आज ही के दिन डॉ. राधाकृष्णन बने थे भारत के दूसरे राष्ट्रपति

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Sarvepalli Radhakrishnan

जब राधाकृष्णन मॉस्को में भारत के राजदूत थे, बहुत दिनों तक स्टालिन उनसे मुलाकात के लिए राजी नहीं हुए। अंत में जब दोनों की मुलाकात हुई तो डॉ. राधाकृष्णन ने स्टालिन से कहा, हमारे देश में एक राजा था जो बड़ा अत्याचारी और क्रूर था। उसने रक्त भरी राह से प्रगति की थी किन्तु एक युद्ध में उसके भीतर ज्ञान जाग गया और तभी से उसने धर्म, शांति और अहिंसा की राह पकड़ ली। आप भी अब उसी रास्ते पर क्यों नहीं आ जाते? उनकी बात का स्टालिन क्या जवाब देते। उनके जाने के बाद स्टालिन ने अपने दुभाषिए से कहा, ये आदमी राजनीति नहीं जानता, वह केवल मानवता का भक्त है। उप-राष्ट्रपति के तौर पर सर्वपल्ली राधाकृष्णन चीन गए थे तो माओ ने अपने निवास चुंग नान हाई के आंगन के बीचोबीच आकर उनकी अगवानी की। जैसे ही दोनों ने हाथ मिलाया राधाकृष्णन ने माओ के गाल थपथपा दिए।

साथ ही उन्होंने जबरदस्त पंच लाइन कही, अध्यक्ष महोदय, परेशान मत होइए। मैंने यही स्टालिन और पोप के साथ भी किया है। भारत के पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह उस समय चीन में भारतीय दूतावास में अफसर थे, जो उस वक्त वहां मौजूद थे। भोज के दौरान माओ ने खाते-खाते बहुत मासूमियत से चॉपस्टिक से अपनी प्लेट से खाने का एक कौर उठा कर राधाकृष्णन की प्लेट में रख दिया। माओ को इसका अंदाजा ही नहीं था कि राधाकृष्णन पक्के शाकाहारी हैं। राधाकृष्णन ने भी माओ को यह आभास नहीं होने दिया कि उन्होंने कोई नागवार चीज की है। उस समय राधाकृष्णन की उंगली में चोट लगी हुई थी। चीन की यात्रा से पहले कंबोडिया के दौरे के दौरान उनके एडीसी की गलती की वजह से उनका हाथ कार के दरवाजे के बीच आ गया था और उनकी उंगली की हड्डी टूट गई थी। माओ ने इसे देखते ही तुरंत अपना डॉ. बुलवाया और उनकी नए सिरे से मरहम पट्टी करवाई।

 

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