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    चचिया नगरी का ‘‘सचखंड धाम’’

    "Sachkhand Dham" of Chachia Nagri

    सच कहूँ स्पैशल स्टोरी : हसीन वादियों की खूबसरती को चार चांद लगाता

    (Sachkhand Dham of Chachia Nagri)

    •  देखने को मिलेगा प्राकृतिक सौंदर्य व आध्यात्मिक का अनूठा संगम

    •  पूज्य गुरु जी ने सन् 1995 में रखी थी हिमाचल प्रदेश के चचिया नगरी में आश्रम की नींव

    सच कहूँ/रविंद्र रियाज
    कांगड़ा। हिमाचल प्रदेश का नाम सामने आते ही आंखों में प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण तस्वीर उभरने लगती है। प्रदेश के जिला कांगड़ा की खूबसूरत वादियों में से चचिया नगरी का ‘‘परम पिता शाह सतनाम जी सचखंड धाम’’ वास्तव में सचखंड का नजारा प्रस्तुत करता है। जून, जुलाई व अगस्त के महीने में क्षेत्र का सौंदर्य और भी बढ़ जाता है। क्षेत्र में घूमने के लिए आने वाले पर्यटक आश्रम का भ्रमण भी करने आते हैं और यहां आकर प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ आध्यात्मिक लाभ भी उठाते हैं। हिमाचल की पहाड़ियों के बीच डेरा सच्चा सौदा के पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां द्वारा बनाए गए इस अद्भुत आश्रम की सुंदरता अद्वितीय है।

    जहां ‘तेरा वास’ वहां पूज्य सार्इं सावण शाह जी महाराज ने टिकाए थे पावन चरण

    ‘परम पिता शाह सतनाम जी सचखंड धाम’ चचिया नगरी का इतिहास रूहानियत की नजर से बेहद खास ओर रोचक है। हिमाचल की साध-संगत जब भी पूज्य गुरु जी से मिलती तो अर्ज करती थी कि ‘गुरु जी’ आप हिमाचल में आश्रम बनाएं। साध-संगत की अर्ज को कबूल करते हुए पूज्य गुरु जी ने सन् 1995 में इस आश्रम की नींव रखी। 1993 में आश्रम बनने से पहले पूज्य गुरु जी ने एक दिन सत्संग के उपरांत सेवादारों को वचन फरमाये कि बेटा! नगरी के ऊपर ये चढ़ाई है यहां आश्रम की जगह देखो। सेवादार वहां ऊपर चढ़ाई पर जगह देखने के लिए गए तो उन्हें भी व जगह बोहत पसंद आई। उसके बाद स्वयं पूज्य गुरु जी उस चढ़ाई पर जगह देखने के लिए गए।

    वहां पहुँचते ही पूज्य गुरु जी के मुखारविंद से वचन निकले कि ‘‘ऐसे लग रहा है ये जगह कुछ जानी पहचानी है हम यहां पहले भी आए हैं ’’ ये सुनकर सब सेवादार हैरान रह गए। उन्होंने डेरा सच्चा सौदा का इतिहास टटोला पूज्य बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज से लेकर पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज कभी हिमाचल वाली जगह पर नहीं पधारे थे ऐसे में सेवादारों ने चचिया नगरी के पुराने बुजुर्गों से पता कि तो उन्हें पता चला कि काफी सालों पहले इस स्थान पर पूज्य सार्इं सावण शाह जी महाराज ने चाय वाले बाग में सत्संग फरमाया था। जब ये बात पूज्य गुरु जी को बताई तो पूज्य गुरु जी ने कहा कि हमें भी लग रहा था कि ये जगह जानी-पहचानी है।

    ‘जिस जमीन को कृषि वैज्ञानिकों ने नकारा, वहां उग रहे कीवी, सेब, खुरमानी व जापानी फल’

    ऊंची-ऊंची पहाड़ियों की गोद में बने परम पिता शाह सतनाम जी सचखंड आश्रम की जब नींव रखी गई थी तब इस आश्रम की जमीन की सेम्पलिंग करवाई गई थी। उस वक़्त ये कहा गया था कि इस पहाड़ी क्षेत्र की जमीन पर सिर्फ चाय की खेती व गुलाब ही ही हो सकता है। लेकिन संतों की रमज को इंसान कहां समझ सकते हैं। सन्त चाहें तो पल भर में समुद्र को अमृत बनादें।

    पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की देखरेख में व पालमपुर यूनिवर्सिटी के कृषि वैज्ञानिकों की मेहनत से यहां आज चाय की खेती के साथ-साथ औषधीय, फल-फूल व विभिन्न सब्जियों की फसलें उगाई जा रही है। फ्लोरी कलचर में इस आश्रम में सैंकड़ो प्रकार के फूल हैं जो अपनी आभा भिखरे हुए हैं। फलों की खेती में यहां बबुगोशे, नाशपाती, पालम, सेब, अनार, कीवी, खुरमानी, जापानी फल, आड़ू की बागवानी की जा रही है। जबकि सब्जियों में यहां तीन प्रकार की लाल, पीली व हरि शिमला मिर्च, पता गोभी, बन्द गोभी, खीरे, पहाड़ी आलू, हरि मिर्च, टमाटर, ब्रोकली, लौकी घीया, तोरी, मशरूम, पहाड़ी मशरूम सहित अन्य सब्जियों की पैदावार की जा रही है।

    Chachia Nagri

    Sachkhand-Dham

    जब तीसरी बॉडी में पूज्य गुरु जी ने पूरीकी आश्रम बनाने की अर्ज

    सन् 1980 के आस-पास जिला कांगड़ा के रहने वाले सूबेदार उत्तम सिंह ने डेरा सच्चा सौदा की दूसरी
    पातशाही पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज से मलोट (पंजाब) में नाम की अनमोल दात प्राप्त की। सूबेदार का दिन प्रतिदिन पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज से रूहानी लगाव बढ़ता गया। जब भी उत्तम सिंह पूजनीय परम पिता जी से मिलता तो हमेशा एक ही अरदास करता कि आप जी, यहां हिमाचल में आश्रम का निर्माण करवाएं। ताकि यहां के लोग बुराइयों को छोड़कर रामनाम से जुड़ सकें। जवाब में पूजनीय परम पिता जी ये रूहानी वचन फरमाते कि ‘‘बेटा! तुम चिंता ना करो देखते हंै। इसके बाद 1995 में जब पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने आश्रम निर्माण की नींव रखी तो पूज्य गुरु जी सूबेदार उत्तम सिंह से कहा कि ‘‘बेटा आप हमें हमेशा आश्रम बनाने की अर्ज करते थे, लो बना दिया आश्रम अब संभालो इसे’’। तब से लेकर अब तक हिमाचल की साध-संगत इस आश्रम की सार सम्भाल देखती है।

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    विदेशों में भी जाती है आश्रम की बह्मी

    परम पिता शाह सतनाम जी सचखंड धाम चचिया नगरी में पिछले 15 सालों से खेतीबाड़ी की देखरेख कर रहे सत् बह्मचारी प्रीतपाल इन्सां का कहना है कि पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के मार्गदर्शन में परम्परागत खेतीबाड़ी के साथ-साथ आधुनिक तकनीकी से भी फसलों की पैदावार की जाती है। इस आश्रम में 6 बड़े पॉली हाऊस बनाएं गए हैं। जिसमें सीजेनेवल सब्जियों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर बह्मी की पैदावार की जाती है। जिसकी बेहतरीन गुणवता के कारण भारत ही नहीं विदेशों में भी इसकी डिमांड है। वहीं इस आश्रम में पैदा की जा रही जड़ी बूटियों की बात करें तो यहां बड़ी इलायजी, अकरकरा (दांतों की पेस्ट), स्टिीविया, कचूर (हिमाचलीय फल), अंब हल्दी (मेडिकल हल्थी), श्याम तुलसी, राम तुलसी, बायेवढ़िंग (पेट के कीड़ों की दवाई), लैमन ग्रास सहित अन्य औषधीय पौधों की पैदावार की जा रही है।

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    साध-संगत व सेवादारों की जुबानी

    ‘‘मैंने 1997 में पूज्य गुरु जी से नामदान लिया। यहां ज्यादातर लोग मांस व शराब का सेवन करते हैं। 1993 में पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने यहां सत्संग फरमाया। पूज्य गुरु जी के अनमोल वचनों को सुनने के बाद लाखों लोगों ने नशा व मांस का सेवन छोड़कर इंसानियत व मानवता का रास्ता अपनाया। पूज्य गुरु जी की पावन शिक्षा का ही ये असर है कि आज लोग 135 मानवता भलाई कार्यों में अग्रसर हैं।

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    -45 मैंबर नर सिहं इन्सां, हिमाचल।

    ‘‘जब पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने सन् 1993 में हिमाचल प्रदेश में जब सत्संग फरमाया, उस वक़्त मुझे नाम दान की प्राप्ति हुई। जब से मैं डेरा सच्चा सौदा से जुड़ा तब से मेरे अंदर मानवीयता की पहचान होने लगी, दीनता-नम्रता मुझमें अपने आप आती चली गई। ऐसा परिवर्तन देख कर मैं स्वयं हैरान रह गया था। उसके बाद आज तक मैंने पूज्य गुरु जी का पल्ला नहीं छोड़ा, उनसे जुड़ने के बाद हर तरफ मुझे व मेरे परिवार को उन्नति सुख सम्रद्धि ही प्राप्त हुई है। ओर ये सब पूज्य गुरु जी की रहमत की बदौलत ही संभंव हो पाया है।

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    -अशोक करवल, एडवोकेट पालमपुर (हिमाचल)।

    ‘‘पूज्य गुरु जी ने यहां आश्रम बनाकर हम पर बहुत पड़ा उपकार किया है। मैंने 1999 में पूज्य गुरु जी से नाम की अनमोल दात प्राप्त की थी। गुरुमंत्र लेने के बाद ही हमें सही अर्थों में रूहानियत का पता चला। पूज्य गुरु जी द्वारा किए सत्संगों को सुनकर जीवन में काफी बदलाव भी आया और पूज्य गुरु जी पावन वचनों का भी असर है कि आज मेरा पूरा परिवार मानवता की सेवा में जुटा है। वहीं आश्रम में रोजाना सुबह 6 बजे लंगर की सेवा करने का भी सौभाग्य मिला हुआ है।

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    -सत्या देवी इन्सां, नगरी, हिमाचल।

    ‘‘मैंने 1993 में जब शाह मस्ताना जी धाम (सरसा) से नाम दान प्राप्त किया तो उस समय मेरी आयु 7 वर्ष की थी। पहली बार जब पूज्य गुुरु जी के रूहानी स्वरूप के दर्शन किए तो ऐसा लगा मानो खुद भगवान ही धरती पर उतर आया हो। बचपन से ही पूज्य गुरु जी ने मेरा ऐसा हाथ पकड़ा कि मैं बुराइयों से बचकर आज इंसानियत व मानवता की सेवा में जुटा हुआ हूँ। मैं पूज्य गुरु जी को कोटि-कोटि धन्यवाद करता हूँ कि हमें नामदान देकर ‘इन्सां’ बनाया।

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    -संजय इन्सां, मंडी, हिमाचल।

    ‘‘पूज्य गुरु जी से 1995 में नामदान लेने के बाद ही मुझे जीने का सही मकसद मिला। नामदान से पहले मेरी पत्नी को थाईराईड की बीमारी थी। मैंने पूरे हिमाचल में कई डॉक्टरों का इलाज करवाया, लेकिन कोई राहत नहीं मिली। लेकिन जब 1995 में मैंने और पत्नी ने हिमाचल आश्रम में पूज्य गुरु जी से नामदान लिया और उसके बाद आश्रम में सेवा की और लंगर ग्रहण किया। जिसके बाद मेरी पत्नी का थाईराईड कहां गया ये पता ही नहीं चला। हमने डॉक्टरों से भी चेकअप करवाया लेकिन रिपोर्ट में थाईराईड था ही नहीं।

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    -राकेश इन्सां ब्लॉक भंगीदास।

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