नक्सल आतंक का हो सफाया

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Naxalite

ऐसे समय में जब देश कोरोना संकट से दो-चार है नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ राज्य के बीजापुर के नक्सल प्रभावित तरेंम थाना क्षेत्र के जोन्नागुड़ा के जंगल में हमला बोल दो दर्जन से अधिक जवानों की जान ले ली है। उनका यह कृत्य रेखांकित करता है कि वे कायरता की सनक छोड़ने को तैयार नहीं हैं। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि खुफिया एजेंसियों द्वारा बीजापुर में नक्सलियों के मौजूद होने और जवानों पर हमला बोलने की योजना बनाने की सूचना पहले ही दे दी गई थी। लेकिन इसके बावजूद भी नक्सली जवानों को निशाना बनाने में कामयाब रहे तो यह नक्सल विरोधी अभियान की विफलता और चूक को ही रेखांकित करता है। छत्तीसगढ़ में यह कोई पहली घटना नहीं, इससे पहले भी 9 अप्रैल 2019 को दंतेवाड़ा के लोकसभा चुनाव के दौरान मतदान से ठीक पहले नक्सलियों ने चुनाव प्रचार के लिए जा रहे भाजपा विधायक भीमा मंडावी की कार पर जबरदस्त हमला किया था, इस हमले में भीमा मंडावी के अलावा उनके चार सुरक्षाकर्मी भी मारे गये थे।

24 अप्रैल 2017 को सुकमा जनपद के दुर्गपाल के पास नक्सलियों के द्वारा घात लगाकर किए गए हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 25 जवान उस समय मारे गये। 25 मई 2013 को बस्तर के दरभा घाटी में हुए नक्सली हमले में कांग्रेस के आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा, कांग्रेस पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 30 अन्य लोग मारे गए थे। आंकड़ों पर गौर करें तो जनवरी 2001 से मई 2019 तक माओवादी हिंसा में 1002 नक्सली मारे गये हैं तो 1234 सुरक्षा बलों के जवान शहीद हुए हैं। विचारणीय तथ्य यह है कि नक्सली बेखौफ होकर एक के बाद एक घटना को अंजाम देकर देश के अंदर बैठकर केन्द्र व राज्य सरकार को बार-बार चुनौती दे रहे हैं, आखिर उनके पास सरकार से लड़ने के लिए हथियार व अन्य संसाधन लगातार कहां से आ रहे हैं। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में इस साल नक्सली हिंसा की एक भी घटना नहीं हुई। इसी तरह बिहार में भी कम हिंसक घटनाएं दर्ज हुई हैं। लेकिन मौजूदा घटनाओं से साफ है कि उनके फन को पूरी तरह कुचला नहीं जा सका है।

झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे प्राकृतिक संसाधनों वाले राज्यों में काम करने वाली कंपनियों से रंगदारी वसूल रहे हैं। यही नहीं वे इन क्षेत्रों में चलने वाली केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का एक बड़ा हिस्सा भी हड़प रहे हैं। दरअसल नक्सली एक खास रणनीति के तहत सरकारी योजनाओं में बाधा डाल रहे हैं। वे नहीं चाहते हैं कि ग्रामीण जनता का रोजगारपरक सरकारी कार्यक्रमों पर भरोसा बढ़े। उन्हें डर है कि यदि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सरकारी योजनाएं फलीभूत हुई तो आदिवासी नौजवानों को रोजगार मिलेगा और वे नक्सली संगठनों का हिस्सा नहीं बनेंगे। नक्सली अब परंपरागत लड़ाई को छोड़ आतंकी संगठनों की राह पकड़ लिए हैं।

अगर शीध्र ही सरकार उनकी खतरनाक विध्वंसक प्रवृत्तियों पर अंकुश नहीं लगाएगी, तो उनके कंप्युटराइज्ड और शिक्षित गिरोहबंद लोग जंगल से निकलकर शहर की ओर रुख करेंगे और ऐसी स्थिति में उनसे निपटना कठिन होगा। नक्सलियों के पास मौजूद विदेशी हथियारों और गोला बारुद से साफ है कि उनका संबंध भारत विरोधी शक्तियों से है। उचित होगा कि केंद्र व राज्य की सरकारें नक्सलियों का फन तो कुचलें ही साथ ऐसे लोगों के विरुद्ध भी सख्त कार्रवाई करें जो नक्सली हिंसा का समर्थन करते हैं।

 

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