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    ओढां को स्वतंत्रता सैनानियों का गांव कहा जाता है, यहां से 4 लोग स्वतंत्रता सैनानी रहे

    Odhan Freedom Fighters Village

    परिजनों की टीस, सरकार के खिलाफ फैला रोष

    • स्वतंत्रता सैनानियों के नाम न बना कोई स्मारक, न बना पार्क, सरकारी योजनाओं को भी तरसे

    सच कहूँ/राजू।
    ओढां। ओढां को स्वतंत्रता सैनानियों का गांव कहा जाता है। यहां से 4 लोग स्वतंत्रता सैनानी रहे हैं। इन स्वतंत्रता सैनानियों ने सुभाष बिग्रेड में शामिल होकर स्वतंत्रता की लड़ाई में अपनी भूमिका निभाई। हालांकि अब ये स्वतंत्रता सैनानी नहीं रहे, लेकिन उनके परिजनों ने उनकी वीरता के मेडलों व निशानियों को आज भी सहजकर रखा हुआ है। परिजनों में कहीं न कहीं नाराजगी देखने को मिल रही है। उनका कहना है कि सरकार ने स्वतंत्रता सैनानियों को भूला दिया है। उनके नाम से न ही तो कोई स्मारक, न पार्क बनाया गया और न ही उनके परिजनों को किन्हीं योजनाओं का लाभ दिया गया। इन परिवारों में से एक परिवार में एक व्यक्ति दिव्यांग है, लेकिन फिर भी उसे कोई सहायता मुहैया नहीं करवाई गई।

    1. रतीराम गोदारा: 15 फरवरी 1942 को आईएनए में हुए थे शामिल

    Sitaram

    रतीराम गोदारा का देहांत 19 नवंबर 2004 को हुआ। रतीराम को दूसरे महायुद्ध के समय ब्रिटिश फौज में भर्ती कर सिंगापुर में लड़ने के लिए भेजा गया। फरवरी 1942 में ब्रिटिश फौज ने जापान के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। जिसके बाद उन्हें साथियों सहित बंदी बना लिया गया। जिसके बाद बाबू रास बिहारी बोस ने जब आईएनए की स्थापना की तो रतीराम 15 फरवरी 1942 को उसमें शामिल हो गए। जून 1943 में जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जर्मनी से जापान आए और आईएनए को दोबारा तरतीब दी तो रतीराम को सुभाष बिग्रेड में शामिल कर लिया गया। जिसके तहत उन्होेंने पोपाहिल सहित अन्य जगहों पर युद्ध में भाग लिया। सन् 1945 में जापान के पतन के कारण आईएनए ने भी समर्पण कर दिया। फिर रतीराम को बंदी बना लिया गया। उन्हें जगर गच्छा जेल में रखा गया। बाद में समझौता होने पर उन्हें रिहा कर दिया गया। रतीराम के बेटे रामप्रसाद व रामचंद ने उनके पिता को सम्मान देने की गुहार लगाई है।

    2. बचन सिंह गिल: ब्रिटिश फौज को चटा दी थी धूल

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    बचन सिंह गिल का देहांत 18 मार्च 2005 को हुआ। वे सन् 1939 में दूसरे महायुद्ध के समय ब्रिटिश फौज में भर्ती हुए तो उन्हें सिंगापुर में जापान के विरूद्ध लड़ाई के लिए भेजा गया। जहां उन्हें साथियों सहित बंदी बना लिया गया। बाद में वे रास बिहारी बोस द्वारा स्थापित आईएनए में शामिल हो गए। जहां उन्हें तोपखाने मेंं रखा गया। बचन सिंह ने ब्रिटिश फौजों पर गोलीबारी कर उन्हें नाकों चने चबा दिया, लेकिन जापान द्वारा आत्मसमर्पण करने के कारण उन्हें बंदी बनाकर जगर गच्छा जेल में रखा गया। बाद में समझौते के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। बचन सिंह का पुत्र जसकरण सिंह दिव्यांग है और अविवाहित है, लेकिन उन्हें सरकार की ओर कोई सहायता मुहैया नहीं करवाई गई। उन्होंने कहा कि उनके पिता स्वतंत्रता सैनानी रहे, लेकिन सरकार ने उनके देहांत के बाद उनकी कोई सुध नहीं ली।

    3.हरदम सिंह: गच्छा जेल में बंदी बनाकर रखा

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    हरदम सिंह मलकाना का 13 मार्च 2014 को देहांत हुआ। हरदम सिंंह ने 1945 से 1946 तक रास बिहारी बोस की आईएनए में शामिल होकर लड़ाई लड़ी। बाद में बंदी बनाए जाने के बाद उन्हें जगर गच्छा जेल में रखा गया। बाद में उन्हें समझौते के तहत रिहा कर दिया गया। उनके परिजनों ने बताया कि उनके बुजुर्ग उन्हें विभिन्न जगहों पर हुए युद्धों सहित देशभक्ति की अनेक बातें सुनाया करते, लेकिन एक स्वतंत्रता सैनानी होने के बावजूद भी सरकार ने उनकी देहांत के बाद कोई सुध नहीं ली। उन्होंने कहा कि सरकार को चाहिए कि स्वतंत्रता सैनानियों के नाम पर कोई स्मारक बनाया जाए ताकि लोग अवगत हो सकें ।

    मुंशीराम: आजाद हिंद फौज के रह चुके सिपाही

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    मुंशीराम का जन्म सन् 1917 में हिमाचल प्रदेश में हुआ। बाद में नंगल डेम बनने के बाद वे ओढां में आ गए। मुंशीराम का देहांत 16 जून 2005 को ओढां में हुआ। मुंशीराम ने उर्दू की शिक्षा प्राप्त की थी। वे 10 अप्रैल 1941 को ब्रिटिश फौज में भर्ती हुए और उन्हें सिंगापुर भेज दिया गया। वहां उन्हें जापानी सेना द्वारा अधिकार के बाद बंदी बना लिया गया। बाद में वे आजाद हिंद फौज मेें भर्ती हुए जहां उन्हें फिर से बंदी बनाकर जगर गच्छा जेल में भेज दिया गया। समझौते के बाद उन्हें वहां से रिहा कर दिया गया। उनकी पुत्रवधु निर्मला देवी ने बताया कि सरकार ने उनके ससुर के देहांत के बाद उनके परिवार की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने अफसोस व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें न ही तो कोई योजना का लाभ दिया गया और न ही उनके नाम से कोई स्मारक या संस्थान का नाम रखा गया।

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