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    आम प्रदर्शनों से तालिबान को मिलेगी चुनौती

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    अफगानिस्तान की फौज ने भले ही तालिबान के सामने हथियार डाल दिए हों। उसने इस्लामिक कट्टरवाद के सामने सर झुका दिया हो पर अफगानिस्तान की महिला शक्ति और युवक अब गुलामी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं। पिछले तीन दिन से अफगानिस्तान में उसके खिलाफ प्रदर्शन चल रहे हैं। वे पाकिस्तान और अफगानिस्तान में नए आये तालिबान के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। कई दिन पहले काबुल की पांच महिलाओं के प्रदर्शन का आया समाचार ये बताने के लिए काफी था कि चिंगारी अंदर ही अंदर दहक रही है। अब के प्रदर्शन ये बताने को बहुत हैं कि वह चिंगारी अब भयंकर रूप ले चुकी है। पंजशीर पर तालिबान के कब्जे के भले ही समाचार आ रहे हों पर उसकी जंग अभी खत्म नहीं हुई। वहां के लड़ाके उसी तरह पहाड़ों में जाकर छिप गए हैं जैसे तालिबान अमेरिकी हमलों से बचने को पहाड़ों में जा छिपते थे। मौका पाकर, शक्ति बटोर कर फिर हमलावर हो जाते थे। अब अफगानिस्तान की नई सरकार की घोषणा हो गई। किंतु हाल की उस घटना को नहीं भुलाया जा सकता।

    सरकार में प्रभुत्व को लेकर तालिबान के दो गुट में संघर्ष हुआ है। तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला अब्दुल गनी बरादर अपने संगठन के सहयोगी हक़्कानी नेटवर्क के साथ एक झड़प में घायल हो गए। ये झड़प तालिबान के दोनों धड़ों के बीच हुई। अब अब्दुल गनी बरादर अपना इलाज पाकिस्तान में करा रहे हैं। अमेरिका अफगानिस्तान से ऐसे ही नहीं गया। बीस साल यहां रहकर ऐसा कर गया है कि अफगानिस्तान के जल्दी हो टुकड़े हो जाएंगे। अमेरिका का इतिहास रहा है कि वह जिस मुल्क में रहा है, वहां से जाने के बाद उसके टुकड़े हो गए हैं। सिर्फ वियतनाम में नहीं हुआ। सच्चाई यह है कि अमेरिका का असली खेल दूसरे देश से जाने के बाद शुरू होता है। सोमालिया तीन हिस्से में टूट चुका है। लीबिया के पांच हिस्से हो गए। इराक के अलग-अलग हिस्से में अलग-अलग सरकार है।

    तालिबान लड़ाकों में भी खुद कई गुट हैं। दूसरे अमेरिका के चुपचाप चले जाने के और भी कई अर्थ हैं। उसने तालिबान से समझौता किया है कि वह अफगानिस्तान की भूमि को अमेरिका और मित्र राष्ट्रों के विरोधियों को इस्तमाल नहीं करने देगा। वह जानता था कि तालिबान अपनी बात के पक्के नहीं हैं फिर भी उसने पासा फेंका और अफगानिस्तान की खाई से निकल गया। वह अफगानिस्तान से निकल भले ही गया हो, किंतु आसपास में मौजूद होकर यहां के हालात पर नजर रखे है। अफगानिस्तान से निकलीं उसकी फोर्स उस पाकिस्तान में मौजूद हैं, जो तालिबान का मददगार है। जो नया मंत्रिमंडल बना है, उसके गृह मंत्री बने सिराजुद्दीन हक्कानी मोस्टवांटेड आतंकवादी है। उस पर अमेरिका ने भारतीय मुद्रा में 37 करोड़ का ईनाम घोषित किया हुआ है। क्या अमेरिका इन्हें ऐसे ही जिंदा छोड़ देगा।

    अभी चीन खुश है कि उसे अफगानिस्तान की खनिज संपदा पर कब्जे का अधिकार मिल जाएगा। जबकि ऐसा लगता नहीं। अमेरिका ने अफगानिस्तान में आतंकवाद बढ़ा कर रूस को तोड़ दिया। अब सिर्फ चीन ही उसकी आँखों की किरकिरी बना हुआ है। आने वाले समय में उईगिर मुसलमानों पर चीन में हो रहे जुल्म को हवा दी जाएगी। अफगानिस्तान में तालिबान के आने को लेकर जो खुशी मना रहे हैं, उन्हें मनाने दीजिए। ये कुछ दिन की चांदनी है। कुछ दिन की रौनक है। देखते जाईये। अभी शो शुरू हुआ है। ये सिर्फ ट्रेलर है।

     

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