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Sunday, April 5, 2026
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    हम तो दिल से लगाकर रखते है, हमारे सतगुरु दाता का दिया हुआ रुमाल

    saint dr msg

    Barnawa  (सच कहूँ न्यूज)। पूज्य गुरू संत डा. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने 40 दिन की रूहानी यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश के जिला बागपत स्थित शाह सतनाम जी आश्रम बरनावा से आॅनलाइन गुरूकुल के माध्यम से देश-विदेश में बैठी साध-संगत को अपने अनमोल वचनों से सरोबार किया। साथ में इस दौरान पूज्य गुरु जी ने साध-संगत को पानी के खत्म होते स्रोत को बचाने का प्रण दिलाया और पानी बचाने के लिए एक मुहिम या आंदोलन चलाने का आह्वान किया। इस अवसर पर राजस्थान के हनुमानगढ़, पंजाब के सुनाम व उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में हजारों लोगों को सामाजिक बुराईयों व नशों से छुटकारा दिलाते हुए उन्हें गुरुमंत्र दिया। पूज्य गुरु जी ने रूहानी सत्संग के दौरान परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज का शाही रूमाल साध-संगत को दिखाया।

    पूज्य गुरु जी बोले, स्वर्ग यहीं है बस देखने का अपना-अपना नजरिया होना चाहिये

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     पिता जी ने परमपिता शाह सतनाम जी द्वारा दिया हुआ रुमाल आज भी संभाल कर रखा हुआ हैं। हर समय दल से लगाए रखते हैं अपने मुर्शिद की निशानी को।

    इस दौरान सूरजपुर ब्लॉक (नोएडा) के शाह सतनाम जी ग्रीन एस वेल्फेयर फोर्स विंग के जवानों ने मेरठ से लापता युवक को परिजनों के सुपुर्द किया। पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि आज का इन्सान कुदरत की बनाई गई चीजों को बर्बाद करने पर तुला हुआ है। जीने का सबसे बड़ा स्रोत पानी और हवा है। अगर गांव से कोई इन्सान पहली बार महानगरों में जाएगा तो उसे खींच-खींच के सांस लेना पड़ेगा। इसका कारण पॉल्यूशन का अत्याधिक मात्रा में बढ़ा है। हवा में जहर घुलता जा रहा है। शरीर में 70 से 90 प्रतिशत के करीब पानी होता है। वो पानी के स्रोत अब नीचे चले जा रहे है। इन्सान को इसकी कोई फिक्र नहीं है। बिना वजह पानी की बबार्दी करता जा रहे है, बिना कोई वजह से इन्सान पानी का खात्मा करता जा रहा है। जो शरीर के लिए अति-अति जरूरी है। पूज्य गुरु जी ने कहा कि ऐसे ख्याल इन्सान को तभी आएंगे, जब वह थोड़ा बहुत समय मालिक की याद में लगाएगा। वरना किस को इनका ख्याल है।

    कहीं पानी के लिए विश्व युद्ध ना हो जाए: पूज्य गुरु जी

    पूज्य गुरु जी ने कहा कि महानगरों में पड़ोसी पड़ोसी को नहीं जानता। उसकी तरफ ध्यान नहीं देता कोई। पूज्य गुरु जी ने कहा कि इस कारण सारी सृष्टि के बारे में साचने वाले (वैैज्ञानिक) परेशान हो रहे हैं, लेकिन इन्सान मस्ती मनाता जा रहा है। पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि पानी के बारे में उन वैज्ञानिकों से पूछ के देखो, जो डर रहे हंै कि अगर पानी का स्रोत खत्म हो गया तो कहीं पानी के लिए विश्व युद्ध ना हो जाए। क्योंकि वैज्ञानिकों को इसके बारे में पता चल रहा है। लेकिन कुदरत के कादिर को कौन समझ सका है। अगर इन्सान कुदरत के कादिर को समझ पाते तो जो भूंकप से नुकसान हो रहे हैं, वो कभी होते ही नहीं, अगर कोई कुदरत के कादिर के उसूलों को पकड़ पाता तो कभी समुन्द्री तुफान आते ही नहीं। कभी कोई दुर्घटनाएं होती ही ना। प्रकृति की आपदाएं आती ही ना। यह तभी संभव था जब अगर इन्सान प्रकृति से छेड़छाड़ ना करें।

    छाया – सुशील कुमार

    आप जिस प्रकार अपने बच्चों की संभाल करते हैं, वैसे ही पेड़-पौधों की करें

    पूज्य गुरु जी ने कहा कि हमने 1997 में इसकी पहल की थी, जोकि जरूरत भी थी। जब विभिन्न राज्यों में डेरा सच्चा सौदा के आश्रम बनाए गए थे, वहां मकान बनाने थे, लेकिन उन जगहों पर पेड़-पौधे थे। इसके लिए हमने पेड़ को काटने की बजाए एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट किया था। एक भी पेड़ खत्म नहीं होने दिया। वो पेड़ आज भी ज्यौं के त्यौं चल रहे हंै। पूज्य गुरु जी ने कहा कि जिस प्रकार इन्सान अपने शरीर की संभाल करता है, उसी प्रकार पेड़-पौधों की भी संभाल करनी चाहिए। पूज्य गुरु जी ने कहा कि 6 करोड़ से अधिक डेरा सच्चा सौदा के सत्संगी को हमने आह्वान कर रखा है कि जिस प्रकार वो अपने बच्चों की संभाल करते है, ठीक उसी प्रकार पेड़-पौधों की संभाल करों और साध-संगत इसकी संभाल कर भी रही है। इसके अलावा साध-संगत साल में 12 पेड़ जरूर लगाती भी है। पूज्य गुरु जी ने कहा कि अगर सभी लोग ऐसा करने लग जाए तो ये कुदरत का स्वर्ग फिर से लहलाने लग जाएगा और हम गारंटी देते हंै कि प्राकृतिक आपदाएं आनी कम हो जाएगा तथा विनाश की तरफ जा रही दुनिया शायद-शायद-शायद परम पिता परमात्मा की कृपा से बच पाए और ओम, हरि, अल्लाह, वाहेगुरु, गॉड,खुदा, रब्ब, ईश्वर कर दें और ये सृष्टि बची रहे।

    सरसा आश्रम में पानी को फिल्टर कर खेतों में किया जा रहा इस्तेमाल | Barnawa

    पूज्य गुरु जी आगे कहा कि पानी का भी स्रोत अति जरूरी है संभालना। पूज्य गुरु जी ने कहा कि पानी बचाने के लिए हमने सरसा के शाह सतनाम जी धाम में एक बहुत बड़ी डिग्गी बनाई हुई है। उसके लिए खर्चा भी ज्यादा नहीं किया था। जहां तक हमें याद है नीचे हमने दोमट मिट्टी बिछाई थी और साइडों में शायद दीवार आदि की थी। बरसात के दौरान पूरे आश्रम का पानी उस डिग्गी में भर जाता था तथा फिर उसी पानी को फिल्टर करके खेतों में फव्वारा और ड्रिप सिस्टम से पानी देते थे। जिससे हमने वहां बाग-बगीचे कामयाब कर रखे हैं।

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