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    पूजनीय बेपरवाह साईं शाह मस्ताना जी महाराज के पवित्र ईलाही वचन

    Mastana Balochistani - Sach Kahoon

    हर एक फकीर अपने मुुर्शिद के नाम पर मस्त हुआ है। उसी के प्यार में ही मालिक तक पहुंचा है और उसी का धन्यवाद करता है। मालिक प्रेम है और उसके मिलने का रास्ता भी प्रेम ही है, जिसने पाया है मुर्शिद में जज्ब होकर ही पाया है। दो बातें याद रखना। एक दिन जरूर मरना है और दूसरा सतगुरू ने लेखा जरूर लेना है। काल को दीनता के जोर से जो भी मारे वो ही पूरा आशिक है। प्रेम के होने से दीनता भी आएगी। जो अच्छा किया सतगुरू जी ने किया, जो बुरा किया मन ने करवाया।

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    सत्संगी को अपने सतगुरू से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे सतगुरू ! हम आपसे वायदा करते हैं कि हमारा यह तन, मन और धन सब तेरा ही है। इसे इन्सानियत की सेवा लगाने की ताकत बख्शो। जिस तरह भी हो सके हमें अपना बना लो। अपनी भक्ति, अच्छे लोगों की संगत और आपकी याद हमेशा दिलों में बनी रहे, यही हमारी आपसे अरदास है।

    प्रेम के मार्ग में अत्यंत बाधाएं आती हैं। मैं-मैं और तंू-तूं का सवाल ही नहीं उठता। अहंकार को मात देकर ही प्रेम की गली में जाया जा सकता है। जहां अहंकार हैं वहां परमात्मा का वास नहीं होता। सुमिरन ऐसा करें कि ये पता न रहे कि सुुमिरन है कि मैं हूं।

    प्रेम में सतगुरू के सिवाए और किसी के लिए जगह नहीं रहती और अपने प्रीतम के साथ जुड़े रहना ही भक्त मांगते हैं। प्रीतम की गली के भिखारी प्रेम में सदा मस्त रहते हैं। सुमिरन में सारी रात गुजारना, मन के साथ लड़ना और जीते-जी मरना ही सच्ची शहादत पाना है। जब तक अपना सर्वस्व सतगुरू के हवाले नहीं कर देते तब तक मन से अहंकार नहीं निकलेगा।

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    जो भक्त अपने सतगुरू प्रीतम की याद में डूब जाता है तो दुनिया की कोई चीज उसे याद नहीं रहती। सिवाय अपने मुर्शिद के कुछ और नजर नहीं आता। जिसने अपनी नजर दुनिया की तरफ से हटा ली यानि आंखें बंद कर ली, उसी ने अपनी सूरत को दसवें द्वार में पहुंचाया। फिर वह उस कैफियत (रूहानी नजारों) को आवाम को कैसे दिखा सकता है।
    तूने अपने अनगिनत श्वास विषय-विकारों में ऐसे ही गुजार दिए। यदि तू अपने प्यारे सतगुरू से लिव लगाए तो उस सच्चे मुर्शिद के दर्श-दीदार करने के काबिल बन सकता है। सुमिरन करने से रूह को रूहानी खुराक मिलती है। सतगुरू का रूहानी सत्संग सुनने से जन्मों-जन्मों के पाप कर्म धुल जाते हैं। इश्क समझीं मखौल ना, सौदा न समझीं बाजार दा। तुम याद रखो कि सतगुरू से इश्क कमाना आसान नहीं है। कांटों पर चलने के समान है। तुम उस मालिक से प्रीत लगाओ फिर सब काम सतगुरू करेगा।

    एक भक्त की सतगुरू के साथ ऐसी प्रीत होनी चाहिए कि जैसे बच्चे की माता से। जब वो अपनी माता का दूध पीता है, उसको कोई छुड़ाए तो वह बेहद व्याकु ल हो उठता है और जो गुरू को छोड़कर चले जाए, उनका ख्याल भी न करे, अपनी पत्नी व पुत्र को एक रात भी न छोड़े तथा गुरू को महीने-महीने तक छोड़ दे तो ऐसी प्रीत का क्या फायदा। तब उनका उद्धार कैसे होगा? इसलिए जो भी जीव आवागमन से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे अपने सतगुरू के वचनों पर पूर्ण विश्वास कर अमल करना चाहिए तभी उसके सब कार्य पूर्ण होंगे।

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