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    …जब सोमनाथ को मौत के मुंह से निकाल लाए सतगुरू

    अक्सर हम छोटी-मोटी परेशानियों में घिर कर हिम्मत हार बैठते हैं। कई लोग तो बुरे वक्त के ख्याल भर से काँप उठते हैं। लेकिन अगर मुश्किलों का डटकर सामना किया जाए तो उन्हें भी खुद पीछे हटना पड़ता है। आज की साखी एक ऐसे ही शख़्स के जीवन से जुड़ी सच्ची घटना पर आधारित है।

    जो एक वक्त मौत के मुहाने पर खड़ा था। पल-पल मौत उसकी ओर कदम बढ़ा रही थी। ठीक होने की उम्मीद को डॉक्टरों ने यह कहकर खत्म कर दिया कि अब ये इस दुनिया में कुछ दिनों का मेहमान है। पूरा परिवार गहरे सदमे में चला गया। लेकिन वो शख़्स हिम्मत न हारा और अपनी असीम आस्था और दृढ़ विश्वास के सहारे इस मुश्किल वक्त पर ऐसे जीत पा गया मानों उसकी ज़िदंगी में कोई परेशानी आई ही न हो।

    साध-संगत जी बात सन् 1993 की है। प्रेमी सोमनाथ पुत्र श्री अर्जुन दास गाँव रामपुर, डाकखाना सरहेड़ी, जिला अंबाला को अचानक गले की खुराक नली में तकलीफ हो गई। वो थोड़ा कुछ खाने की कोशिश करता तो उल्टी आ जाती। लेकिन जिंदा रहने की ख़्वाहिश में मजबूर होकर थोड़ा बहुत खा लेता। उसके गले में असहनीय दर्द था, जो बढ़ता जा रहा था।

    परेशानी की हालत में वो अंबाला के एक प्राइवेट डॉक्टर के पास पहुंचा। डॉक्टर ने एक्स-रे करवाने के लिए कहा। सोमनाथ ने जैसे ही एक्स-रे करवाकर डॉक्टर को रिपोर्ट सौंपी तो डॉक्टर हैरान रह गया। डॉक्टर ने कहा कि इस रोग का इलाज मैं नहीं कर पाऊंगा, ये मेरे वश से बाहर की बात है। डॉक्टर का जवाब सुनकर सोमनाथ सन्न रह गया। तब डॉक्टर ने कहा कि आप पीजीआई चंडीगढ़ में दिखाओ।

    अगले दिन सोमनाथ एक रिश्तेदार को साथ लेकर पीजीआई में पहुंच गया। वहां डॉक्टर ने अगले हफ्ते आने को बोल दिया। ये सुनकर सोमनाथ घर वापिस लौट आया। उसकी तकलीफ दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी। वो अगले दिन मिशन अस्पताल अंबाला में पहुंचा। डॉक्टर ने जब उसका एक्स-रे देखा तो पूछा कि क्या तुम अकेले आए हो? उसने जवाब दिया, ‘‘हाँ’’। तो डॉक्टर ने कहा कि आप अपने किसी परिवार वाले या रिश्तेदार को साथ लाइए।

    जब सोमनाथ ने डॉक्टर से बीमारी के बारे में पूछा तो उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। अगले दिन सोमनाथ अपने बड़े भाई को साथ लेकर फिर मिशन अस्पताल अंबाला में पहुंचा। डॉक्टर ने धीरे से उसके बड़े भाई के कान में कोई बात कही और उससे एक कागज पर हस्ताक्षर करवा लिए।

    इस पर सोमनाथ थोड़ा असहज हो गया। फिर उसे अस्पताल में भर्ती कर लिया गया। अस्पताल में डॉक्टरों ने सोमनाथ को बेहोश करके उसकी खुराक नली से सैंपल के तौर पर एक मांस का टुकड़ा निकाला और उसे सीएमसी लुधियाना में भेज दिया।

    जब सोमनाथ की रिपोर्ट आई तो डॉक्टरों ने उसके परिवार वालों को बताया कि उसकी खुराक नली में कैंसर फैल चुका है। ये बात सुनकर परिवार के लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई। डॉक्टरों ने सोमनाथ को तुरंत सी.एम.सी. लुधियाना ले जाने की सलाह दी।

    परिवार के लोग सोमनाथ को सी.एम.सी. लुधियाना में लेकर पहुंचे और उसके कई टेस्ट करवाए गए। तब डॉक्टरों ने पूरी तरह कन्फर्म कर दिया कि सोमनाथ की खुराक नली में कैंसर ही है। इस पर डॉक्टरों ने सोमनाथ को कैंसर की दवाईयां दी और कई बार सेंके लगाए।

    लेकिन उसकी हालत सुधरने की बजाय और बिगड़ती चली गई। अब वो सूखकर कर कांटे जैसा हो गया। डेरा सच्चा सौदा में पहुंचकर वो पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां से मिला और अपनी पूरी व्यथा उनके सामने रख दी। तब पूज्य जी ने सोमनाथ को वचन फरमाया, बेटा! जहां से दवाई खाई है, वहां से चैकअप करवाते रहना। यहां दरबार से भी दवाई ले जाओ। आधा-पौना घंटा सुमिरन करके ही दवाई लेनी है।

    पूज्य गुरू जी ने इसके साथ ही अपनी पावन दृष्टि वाला प्रशाद भी उसे दिलवाया। तभी एक अचंभित करने वाली बात हुई। खाने-पीने में असमर्थ सोमनाथ पूज्य गुरु जी की पावन दृष्टि वाला प्रशाद एकदम से ऐसे खा गया मानों उसे कोई परेशानी ही न हो। इसके बाद सोमनाथ धीरे-धीरे सब कुछ खाने लगा।

    वो डेरा सच्चा सौदा से दवाई ले जाता और राम नाम का जाप करके उस दवाई को खा लेता। ये सिलसिला तीन-चार महीने तक लगातार चलता रहा। इसके बाद वो पूज्य गुरू जी के वचनानुसार एक दिन सी.एम.सी. लुधियाना में अपनी जांच करवाने के लिए पहुंच गया। सोमनाथ को देखकर डॉक्टर भी भौचक्के रह गए। उन्होंने सोमनाथ से पूछा कि कहां से दवाई खाता है?

    तो सोमनाथ ने तपाक से जवाब दिया, मैं डेरा सच्चा सौदा में जाता हूँ और मैंने पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की पावन दृष्टि वाला प्रसाद खाया है और वहीं की दवाई खा रहा हूँ। डॉक्टरों ने सोमनाथ की जांच आदि की और रिपोर्ट देखकर कहा कि तू अब बिल्कुल ठीक है।

    तेरे साथ वाले तो कब के इस दुनिया से चले गए हैं। एक तू ही बचा है। जैसे ही डॉक्टर सोमनाथ को ये शब्द बोले तो सोमनाथ वैराग्य से भर गया और दोनों हाथ जोड़कर बार-बार अपने सतगुरू का शुक्राना करने लगा। इस तरह सतगुरु ने उसे जीवनदान देकर उसके परिवार को खुशियों से भर दिया।

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