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    मां ने कहा, मेरा बेटा एक दिन कुछ बड़ा करेगा, आज बनाई अन्तरराष्ट्रीय पहचान

    Bhiwani
    Bhiwani मां ने कहा, मेरा बेटा एक दिन कुछ बड़ा करेगा, आज बनाई अन्तरराष्ट्रीय पहचान

    भिवानी (सच कहूँ/इन्द्रवेश)। विश्व कला दिवस हर वर्ष 15 अप्रैल को महान कलाकार लियोनार्डो दि विंची के जन्मदिवस पर मनाया जाता है। यह दिन कला की शक्ति, रचनात्मकता और समाज में उसके योगदान को सम्मान देने के लिए समर्पित है। इस विशेष अवसर पर हम बात कर रहे हैं एक ऐसे भारतीय कलाकार की, जिन्होंने गांव की सादगी से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई, कलाकार हरिओम बावा पुत्र रामनिवास वाल्मीकि। संघर्ष से शुरू हुई कला यात्रा हरिओम बावा का जन्म हरियाणा बवानीखेड़ा कस्बे के एक साधारण परिवार में हुआ, जहाँ आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। उनके पिता मजदूरी करते थे, और घर की जिम्मेदारियाँ बहुत जल्दी उनके कंधों पर आ गई। लेकिन इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद, उनके भीतर कला के प्रति जुनून कभी कम नहीं हुआ। उनकी कला यात्रा सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि एक मिशन है, पर्यावरण और समाज को जागरूक करने का मिशन। उन्होंने अपनी परफॉर्मिंग आर्ट और ईको-फ्रेंडली स्कल्पचर के माध्यम से लोगों को प्रकृति से जोड़ने का प्रयास किया। हरिओम बावा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के सरकारी स्कूल से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने बीएफए (स्कल्पचर) की पढ़ाई कॉलेज आर्ट यूनिवसिर्टी आॅफ दिल्ली से पूरी की। फिर मास्टर आॅफ फाइन आर्ट की डिग्री अमरावती (नागपुर) से प्राप्त की। यह शिक्षा उनके लिए सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि उनके सपनों को आकार देने का माध्यम बनी। हरिओम बावा की सफलता के पीछे उनकी मां का सबसे बड़ा योगदान रहा। उनकी मां हमेशा कहती थीं कि मेरा बेटा एक दिन कुछ बड़ा करेगा। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। बीएफए के अंतिम वर्ष में उनकी मां का देहांत हो गया। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा झटका था। आज भी हरिओम बावा अपनी हर कला, हर उपलब्धि को अपनी मां को समर्पित करते हैं। उनकी कला में जो संवेदनशीलता और भावनात्मक गहराई है, वह इसी रिश्ते की देन है। जीवन साथी का सहयोग आज उनकी पत्नी रिंकी बावा उनके जीवन और कला यात्रा में एक मजबूत सहारा हैं। हर कठिन समय में उन्होंने हरिओम का साथ दिया और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। एक कलाकार के लिए भावनात्मक सहयोग बहुत महत्वपूर्ण होता है, और रिंकी बावा इस भूमिका को पूरी निष्ठा से निभा रही हैं।

    गांव से अंतरराष्ट्रीय पहचान तक की कहानी

    गांव से अंतरराष्ट्रीय पहचान तक हरिओम बावा ने अपने गांव से शुरू होकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक अपनी पहचान बनाई। उनकी कला सिर्फ सुंदरता नहीं, बल्कि एक संदेश देती है, प्रकृति को बचाओ, समाज को जगाओ। उनकी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों में स्पेन में सिल्वर मेडल, बेल्जियम में सिल्वर मेडल, क्रोएशिया में ब्रॉन्ज मेडल, मिस्र में डॉ. मुस्तफा सादिक अंतर्राष्ट्रीय वैश्विक जलवायु परिवर्तन पुरस्कार है। ये सम्मान केवल पुरस्कार नहीं, बल्कि उनकी मेहनत, संघर्ष और समर्पण की पहचान हैं। हरिओम बावा की विशेषता है उनकी परफॉर्मिंग आर्ट, जिसमें वे लाइव आर्ट के माध्यम से लोगों को पर्यावरण, स्वास्थ्य और सामाजिक मुद्दों पर जागरूक करते हैं। वे बच्चों, युवाओं और आम जनता को यह संदेश देते हैं कि प्रकृति की रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है, स्वच्छता और स्वांस्थ्य जीवन का आधार है, कला सिर्फ देखने की चीज नहीं, बल्कि समाज बदलने का माध्यम है।

    गोबर कला और प्राकृतिक सामग्री का उपयोग

    हरिओम बावा मुख्य रूप से गोबर कला और प्राकृतिक सामग्री का उपयोग करते हैं। यह न केवल पर्यावरण के लिए सुरक्षित है, बल्कि भारतीय परंपरा और लोक कला को भी जीवित रखता है। विश्व कला दिवस के इस अवसर पर, हरिओम बावा जैसे कलाकार हमें यह याद दिलाते हैं कि कला केवल रंगों और आकृतियों का खेल नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली माध्यम है जो दुनिया को बदल सकता है। गांव की मिट्टी से उठकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने वाले हरिओम बावा आज लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा हैं।