक्त करता रहा है। राज्यपाल के पद को अराजनीतिक रखना आवश्यक है। दूसरी ओर, यह बात भी नहीं है कि प्रत्येक राजनीतिक नेता राज्यपाल के पद पर जाकर पार्टीवाद में फंस जाता है। दूसरी तरफ देश में ऐसी अराजनीतिक शख्सियतों की भी कोई कमी नहीं है जो पूरी निष्ठा से इस पद पर कार्य कर सकते हैं, फिर भी गैर-राजनीतिक व्यक्तियों की नियुक्ति से टकराव कम होने की संभावना अधिक है। विवाद से विकास कार्य प्रभावित होते हैं। Editorial

    राज्य सरकार के लिए शब्दों का मर्यादा और सम्मान बनाए रखना भी आवश्यक है। संघर्ष समय की बबार्दी है। धैर्य और सद्भावना नेताओं की विशेषता का अंग है। राज्यपाल पद की गरिमा और मर्यादा को लेकर सवाल उठाने वालों की मंशा पर भी ध्यान देना होगा। पर राज्यपाल से भी अपेक्षा की जाती है कि वे अपने को केंद्र के सत्तारूढ़ दल का प्रतिनिधि मान कर उसकी विचारधारा के अनुरूप राज्य सरकार से काम करवाने का प्रयास करने के बजाय पद की गरिमा के अनुरूप काम करें। Politics

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