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    दिल्ली चुनावों के परिणाम

    Delhi-Elections
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    दिल्ली विधानसभा चुनावों के परिणामों में आम आदमी पार्टी ने शानदार बहुमत हासिल कर लिया है व पार्टी लगातार तीसरी बार सरकार बनाएगी। चुनावों से पहले ही यह स्पष्ट हो गया था कि मुकाबला भाजपा व आम आदमी पार्टी के बीच ही होना है व कांग्रेस दूसरी बार भी कहीं नजर नहीं आ रही। चुनाव सर्वेक्षणों में भी यह बात दोहराई गई। वोट फीसदी में भाजपा ने पिछली बार से अधिक बढ़ोत्तरी हासिल की है। यह वोट फीसदी में एक बहुत बड़ा बदलाव है, जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता। इन चुनावों ने यह अवश्य साबित कर दिया है कि राष्ट्रीय मुद्दे व स्थानीय मुद्दे अलग-अलग असर डालते हैं। खास कर दिल्ली का मतदाता विधानसभा चुनावों या नगर-निगम चुनावों में स्थानीय मुद्दों को अहमियत देता है। भाजपा नेताओं ने अपने चुनाव प्रचार में शाहीन बाग को निशाने पर रखा। शाहीन बाग स्थानीय मुद्दा न होने के कारण भाजपा का निशाना चूक गया। वहीं दूसरी तरफ अरविन्द केजरीवाल ने इस मामले पर पूरी तरह चौकस रहते शाहीन बाग को चुनाव प्रचार का हिस्सा बनाने से परहेज किए रखा।
    केजरीवाल को यह बात अवश्य पता थी कि अगर गलती से भी वह शाहीन बाग चले गए तो राष्ट्रीय मुद्दे हावी हो जाएंगे। जीत-हार को एक तरफ रख चुनावों की अहमियत इस बात में है कि लोकतंत्र मजबूत हुआ है। भाजपा, आम आदमी पार्टी व कांग्रेस ने चुनावों में बडेÞ उत्साह से हिस्सा लिया है। स्थानीय मुद्दों को उभरने का पूरा मौका मिला है। चिंता वाली बात केवल यह है कि मतदान बहुत ही कम हुआ है। दिल्ली के मतदाताओं ने अधिक जोश नहीं दिखाया। मतदान का आंकड़ा 62 फीसदी तक ही सिमट कर रह गया जबकि 2015 के विधानसभा चुनावों में यह आंकड़ा 67 फीसदी था। पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में यह आंकड़ा 70 फीसदी को पार कर जाता है। महानगर के मतदाताओं को आम तौर पर अधिक पढ़ा-लिखा व जागरूक माना जाता है। चुनाव आयोग को इस बात पर भी अवश्य ध्यान देना चाहिए कि मतदान के आंकड़ें में किसी तरह सुधार किया जाए? कहीं हम लोकसभा चुनावों के लिए एक मतदाता के लिए भी पोलिंग बूथ बनाते हैं तो वहीं राजधानी में करीब 40 फीसदी मतदाताओं का वोट के अधिकार से वंचित रहना लोकतंत्र की कामयाबी पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। अच्छा हो अगर नई सरकार विकास कार्यों के साथ-साथ मतदान प्रति आमजन की जागरूकता को अपने एजेंडे में शामिल करे।

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