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    आयुर्वेद को मानने वाले भारत में, फास्ट फूड का बढ़ता चलन घात्तक

    Fast-Food
    File Photo

    कुरुक्षेत्र(सच कहूँ/देवीलाल बारना)। जैसे जैसे खान पान बदल रहा है उसी तर्ज पर इन्सान का स्वभाव, शरीर भी बदल रहा है। पुरातन भारत में खान-पान व योग की बदौलत ही सैंकड़ों वर्ष तक व्यक्ति जीवित रह सकता था लेकिन आधुनिक युग ने पुरातन खान पान को हमारे से छीनकर हमें विदेशी खाने फास्ट फूड (Fast Food Trend) की तरफ धकेल दिया है। एक बार तो फास्ट फूड जीभा के स्वाद को चार चांद लगाता है लेकिन बाद में यह शरीर में विकार पैदा करता है। अगर यूं कहें कि पुरातन खाना खाने के बाद जो मन की संतुष्टि होती थी, शायद आज खाना खाने के बाद नही होती। इस बारे में जब बुजुर्गों से बातचीत की गई तो उन्होने अपने अंदाज में ही इसका जवाब दिया।

    खेत मै बैठ खाते थे बेरड़ा रोटी तो बंधता था तंत: रतिराम

    73 वर्षीय बुजुर्ग रतिराम का कहना है कि खाना हमारे जीवन को प्रभावित करता है। जैसा खाना खाएंगे वैसा हमारा मन होगा व वैसा ही शरीर होगा। पुराने समय का जिक्र करते हुए ठेठ हरियाणवीं में रतिराम ने कहा कि जिब खेत मै बैठ कै बेरड़ा रोटी गंठे गेल्या खावैं थे तै तंत बंध जाया करता। आज का टैम तै निरा कबाड़ खाण का आ लिया। रतिराम ने कहा कि पुरातन खाना बेहतरीन खाना था। आज फास्ट फूड (Fast Food Trend) के कारण उम्र घटती जा रही है व शरीर बीमारियोंं का घर बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि वे 73 साल की उम्र में भी कस्सी चलाते हैं व आज के युवाओं को मात देते हैं। यह सब पुरातन खाने की बदौलत है।

    आज भी जब याद आती है तो, आता है मुंह में पानी: रमेश

    अधेड़ रमेश पाराशर का कहना है कि जब वे बचपन में खेत में काम करते तो माँ खाना लेकर खेत में आती थी। खेत में घर की बनी रोटी, चटनी व लस्सी ऐसा मजा देती थी, वैसा मजा तो शायद सात पकवान में भी न आए। गाढ़ी लस्सी के वे खूब शौकिन रहे हैं लेकिन आज दिनचर्या व आधुनिकता ने पुराने खाने को हमसे छीन लिया है। आज भी जब वह खाना याद आता है तो मुंह में पानी आ जाता है। रमेश ने कहा कि पुरातन खाना शरीर को बल देता था, यही कारण है कि उस वक्त लोगों का शरीर बलशाली होता था और उम्र भी ज्यादा होती थी। उस वक्त न तो कोई बीमारी थी और न ही डॉक्टर का खर्च।

    आयुर्वेद में दिया है भोजन की महत्वता पर विशेष बल

    श्री कृष्णा आयुष विश्वविद्यालय के डीन एकेडमिक अफेयर डॉ. शंभू दयाल का कहना है कि आहार सभी औषधियों में श्रेष्ठ है और आयुर्वेद के तीन उपस्तंभ में भी एक माना जाता है। आयुर्वेद उचित भोजन के संयोजन, खाना पकाने के तरीके, खाने के माहौल, स्वच्छता, शिष्टाचार के संदर्भ में बुनियादी आहार निदेर्शों पर जोर देता है। गुरू, मधुर व स्निग्ध भोजन शुरू में भोजन के दौरान लेना चाहिए, इसके पश्चात आंवला व नमकीन आहार का सेवन करना चाहिए। अग्नि की उचित सक्रियता, अवशोषण व भोजन को आत्मसात करने के लिए भोजन के अंतिम भाग में तीखा व कसैले भोजन का सेवन करना चाहिए। पुरातन समय में भारत में साधारण आहार के कारण लोग निरोगी रहते थे।

    पुरातन खाने की ओर लौटना होगा: मलिक

    युवा मनजीत मलिक का कहना है कि हमें पुरातन खाने की ओर लौटना होगा। हमारे बुजुर्गों का जीवन काल काफी लंबा होता था लेकिन आज फास्ट फूड़ के कारण शरीर व मन में विकार आने लगे हैं। शरीर में बीमारियों व मन में विकार पैदा हो रहे हैं। इसलिए हमें चाहिए कि पुरातन खाने की ओर लौटें। शरीर को एनर्जी के लिए जिन तत्वों की आवश्यकता होती है, उनकी पूर्ति दूध, फल, अन्न व सब्जियों से होती है।

    डिब्बा बन्द भोजन बरोस रहा बीमारियां

    भोजन को स्वास्थ्य का प्रमुख तत्व माना जाता है। यह केवल शरीर को पोषण ही नहीं देता अपितु व्याधियों से लड़ने में भी सहायता करता है। आयुर्वेद में तीन दोष वात, पित्त और कफ में असंतुलन होने को रोग कहा जाता है। इन रोगों का मुख्य कारण असंतुलित आहार, असम्यक आहार कहा माना गया है। आज कल डिब्बा बन्द खाने, मैदा से बने पदार्थ, हानिकारक कैमिकल जैसे अजीनो मोटो, प्रिजर्वेटिव युक्त खाद्य पदार्थों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इसके कारण सभी उम्र के लोगों में रोगों की बढ़ोतरी देखी जा रही है।

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