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    Children Social Media: मोबाइल और सामाजिक माध्यमों का किशोर मन पर असर

    Children Social Media
    Children Social Media Children Social Media: मोबाइल और सामाजिक माध्यमों का किशोर मन पर असर

    Children Social Media: अजीत कुमार, कैथल। समकालीन समय में तकनीक केवल सुविधा प्रदान करने वाला साधन नहीं रह गई है, बल्कि यह हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। विशेष रूप से मोबाइल फोन ने किशोरों के जीवन में गहरी पैठ बना ली है, जिसके कारण उनके बचपन और दिनचर्या में बड़ा परिवर्तन दिखाई देता है। पहले बच्चे अपना अधिकांश समय परिवार, मित्रों और विद्यालय के बीच संतुलित रूप से बिताते थे, लेकिन अब उनका काफी समय आभासी दुनिया में गुजरने लगा है। यह आभासी संसार केवल मनोरंजन या बातचीत का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह किशोरों की सोच, व्यवहार और आत्मबोध को भी प्रभावित करने लगा है।

    आज का किशोर घर और विद्यालय की सीमाओं से बाहर एक डिजिटल वातावरण में सक्रिय रहता है, जहाँ हर समय तुलना और प्रतिक्रिया का दबाव बना रहता है। सामाजिक मंचों पर मिलने वाली प्रशंसा या आलोचना उसके आत्मविश्वास को प्रभावित करती है। जब किसी व्यक्ति की स्वीकृति को पसंद, टिप्पणी या साझा किए जाने की संख्या से आँका जाने लगे, तो किशोरों का आत्मबोध भी बाहरी प्रतिक्रियाओं पर निर्भर होने लगता है। यही स्थिति कई बार मानसिक तनाव और असुरक्षा की भावना को जन्म देती है। वास्तव में संचार के नए माध्यम केवल सूचना के आदान-प्रदान की शैली नहीं बदलते, बल्कि वे एक नया वातावरण भी निर्मित करते हैं। मोबाइल फोन और सामाजिक माध्यमों ने किशोरों के लिए ऐसा ही एक संसार तैयार किया है, जहाँ लगातार उपस्थित रहने का दबाव बना रहता है और उससे दूर होने पर पीछे छूट जाने का भय भी महसूस होता है।

    भारत में किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े आँकड़े लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो की रिपोर्टों में यह सामने आया है कि विद्यार्थियों और युवाओं के बीच आत्महत्या की घटनाओं में वृद्धि हुई है। यह समस्या सरल नहीं है, बल्कि कई कारणों से जुड़ी हुई है। पारिवारिक तनाव, पढ़ाई का बढ़ता दबाव, समाज की अपेक्षाएँ और मानसिक परेशानियाँ किशोरों के जीवन को प्रभावित करती हैं। हाल के वर्षों में यह भी देखा गया है कि डिजिटल माध्यमों का बढ़ता प्रभाव इस तनाव को और गहरा बना रहा है। सामाजिक माध्यमों पर अपमानजनक टिप्पणियाँ, दूसरों से लगातार तुलना और आभासी खेलों की लत किशोरों के मन को अस्थिर कर सकती है। आभासी दुनिया में होने वाले विवाद भी वास्तविक जीवन में मानसिक दबाव का कारण बन जाते हैं। जब कोई किशोर बार-बार नकारात्मक प्रतिक्रियाओं या उपहास का सामना करता है, तो उसका आत्मसम्मान गंभीर रूप से प्रभावित होता है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों की दुखद मृत्यु ने पूरे समाज को झकझोर दिया। इस घटना ने यह सोचने पर मजबूर किया कि किशोरों की भावनाओं को समझना कितना आवश्यक है। ऐसे मामलों में किसी एक कारण को दोष देना उचित नहीं, लेकिन यह स्पष्ट है कि डिजिटल वातावरण का दबाव भी कई बार उनकी मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है।

    इस परिस्थिति में परिवार, विद्यालय और समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। माता-पिता को बच्चों के साथ खुला संवाद बनाए रखना चाहिए और उन्हें समझ के साथ मार्गदर्शन देना चाहिए। साथ ही विद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य और तकनीक के संतुलित उपयोग के बारे में जागरूकता बढ़ाना भी समय की बड़ी आवश्यकता है। सरकार और नीति निर्धारकों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण विषय है। बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार करना समय की मांग बन चुका है। सामाजिक माध्यमों पर अपमान, धमकी या उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी होगी। इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े संसाधनों को सुलभ बनाया जाए। तकनीक का विरोध करना समाधान नहीं है, क्योंकि वह आधुनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। आवश्यकता इस बात की है कि उसका उपयोग संतुलित और जिम्मेदारीपूर्ण ढंग से किया जाए। यदि परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर इस दिशा में प्रयास करें तो तकनीक बच्चों के लिए खतरा बनने के स्थान पर उनके विकास का साधन बन सकती है।
    (यह लेखक के अपने विचार हैं)