संयम, कैसे रखें, पूज्य गुरु जी ने बताया आसान तरीका

Ram Rahim

बरनावा। सच्चे रूहानी रहबर पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ( Ram Rahim) ने शाह सतनाम जी आश्रम, बरनावा (यूपी) से आॅनलाइन गुरुकुल के माध्यम से अपने अमृतमयी वचनों की वर्षा करते हुए जीवन में संयम को अपनाने का आह्वान किया। पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि आज पूरे संसार में इन्सान परेशान है, दुखी है, मुश्किलों में है और इसकी वजह है एक-दो नहीं बहुत सारी हैं।

एक वजह जनसंख्या का बढ़ना है। दूसरी वजह खान-पान में जहर है। तीसरी वजह सुनने-देखने में जहर है। अगली वजह अज्ञानता है। उससे आगे धर्म की अज्ञानता है और ये सबसे बड़ी वजह है। क्योंकि धर्म इन्सान को इतना कुछ सिखाता है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। धर्म का पहनावा पहनने वाले ज्यादा हैं, धर्म पर अमल करने वाले कम होते जा रहे हैं। धर्मों में संयम, संतोष शब्द का इस्तेमाल बहुत आता है, ये गहना होना चाहिए हर इन्सान का। लेकिन आज संयम खो रहा है तो जनसंख्या बढ़ रही है। संयम खो रहा है तो लड़ाई-झगड़े बढ़ रहे हैं। संयम खो रहा है तो दिगामी परेशानियां, टैंशन, मुश्किलें बढ़ रही हैं और जब-जब इन्सान संयम खोता है तो भयानक से भयानक युद्ध भी शुरू हो जाते हैं।

हंकार बुरी बला है | Ram Rahim

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि धर्म कहते हैं कि अहंकार को मार है। पर कौन ऐसा है जो अपने अहंकार को छोड़ देता है। बड़ा मुश्किल है अपनी इगो को रोकना, कंट्रोल करना। छोटी-छोटी बात तूफान खड़ा कर देती है। परिवार में, घर में इगो ही है जो भाई को भाई से लड़ाती है, इगो ही है जो माँ-बाप और बच्चों में झगड़ा पैदा कर देती है। इगो ही है जो मियां-बीबी में झगड़े करवा देती है। तो धर्म कहते हैं कि अहंकार ना करो। ‘‘मैं-मैं बुरी बला है, सको तो निकसो भाग’’, कि जो मैं-मैं है ये बड़ी बुरी बला है, खुदी, अहंकार। छोटी-छोटी बात को लेकर अहंकार होता है जो बहुत बड़ा रूप धारण कर लेता है। किसी को अपनी सुंदरता का अहंकार, किसी को धन-दौलत, जमीन-जायदाद का अहंकार, किसी को अपने रूतबे का अहंकार, किसी को राज-पहुंच का अहंकार, किसी को दिमाग यानि सूक्ष्म अहंकार, कि मैं जितना समझदार हूँ और दुनिया में वैसा पैदा ही नहीं हुआ। ये भूल जाता है कि भगवान ने सबको दिमाग दिया है, कौन कितना इस्तेमाल करता है वो एक अलग बात है, पर अगर मैं-मैं करके आप ये ही कहते रहें कि मैं ही सबकुछ जानता हूँ, मुझे ही सारा पता है तो ये अहंकार का रूप धारण कर लेता है।

धर्मों के अनुसार चलना ही गैरत

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि गैरत और अहंकार में बहुत फ़र्क होता है। गैरत, कि उसूल जो हैं धर्मों के उन पर चलना, कि भई हमने अच्छे कर्म करने हैं और अच्छे कर्म करते चले जाने हैं। ये गैरत के साथ ही कर सकता है आदमी। अच्छे कर्म करने वाले को रोकने, टोकने वाले दिन-रात सोचते रहते हैं, दांव चलाते रहते हैं, पर जो राम-नाम पर चलते हैं, जो नेकी-भलाई पर चलते हैं, वो उस तरफ ध्यान न देकर अपने रास्ते पर बढ़ते चले जाते हैं।

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कभी भी एकदम से मत भड़को | Ram Rahim

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि क्या आप पूरी दुनिया को खुश कर सकते हैं? अजी छोड़िए, घर के पाँच-चार मैंबर होते हैं वो नहीं खुश हो पाते, दुनिया तो बाद की बात है। बड़ा मुश्किल है सबको खुश कर पाना। सबकी सोच अलग-अलग, विचार अलग-अलग, इगो अलग-अलग। क्या पता किसकी इगो कब हर्ट हो जाए? और लेने के देने पड़ जाएं। इसलिए पहले धर्मों में लिखा है कि पहले तोलो, फिर बोलो, संयम, यहां भी संयम आ गया। फटाक से कोई बात ना कहो किसी को गलत, कोई आपको आकर ये कहता है कि फलां आदमी ने आपके बारे में गलत बोला और आप चढ़ दौड़ते हैं राशन पानी लेकर, ये गलत है। हो सकता है बताने वाला आपको लड़ाना चाहता हो, हो सकता है बताने वाले का आपको लड़ाकर अपना उल्लू सीधा करने का कोई तरीका हो, इसलिए संयम से सुनो, संयम धारण करो, उस दिन मत पूछो, अगले दिन जाकर उससे पूछो कि क्या आपने मुझे ऐसा कहा? अगर कहा तो क्यों? प्यार से, मोहब्बत से बात को निपटा लो।

एक दिन दे दोगे अपने आप को तो आपका पारा जो ऊपर चढ़ रहा था, नैच्युरली काफी हद तक काफी नीचे आया होगा, जब बात करने जाओगे। जब ताजा-ताजा बताता है आपके बारे में, कि फलां आदमी ने आपको गलत कहा, तो पारा एकदम, वो पक्षी सा होता है ना यूं चोंच मारने वाला, उसके ऊपर पारा चढ़ जाता है, ऐसे हो जाता है आपके साथ भी। इसलिए संयम ज़िंदगी में अपनाना बहुत जरूरी है। ये ही हमारे धर्मों में गहना बताया है। ये बहुत बड़ा गहना है और हर भक्त इसे पहने रहना चाहिए। एकदम सुर्इं ना उठाया करो, संयम रखा करो, अगर आप भक्त कहलाते हो, सभी धर्मों के भक्तजनों से हम कह रहे हैं कि अगर आप वास्तव में भक्ति करने वाले हो तो संयम आपका सबसे बड़ा गहना होना चाहिए और हमारे सारे धर्मों में ये लिखा मिलता है।

सभी धर्मों के पाक-पवित्र ग्रन्थों में, पीर-पैगम्बर, ऋषि-मुनि, गुरु साहिबान, संत सभी ने ये सार लिखा है कि आने वाली ज़िंदगी मनुष्य सुखमय तरीके से जी सके। इसलिए संयम रखना बेहद जरूरी है। जो संयम रखते हैं, उनके घरों में भी खुशी रहती है। और एक होते हैं कि सुनते ही भड़क जाते हैं, नहीं, ये थोड़ा सा आत्मबल की कमी को दर्शाता है। पहले पूरी बात सुनो, थोड़ा सा पॉज लो, कहने का मतलब विचार करो, यार इसका मतलब क्या है? कोई नहीं कहेगा कि आप चुप क्यों रहे बल्कि लोग खुश होंगे कि यार ये ध्यान से सुनता है, फिर विचारता है, फिर रिजल्ट देता है।

बच्चों की गलत बात कभी मत पूरा करो

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि अलग-अलग आदतें होती हैं, जो बचपन से बन जाया करती हैं। माँ-बाप की अनदेखी की वजह से, माँ-बाप के ज्यादा लाड़-दुलार की वजह से, इसके कारण हैं, बच्चे की नींव जैसी रखी जाती है बड़े होकर बिल्डिंग भी वैसी बनती है। शुरूआत में अच्छे संस्कार देना भी माँ-बाप का फ़र्ज है। ये गृहस्थ आश्रम जो आपको बोला, हमारे पवित्र वेदों में बताया हुआ है, उसी का एक अंश है। माँ-बाप का फ़र्ज है बच्चों के लिए समय देना, उनको देखना, आब्जरव करना कि ये बच्चा किस मिज़ाज का है। आप बच्चों का पालन-पोषण करते हो, आप कहते हो कि मैंने तो बढ़िया किया, सही है, अच्छा खिलाया, अच्छा पिलाया, अच्छे स्कूल में लगा दिया, अच्छे कपड़े, क्या यहीं बात समाप्त हो गई? जी नहीं, क्या आपने उसको जायज और नाजायज, सही और गलत के बारे में बताया। आपको लाडला हो जाता है, काफी देर बाद हो जाए और लाडला हो जाता है, हमारी रीत है।

जल्दी हो जाए तो ठीक ठाक लाड, कई सालों बाद हो जाए तो ज्यादा लाडला और जो लाडला बच्चा होता है उससे आप हद से ज्यादा प्यार करने लग जाते हैं, उसकी गलत बातों को भी आप मानने लग जाते हैं, यहां से शुरूआत होती है गलत नींव की, गलत आधार की, बेस आपने गलत बना दिया। कितना भी प्यारा हो आपको आपका बच्चा, उसकी गलत बात को कभी भी मानों ना और सही बात को, जहां तक संभव हो जरूर मानो। तभी स्ट्रॉन्ग नींव होगी, तभी स्ट्रॉन्ग बेस होगा। मजबूत नींव जब होती है तो भवन भी मजबूत बना करते हैं। उसको शुरूआत में पता लग जाए कि हाँ गलत तो गलत है, वो जिद्द नहीं मानी जाएगी, सही मानी जाएगी। थोड़ा बच्चा रो लिया, कई माँ-बाप साथ ही शुरू हो जाते हैं।

गुरु को भी मानो और गुरु की भी मानो

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि पुराने समय में, मान लीजिये 70 की बात। बच्चा रोता था तो कहा जाता था कि अच्छा है गला खुल जाएगा। मतलब असलियत में होता था कि उसकी गलत जिद्द नहीं माननी। तो वो थोड़ी देर रोकर ठीक हो जाता था। उसको पता है कि रोने से बात नहीं चली। ये बच्चा भी समझ लेता है कि ये हथियार है। कई माँ-बाप साथ ही सुबकने लग जाते हैं, ओहो बेबी, ओहो…बेबी क्या, बेबी के माँ-बाप भी बेबी बन जाते हैं। वो भी सुरड़-सुरड़, वो भी सुरड़-सुरड़। तो गलत बात मानोगे आप और गलत मान ली तो यकीन मानिये आप अपने बच्चे को गलत आदतें डाल रहे हो। स्ट्रोंगली थोड़ा सा व्यवहार रखना पड़ेगा।

निर्दयी मत बनिये, मारा-पिटी करना बिल्कुल गलत है। पर गलत आदत मानना ये उससे भी ज्यादा गलत है। तो इसलिए बच्चे की जायज मांग को, सही जो मांग है, उसी को मानो। तो ये धर्मों में संयम की ही बात है। क्योंकि संयम है तो आप उसे गलत चीज के लिए रोता देखकर पिघलेंगे नहीं, हालांकि माँ का दिल थोड़ा पिघलता है, लेकिन इसका मतलब ये थोड़ा ही है कि आप भी साथ रोने लग जाओ। फिर तो बच्चे ने हथियार बना लिया, कि गलत बात जब भी पूरी करवानी है रोओ, क्योंकि छोटे नाजुक होते हैं, ऊपर ही पड़ा होता है। झट से रोए और आँसू धड़ाधड़ मोटे-मोटे आए, बस इंजर-पिंजर माँ-बाप का हिल गया। और यकीन मानो बच्चा रोएगा ही नहीं जब उसे शुरूआत में पता चल गया कि गलत मांग गलत होती है, कि बेटा ये गलत है, ये नहीं होगा, रो चाहे हँस। दो-चार बार रोएगा, फिर कहेगा दूसरा कर लेते हैं। मोल्ड हो जाएगा, समझ जाएगा, तो आप यकीन मानो, धर्मों की बात को मानकर तो देखा। गुरु को मानता हूँ, गुरु की नहीं मानता हूँ ये चल रहा है ज्यादा। गुरु को भी मानो पर उससे ज्यादा गुरु की… मानो, यकीन मानो ज़िंदगी में बहारें, खुशियां छा जाएंगी।

ढोंग-ढकोसला मत करो

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि दिखावा ना करो। दिखावा, ढोंग-ढकोसले ना तो कभी परमानेंट रहते हैं और ना ही आपको याद रहते हैं, आपको पहले भी बोला था एक दिन कि झूठ बोलोगे तो आपको बार-बार याद रखना पड़ेगा और सच बोलोगे तो भूल जाओ, वो हमेशा ही सच रहेगा। तो संयम बेहद जरूरी है। और जो संयम से ज़िंदगी जीते हैं, शांतमय ज़िंदगी जीते हैं उन्हें ज़िंदगी की तमाम खुशियां जरूर मिला करती हैं।

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