जब सतगुरु ने जान बख्शकर नौ बर नौ कर दी थी आँखों की रोशनी

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Shah Satnam Singh Ji

डेरा सच्चा सौदा दरबार सरसा से सत् ब्रह्मचारी सेवादार गुरबख्श सिंह जी अपने सतगुरु प्यारे की अपार बख्शिश का एक प्रत्यक्ष करिश्मा इस प्रकार ब्यान करता है। सन् 1969 में मुझे नाम की बख्शिश हुई। उन दिनों मैं रतिया में अपने घर में रहा करता था। सन् 1970 में एक बार जब मैं साध-संगत के साथ भूूतने गाँव से नाम चर्चा के बाद वापिस रतिया आ रहा था तो रास्ते में एक जम्प पर मैं ट्रैक्टर के मडगार्ड से उछल कर नीचे जा गिरा और ट्राली का एक टायर मेरी पीठ पर से गुजर गया। संगत ने तुरंत मुझे संभाला। मैं बेहोश था। मुझे टोहाना अस्पताल में दाखिल करवाया गया। डॉक्टरों ने यह कहकर जवाब दे दिया कि मरीज की पसलियां बैठ गई हैं।

इसलिए यह केस हमारी समझ से बाहर है और न ही यहां पर इतना इन्तजाम हो सकता है। मैं उस समय भी बेहोश था। मुझे अपने आप का कुछ भी पता नहीं था। मुझे अपने सतगुरु पूज्य परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के दर्शन होते रहे। मुझे आखिर वापिस रतिया मेरे घर पर लाया गया। एक दिन मैं बहुत परेशान था। मुझे परम पिता जी के दर्शन हुए। कुल मालिक जी ने वचन फरमाया, ‘‘बेटा! घबरा ना! तेरा कुछ नहीं बिगड़ता। जल्दी ठीक हो जाएगा।’’ बस! फिर क्या देर थी। कुल मालिक के वचनों के अनुसार मैं एक हफ्ते के अन्दर ही लाठी का सहारा लेकर चलने लग गया और कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो गया।

पूज्य परम पिता जी कृपा हुई। सन् 1974 में मैंने पक्के तौर पर दरबार में सेवा करनी आरम्भ कर दी। मैं सिलाई की सेवा किया करता। सन् 1970 में मेरे डेढ़ नम्बर की ऐनक लगी हुई थी। सिलाई तुरपाई आदि जितना भी बारीक काम था। वह ऐनक लगा कर ही किया करता था। ऐनक लगाए बिना तो मैं सुई में धागा भी नहीं डाल सकता था। सन् 1980 की बात है। एक बार मैं शहनशाही गुफा में बैठा काम कर रहा था। गर्म-कपड़ों की सिलाई की सेवा चल रही थी। काम बहुत बारीकी का था। मेरी ऐनक बार-बार नीचे को लुढ़क जाती, इस प्रकार ऐनक से मैं बहुत परेशान हो गया था, परन्तु मजबूरी थी कि ऐनक लगाए बिना तो मैं एक टांका भी नहीं लगा सकता था।

अचानक अन्तर्यामी दयालु दातार जी मेरे पास आकर विराजमान हो गए। शहनशाह जी ने बारी-बारी से सभी सेवादारों की कुशलता के बारे में पूछकर उन्हें अत्यंत खुशी प्रदान की। फिर मुझ से हंसते हुए फरमाया, ‘‘भाई! तेरी ऐनक कैसे कभी नीचे हो जाती है और कभी ऊपर हो जाती है।’’ इस पर मैंने अपने मन की बात अपने प्यारे प्रियतम के चरणों में इस प्रकार बयान कर दी। पिता जी! ऐनक से यह काम ठीक नहीं आता। यह बार-बार गिर जाती है। बेपरसाई सार्इं जी ने फरमाया, ‘‘फिक्र न कर। ऐनक की जरूरत हीं नहीं रहेगी। ऐनक के बिना ही काम चल जाया करेगा।’’

कुल मालिक का वचन सदा अटल है। अपने प्यारे दिलबर पूज्य परम पिता जी के प्रति मेरा दृढ़ विश्वास था। मालिक स्वयं ही अपने जीव को विश्वास करवाता है। मैंने उसी दिन ही ऐनक को उतार दिया, तब मेरी आयु लगभग 63-64 वर्ष की थी। मैं सिलाई, तुरपाई आदि का बारीक से बारीक काम भी बिना ऐनक लगाए कर लेता। पूज्य परम पिता जी के वचनों के अनुसार मुझे फिर कभी भी ऐनक लगाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। यहां तक कि सुई में धागा डालना तथा बारीक तुरपाई आदि का काम भी मैं बिना ऐनक लगाए बड़ी सुगमता से कर लेता। एक बार मैंने एक स्पैशलिस्ट डॉक्टर से अपनी नजर टैस्ट करवाई। मेहरबान शहनशाह जी के वचनानुसार मेरी नजदीक व दूर दोनों तरह से दृष्टि ज्यों की त्यों बरकरार थी। यह सब पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के पवित्र मुख वचनों के द्वारा ही संभव हुआ।

 

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