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Friday, April 10, 2026
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    वर्षा जल संचयन समय की जरूरत

    तालों में कैद रहता है पानी

    जल संकट आज समूचे विश्व के समक्ष एक गंभीर समस्या है। हालात इतने खराब हैं कि 37 देश पानी की भारी किल्लत का सामना कर रहे हैं। इनमें सिंगापुर, पश्चिमी सहारा, कतर, बहरीन, जमैका, सऊदी अरब और कुवैत समेत 19 देश ऐसे हैं, जहां पानी की आपूर्ति मांग से बेहद कम है। चिंता की बात यह है कि हमारा देश इन देशों से सिर्फ एक पायदान पीछे है। असलियत यह है कि दुनिया में पांच में से एक व्यक्ति की साफ पानी तक पहुंच ही नहीं है। यह सब घरेलू और औद्यौगिक क्षेत्र में पानी की मांग में उल्लेखनीय बढ़ौतरी का नतीजा है।

    भूजल पानी का महत्वपूर्ण स्रोत है। पृथ्वी पर होने वाली जलापूर्ति अधिकतर भूजल पर ही निर्भर है, लेकिन चाहे सरकारी मशीनरी हो, उद्योग हो, कृषि क्षेत्र हो या आम जन, सबने इसका इतना दोहन किया है कि भूजल के लगातार गिरते स्तर के चलते जल संकट की भीषण समस्या हमारे सामने है। इससे पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन की स्थिति पैदा हो गयी है। यह इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में स्थिति विकराल हो सकती है। यदि इसी को रिचार्ज की स्पष्ट नीति के तहत भविष्य में उपयोग की दृष्टि से संरक्षित किया जाए, तो देश में पानी का कोई संकट नहीं होगा। असलियत में यह सब जल संचय के हमारे परंपरागत तौर-तरीकों की अनदेखी, झीलों, तालाबों और कुओं पर अतिक्रमण, नदी और भूजल स्रोतों का प्रदूषण, अत्याधिक पानी वाली फसलों के उत्पादन की बढ़ती चाहत, पानी की बबार्दी, बारिश के जल का उचित संरक्षण न होना, भूजल के अत्याधिक दोहन के चलते भूजल स्तर में भयावह स्तर तक गिरावट, जल प्रबंधन का अभाव, जल संचय व संरक्षण में समाज की भागीदारी का पूर्णत: अभाव है।

    छोटे शहरों में अधिकांशत: जमीनी सतह का पक्का कर दिया जाना, अनियंत्रित व अनियोजित औद्योगिक विकास तथा विकास के वर्तमान ढांचे की अंधी दौड़ ने हमारी धरती को बंजर बनाने और पाताल के पानी के अत्याधिक दोहन में अहम भूमिका अदा की है। पानी देश और समाज की सबसे बड़ी जरूरत है। आइए, हम भूजल रिचार्ज प्रणाली पर विशेष ध्यान दें और बारिश के जल का संचय कर देश और समाज के हितार्थ अपनी भूमिका का सही मायने में निर्वाह करें। इसमें जल संचय के पारंपरिक तौर-तरीकों के इस्तेमाल की भूमिका अहम होगी, जिसे हम बिसार चुके हैं। यह संकल्प और प्रकृति के साथ जुड़ाव से ही संभव है। आज जरूरत इस बात की है कि हम सभी प्रकृति और प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का यथोचित सम्मान कर समाज को नयी दिशा देकर अपने राष्ट्रीय दायित्व का निर्वहन करते हुए जल संकट के निदान में अपना योगदान दें। यही सच्ची राष्ट्र सेवा होगी।

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