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    फिल्में समाज का आईना, इनके माध्यम से न हो ओछी राजनीति

    The Kashmir Files

    इन दिनों ‘कश्मीर फाईल्स’ फिल्म को लेकर देश में साम्प्रदायिक भावनाएं काफी उफान पर हैं। भाजपा की तरफ झुकाव रखने वाले अनुपम खैर अभीनीत इस फिल्म को लेकर दो दिन पहले दिल्ली की विधानसभा में आम आदमी पार्टी नेता एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री पर भी निशाना साधा है। केजरीवाल ने साफ-साफ कहा कि विवेक अग्निहोत्री को फायदा पहुंचाने के लिए यह सब हो रहा है। यूं भी इस फिल्म से अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाने के लिए ‘कश्मीर फाईल्स’ को राजनीति के केंद्र में जानबूझ कर खींचा जा रहा है। जबकि इस फिल्म से कश्मीरी पंडितों का कोई भला नहीं होने वाला। कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ इसे आने वाले कश्मीर चुनावों के मद्देनजर भाजपा द्वारा चुनावी तैयारी शुरू कर देने के तौर पर भी देख रहे हैं। ब्राहमणों को पीड़ित दिखाए जाने पर दलित चिंतकों का भी गुस्सा उबल रहा है।

    दलित अधिकारवादी सोशल मीडिया पर ‘राइजिंग द शूद्रा’ फिल्म के दृश्यों को डालकर वायरल कर रहे हैं और उच्च जातियों एक तरह से हिन्दू राजनीति की झंडाबरदार भाजपा से भी पूछ रहे हैं कि दलितों की पीड़ा की बात नहीं करोगे क्या? इस बात में कोई दोराय नहीं कि कालान्तर में भारत में जातिवादी एवं छूआछूत की संकीर्ण मानसिकता के चलते ब्राहमणों-ठाकुरों ने दलितों पर सैकड़ों नहीं हजारों वर्षों तक मानसिक, शारीरिक, सामाजिक अत्याचार किए हैं, अत्याचार भी ऐसे कि दलितों को मनुष्य होते हुए भी इस देश में पशुओं से बदत्तर जीवन जीना पड़ा। फिल्में, किताबें, पत्रिकाएं, नाटक, गोष्ठियां, सभाएं निश्चित तौर पर समाज को आईना दिखाते हैं। समय-समय पर देश में जातिवादी, धार्मिक, क्षेत्रीय, सांस्कृतिक भिन्नताओं के कारण जो मानव-मानव के बीच विवाद उठते हैं या एक मानव दूसरे का शोषण करता है, उस पर अत्याचार करता है उसकी संवाद माध्यमों से चर्चा होती है।

    परन्तु स्वार्थों के चलते बहुत बार सच्चाई को ब्यान कर रहा नजरिया बहुत बार दूषित हो जाता है और मुुड़-मुड़कर हिंसा का समय चक्र एक से दूसरे की और रूख करने लगता है, जोकि अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक, अमीर बनाम गरीब, उच्च जाति बनाम निम्न जाति एवं क्षेत्रीय वाद-विवाद का रूप ले लेता है। अभी ‘कश्मीर फाईल्स’ की बात हो या ‘राइजिंग द शूद्रा’ ये हमारे देश की कटु ही नहीं भयावह सच्चाईयां हैं, उक्त घटनाओं की भरपाई करना बेहद जटिल व मुश्किल काम है। अत: उक्त सबसे हमें भविष्य के लिए जरूर सीख लेनी चाहिए कि मानव सर्वोच्चय है। किसी भी तरह से मानव-मानव के बीच कोई विवाद धार्मिक या जातिगत संकीर्णताओं के चलते तो किसी भी कीमत पर किया जाना तो दूर सोचा भी नहीं जाना चाहिए। भारत तेजी से शिक्षित एवं संबल हो रहा है।

    भविष्य के भारत में ओछी राजनीति करने वालों को हाशिये पर धकेला जाना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, अच्छे नगरों व जीवन स्तर को ऊपर उठाने के प्रयास सबको मिलकर करने चाहिए न कि एक फिल्म बनी व उसे ही मुद्दा बना लिया जाए। विवेक अग्निहोत्री या उससे पहले भी सैकड़ों फिल्मों में निर्माता-निर्देशकों ने समाज, राष्टÑ के ज्वलंत मुद्दों को उठाया है और उठाते रहने वाले हैं, संचार संसाधन मनुष्य के बौद्धिक विकास के लिए एक जरूरी गतिविधि है, अत: इनसे विवादों व समस्याओं को सुलझाने की ओर बढ़ा जाए न कि विवादों को उलझाने के मौकों के तौर पर उन्हें देखा जाए। भाजपा हो या कांग्रेस, आप हो या अन्य कोई भी दल सबका लक्ष्य भारत को शांत व समृद्ध बनाने का होना चाहिए न कि अशांति फैलाकर उसमें से सत्ता पाने की गुंजाइशें ढूंढी जाएं।

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