हमारे जीवन का एक ही उद्देश्य मानवता की सेवा : पूज्य गुरू जी

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  • आनलाइन गुरूकुल के माध्यम से डॉ. एमएसजी ने अनमोल वचनों से साध-संगत को किया निहाल
  • बड़ी तदात में लोगों ने छोड़ा नशा व बुराईयां, मानवता सेवा का लिया संकल्प

बरनावा/सरसा। पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने (Spiritual Discourse from Barnawa) आनलाइन गुरूकुल के माध्यम से रूहानी सत्संग में अपने अमृतमयी वचनों की वर्षा करते हुए आमजन को जीवन की हकीकत से रूबरू करवाया। इस अवसर पर पूज्य गुरू जी ने सत्संग के महत्व पर प्रकाश डाला। साथ ही वर्तमान दौर के बारे में बताया कि आज के युग में इन्सान अपने दु:ख से दु:खी नहीं है बल्कि दूसरों को सुख से ज्यादा दु:खी नजर आता है। पूज्य गुरू जी ने फरमाया कि हमारे जीवन का एक ही उद्देश्य है मानवता की सेवा करना। ताकि समाज में सभी लोग सुखमय जीवन जीते हुए मालिक की खुशियों को प्राप्त करें। इस अवसर पर पूज्य गुरू जी ने शाह सतनाम जी आश्रम, बरनावा से आॅनलाइन हरियाणा के फतेहाबाद, पंजाब के पटियाला, राजस्थान के अलवर और उत्तर प्रदेश के आगरा में हजारों लोगों का नशा और बुराईयां छुड़वाकर गुरूमंत्र दिया। इसके साथ ही देश-विदेश में विभिन्न स्थानों पर भारी तादाद में साध-संगत ने पूज्य गुरू जी के पावन वचनों को एकाग्रचित होकर श्रवण किया।

ओउम, हरि, अल्लाह, राम कण-कण, जर्रे-जर्रे में मौजूद

पूज्य गुरू जी ने फरमाया कि आज आपको मालिक की चर्चा सुनाते हैं, सत्संग के बारे में बात करेंगे। सत्संग क्यों जरूरी है, किस लिए जरूरी है और सत्संग में आना चाहिए ये संत, पीर-फकीर हमेशा बोला करते हैं। सत्संग का मतलब, मीनिंग क्या है? सत् संग, सत् सच, सत्य एक ही है ओउम, हरि, अल्लाह वाहेगुरू, गॉड, खुदा, राम और परमपिता परमात्मा, उसके अलावा दुनिया की हर शय बदल जाती है, हर चीज बदल जाती है पर भगवान, ओउम, हरि, अल्लाह, वाहेगुरू राम ना कभी बदला था, ना कभी बदला है और ना कभी बदलेगा। वो सच था, सच है और सच ही रहेगा। तो हर समय, हर पल, हर जगह वो मौजूद है, दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं, जो एक ही होते हुए भी हर समय, हर जगह, हर पल मौजूद रहती है, पर ओउम, हरि, अल्लाह राम एक होते हुए भी हमारी इस दुनिया में ही नहीं, एक त्रिलोकी में नहीं, सैकड़ों त्रिलोकियां तो धर्मों में लिखी हुई हैं, वहां पर भी वो है, निजधाम, सचखंड़, सतलोक, अनामी, सतनामी सब जगह वो रहता है, कोई जगह उससे खाली नहीं हैं। और कमाल उसका ये है, वो जिस भी चीज को देखता है, उसी का रूप धारण कर लेता है। कण-कण, जर्रे-जर्रे में मौजूद है। पेड़-पौधे ले लीजिये, जीव जन्तु ले लीजिये, पशु-पक्षी, परिंदे ले लीजिये, हर जगह वो है।

मैथड, वो युक्ति, वो तरीका है जिससे आप
अपनी शक्तियों को बढ़ा सकते हैं: पूज्य गुरु जी

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि सत्संग में जब इन्सान आता है, सुनता है तो उसकी समझ में आता है, कि हाँ, एक ऐसी सुप्रीम पावर है, एक ऐसी शक्ति है, जो हर समय, हर जगह मौजूद है। तो सत्संग क्यों जरूरी है, आदमी कहता है कि मैं क्यों करूं सत्संग, किस लिए करूं सत्संग? क्या आप जानते हैं कि आप कितनी शक्तियों के धनी हैं। शायद आप सोचते हों कि मैं तो सब जानता हूँ, मेरे में इतनी अकल है, मैं इतना पढ़ा लिखा हूँ, मेरे में इतनी समझ है, मेरी बॉडी स्टैन्थ ये है, मेरी माइंड स्टैन्थ ये है, इत्यादि-इत्यादि। तो आप सोचेंगे कि मेरे को तो सारा पता है, जी नहीं, ये तो 100 पर्सेंट में से 1, 2 पर्सेंट ही आपको पता है। यहां तक साइंटिस्टों की बात करें तो वो भी कह रहे हैं कि हम तो इन्सानी शरीर को 10 से 15 पर्सेंट ही पढ़ पाए हैं। तो हमारे धर्मों में ये बताया गया है कि अगर आप अपनी स्ट्रैन्थ, सोचने की शक्ति, शारीरिक शक्ति यानि आत्मिक, मानसिक, शारीरिक शांति चाहते हैं, शक्तियों को बढ़ाना चाहते हैं तो आप इसके योग्य हैं मनुष्य, जो अपनी शक्ति को बढ़ा सकता है, पर कैसे? क्योंकि वो शक्तियां आपके अंदर हैं और बढ़ाने के लिए एक स्कूल, कॉलेज अगर कोई है तो वो सत्संग है, जहां बताया जाता है वो मैथड, वो युक्ति, वो तरीका जिसको अपनाकर आप अपनी इन शक्तियों को अपने अंदर से हासिल कर सकते हैं।

सत्संग में जितनी बार आओगे, कुछ नया लेकर जाओगे

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि अच्छा खाना बनाना हो तो अच्छा शैफ, रसोइया, महाराज भी कहते हैं राजस्थान साइड में, तो उससे आप टिप्स लेंगे तो आप और अच्छी रसोई बना लेंगे, जितनों के संपर्क में आएंगे, उतना ही आप नई-नई चीजें सीखते जाएंगे। हर क्षेत्र में ये अनुभव जरूरी है। बहुत सारी चीजें होती हैं, जो आप पढ़ लिखकर, अपने दिमाग के ज्ञान से सीखते हैं, पर एक चीज उम्र होती है जो आपको बहुत कुछ सिखती है, तर्जुबा होता है, जो आपको बहुत कुछ सिखाता है। उसी तरह सत्संग में जितनी बार आओगे, जितनी बार सुनोगे, हर आर आप कुछ नया लेकर जाओगे। हर बार आप अपने लिए, अपने परिवार के लिए , समाज के लिए ,देश के लिए , वर्ल्ड के लिए , आपकी सोच की लिमिट जहां तक है,कुछ ना कुछ अच्छा ही करने के लिए प्रेरित होकर जाओगे। कभी भी सत्संग में घर पाड़ने के लिए या बर्बाद करने के लिए नहीं सिखाया जाता।

आज आदमी दुखी ज्यादा इसलिए है क्योंकि दूसरा ज्यादा सुखी है

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि आज सत्संग को अगर छोड़ दें, संतों को छोड़ दें, सच्चे संत, बाकी समाज में ज्यादातर लोग दु:खी है। और दु:ख का कारण जब आप सुनोगे, हैरान भी होगे और मानोगे भी, स्वीकार भी करोगे, अपने दु:ख से दुखी बहुत कम लोग हैं, दूसरा ज्यादा सुखी क्यों है इससे दु:खी बहुत मिल जाएंगे। यार मेरे पास स्कूटर, ये कार ले गया धुंआ मुंह पर मार गया, मरता क्यों नहीं ये। ये नहीं कहता कि मुझे भी कार मिल जाए, वो बर्बाद क्यों नहीं होता। भाई क्या मिलेगा तुझे ऐसा करने से, अपने लिए अच्छा मांग। तो इस पर भजनों की भी रचना की है, नए जो भजन आपको बोलते हैं, जो 800 के करीब हमने भजन बनाए, गुरू जी की कृपा से, बेपरवाह जी ने रहमोकर्म किया, उन्होंने बनवाए, उन्होंने बनाए, तो उनमें ऐसा भी भजन है, कि आज आदमी दुखी ज्यादा इसलिए है क्योंकि दूसरा ज्यादा सुखी क्यों है। लेकिन सत्संग में ऐसा नहीं है।

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि दुनिया में, आपको पहले भी कई बार सुनाया, गाँव की अगर बात करें तो एक सांझी सी जगह होती है, अलग-अलग एरिया में उसका अलग-अलग नाम है, पंजाब में सथ कह देते हैं, कोई पंचायत घर कह देते हैं, कोई कुछ कहते हैं, अलग-अलग नाम हैं। वहां बुजुर्ग बैठे रहते हैं, ताश के पत्ते खेलते हैं, खुंड चर्चा भी बोलते हैं उसको। तो वहां अगर कोई गिरता पड़ता नौजवान आता है नशे में धुत्त शाम के टाइम तो एक आधा सवाल उठाता है कि यार देखना उधर, हमारी कानों सुनी बात, आँखों देखी, दूसरा क्या कहता है, कहता यार देखने वाली क्या बात है? ये इसकी उम्र है खाने पीने की, अब नहीं करेगा तो कब करेगा, पर असली भावना क्या होती है अंदर से, वो गाली देकर बोलते अच्छा है ये बर्बाद होगा। अंदर भावना ये होती है। और अगर कोई राम-नाम की चर्चा सुनने के लिए जाता है, आप लोगों ने भी फील किया होगा या फेस किया होगा, हाथ में बैग है, वो बैठे लोग क्या कहते हैं तीसरे दिन चल पड़ता है उठाके बैग सा, क्या ले लेगा, घर में बच्चे भूखे मरेंगे। होता है कि नहीं होता, जी सारे लोग हाथ उठाकर कह रहे हैं कि जी, हाँ ये हमने ये कभी ना कभी फेस किया है। तो अब ये बताइए आप लोग जब सत्संग में आते हैं, राम-नाम के भक्त राम-नाम गाने के लिए, सुनने के लिए आते हैं, क्या आप बाद में जाकर उन लोगों से कुछ मांगते हैं, नहीं ना, तो उनको तकलीफ क्यों हो रही है, कि ये तीसरे दिन क्यों चल देते हैं, इतने-इतने लोग क्यों इकट्Þठे हो जाते हैं, उनको तकलीफ इसलिए होती है, कि यार ये तो आबाद होते जा रहे हैं, दिनों-दिन तरक्की करते जा रहे हैं, इनके घरों में तो बरकतों के ढेर लग रहे हैं। तो आपको वहीं पर आ गई बात, दूसरों को सुखी देकर ज्यादा लोग दुखी रहते हैं और फिर कोशिश करते हैं कोई चिंगारी लगाने की। भाई को भाई से लड़ा देंगे, बेटे को बाप से लड़ा देंगे, बड़े मास्टर बैठे हैं जी, उस्ताद बैठे हैं पता ही नहीं चलने देते। ऐसी-ऐसी बातें सुनाते हैं।

पूज्य गुरु जी ने साध-संगत को फरमाया कि आपको एक बात सुनाया करते थे, वो बात ख्याल में आ गई। एक संत किसी गाँव में आए और उसकी एक सज्जन सेवा करने लग गया। वो सज्जन जो सेवा करते थे, संतों ने उसे पूरा पढ़ लिया। अब सेवा ही इतनी की उन्होंने। साध-संगत आती उनको चाय बनाकर देना, वो भी तब थोड़े आते थे पाँच-दस आ गए। उनको खाना बनाकर देना, संतों के लिए भी खाना दे दिया। तो सेवा करता रहा वो, सेवा भावना जबरदस्त। टाइम हुआ तो संत कहने लगे भई हम तो जा रहे हैं और नगर के लिए, पर आपने बहुत सेवा की, बोलो आपको क्या वरदान दें। माँ के बेटे ने एक बार भी ना नहीं कही, आमतौर पर ये अपने सभ्यता है कि एक बार कोई अगर चाय भी कहे, यार चाय पी ले तो आगे से कह देते हैं कि नहीं, और कई जगह हमने देखा है, सामने वाले कहा कि अरे चाय पिलाऊं, चाय ले आएं, नहीं। अच्छा नहीं, दूसरी बार पूछते ही नहीं। आप लोगों ने भी कहीं न कहीं देखा होगा, हमने देखा है, बिल्कुल देखा है, अहसास किया। और कई ऐसे होते हैं कि पूछते ही नहीं। पूछना क्या है, कोई मेहमान आया है, हमारे तो धर्मों में लिखा है कि मेहमान तो एक तरह से भगवान की तरह होते हैं भाई। मतलब सत्कार करने के लिए, वो भगवान नहीं बन जाते। मतलब इसलिए कहा गया था हमारे पाक पवित्र वेदों में कि भई सत्कार करना, इज्जत करनी है आए हुए की। तो आबिश्यली पता ही है कि चाय लानी है, वो पहले ही ले आते हैं। पूछने वाले में डाउट होता है। तो उसने सीधे ही कह दिया, कि पता नहीं संत मुकर ही ना जाएं।

संतों ने कहा, बेटा क्या चाहिए कुछ, हम आपको देकर जाएंगे, कहता हाँ जी। कहते क्या चाहिए बोल बेटा। कहता कि जी ऐसा कोई मंत्र दे दो जो मैं चाहूँ वो मिल जाए। कितनी बड़ी चीज मांग ली। संत मुस्कुराए, जानते थे ये तो बड़ा ईर्ष्यालू है, गड़बड़ हो जाएगी, अगर ये ऐसा ही करता रहा तो इसने किसी को जीने नहीं देना। कहने लगे बेटा! याद रखना दो बातें- पहली बात, जो तू मांगेगा तेरे पड़ोसी के दोगुना आएगा, क्या तुझे मंजूर। कहता जी, मंजूर। दूसरी बात, किसी का शारीरिक नुक्सान करेगा तो तेरा हो जाएगा, किसी दूसरे का नहीं होगा, कहने लगा कि जी मैं क्यों करूंगा, ठीक है जी मंजूर हैं दोनों शर्तें। कहता, ये ले मंत्र, मंत्र दे दिया।

अब घर में आया बड़ा खुश-खुश, गिनती की कितने परिवार के मैंबर हैं चार-पाँच जितने भी थे, मंत्र का किया जाप, आने दो छत्तीस प्रकार का भोजन, तो थालियां आ गई जी झट से। अभी वो कोर तोड़कर मुंह में डालने लगा था तो साइड वाले घर में शोर मच गया, छोटी-छोटी दीवारें हुआ करती थी पहले, बुजुर्गवार जानते हैं, ज्यादातर घरों के बीच में छोटी-छोटी दीवारें होती थी, क्योंकि लड़ाई झगड़े तो होते ही नहीं थे, पुराने टाइमों में, हम तो राजस्थान की बात कर रहे हैं, जहां हम रहे वहां ऐसा था। तो उसने उस दीवार के ऊपर से देखा चक्कर क्या है? बरामदे से होते थे खुले, वो देखा उसके चार थालियां थी और उसके (पड़ोसी) के आठ आई हुई हैं। पिसू तो पड़ने शुरू हो गए, सेवा करता मैं मर गया ये बैठे-बिठाए डबल ले रहे हैं। कोई नहीं चलो भूख लगी थी खाना खाया, खाना तो स्वादिस्ट होना ही था। अब दैवीय, रूहानी खाना था।

बहुत खुश हुआ, सारा परिवार खुश हो गया। तब बैलों से खेती करते थे। कहता कि जी ऐसा है कि मैं चलाता हूँ, मेरा बेटा चलाता है, हमारे दो नागौरी बैलों की जोड़ी आ जाए। अब वो खाना खाकर बाहर निकला, देखा खूंटे पर चार बैल खड़े हैं पूरे गजब के। बड़ा खुश हुआ, जाकर हाथ ही रखा था। पड़ोसियों के शोर मच गया, अब हाथ धीरे ही चल रहा था, क्योंकि पता था कि उधर शोर मचेगा। देखा ऊपर से दीवार के, उधर आठ बैल खड़े। गालियां देकर कहता सेवा करके मैं मर गया, ये (पड़ोसी) बिना वजह पंगा ले रहे हैं, अब नहीं मंत्र का जाप करूंगा, ये कोई बात थोड़ा ना है, चुप हो गया। पर अंदर जलन, आपको अभी कहा था दूसरों का सुख देकर दुखी। अब गया बाहर। बाहर वाले कहते कि यार दुखी सा दिखता है। कहता, यार क्या उदास दिखता हूँ, बाद में करूंगा बात।

घर वालों ने जोर दिया कि कुछ ओर भी मांग ले, कहता चलो ठीक है। (घर वाले) कहते ये घर देख अपना कितना गंदा हुआ पड़ा है। उसका जी करे मांगू या नहीं मांगू, पता था होगा क्या? घर वालों ने प्रैशर डाला मान गया, मंत्र का जाप किया, कहता कि जी आलीशान घर बन जाए। बस वो देखा, खाली जगह हुआ करती थी, नोहरा या बेड़ा साइड में होता था, इसे घेर कहते हैं शायद यूपी साइड में, तो वो एरिया था, देखा तो वहां महल बना खड़ा है। अभी वो उधर देख ही रहा था, पड़ोसी के दो बन गए। कहता, इसीलिए तो मैं कह रहा था, मत लो पंगा, माने नहीं ना, वो देखो उधर। सारे चुप हो गए। अब कहता अब नहीं, तंग नहीं करना, अब कुछ नहीं मांगना मैंने। अब बेचारा चुपचाप, पर पड़ोसी बड़े खुश कि कुछ किया नहीं कराया नहीं, ये तो बड़ा मजा आ रहा है।

वो तो शोर मचाएंगे ही, नाचे-गाएंगे ही और उसको लगे जहर जैसा। ना कोई मेरा नाम, ना कोई मेरी वाह-वाह, मेरी वजह से सारा कुछ ले रहे हैं, ये नाचे, कूदे जा रहे हैं। हालांकि उन्होंने बेचारों ने उसका कुछ बिगाड़ा नहीं था, चला गया। कुछ यार दोस्त होते हैं, आपको कहा ना कि बड़े मास्टर होते हैं, आप जानते ही हैं, कहने की जरूरत नहीं। तो वो दुनिया में गया और कहने लगा कि मेरे साथ तो बड़ी गड़बड़ हो रही है। कहने लगे कि तूं तो बड़ा उदास है, महल महुल पता नहीं तूं रातोंरात कौन सा जादू टोना कर आया। कहता कौन से महल? कहने लगे तेरे खेत में बैल भी बड़े बढ़िया चल रहे हैं। कहता मत पूछ यार। कहते कह तो भी।

कहता पंगा ले लिया मैंने। मैंने वो संतों की सेवा की थी, कहता उन्होंने मुझे वरदान दिया, लेकिन पड़ोसी के डबल हो जाता है। कहते पक्का। कहता देख फलां के। कहते, हाँ यार उनके भी डबल बने हुए हैं। साइड में ले गया और कान में कुछ फुंसफुसाया। मास्टर है, मास्टरों का काम ही ये होता है, अग्ग लाई डबू कुत्ता कंध ते। उसका क्या बिगड़ना था। अब वो गया और जाकर मंत्र का जाप किया, कहता हे भगवान! मेरे गेट के आगे कुआं लग जाए, उसके कुआं लग गया। पड़ोसी के दो लग गए। कहता बन रही है अब बात। कहता यार सिखाया तो उसने बढ़िया है। संतों के वचन भूल गया, क्या किसी का नुक्सान, शारीरिक नुक्सान मत करना।

मंत्र पढ़ा और कहने लगा कि हे भगवान! हमारी एक आँख फूट जाए, तो सारे परिवार की एक आँख फूट गई। अब उसने एक आँख से देखा कि हो क्या रहा है। होना क्या था, वचन थे संतों के कि अगर तू किसी का नुक्सान करेगा तो तेरा हो जाएगा, पड़ोसी का नहीं होगा। तो जरा सोच कर देखिए अगर ये वरदान आज पूरी दुनिया में हो रहा हो तो क्या होगा? आँख तो नहीं बचेगी किसी की। बुरा ना मना लेना भाई, सारे एक जैसे नहीं होते। बहुत अच्छे लोग भी हैं, बहुत नेक लोग भी हैं, पर ये बात से आप एग्री जरूर होंगे कि दूसरों के सुख को देखकर जलने वालों की गिनती ज्यादा है। हकीकत में है ये बात। तो सत्संग में आओगे तो समझ में आएगी। अरे मांगना है तो अच्छा मांग लीजिये। किसी की कार देखते हो तो ये मांग लीजिये कि मेरी भी कार आ जाए और मेहनत करो। ये क्यों कहते हैं कि उलट जाए उसकी कार, पलट जाए उसकी कार। अच्छा मांगों। एक चीज मांगों, पर ये सब पता जब चलता है जब आप सत्संग में आते हैं।

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