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    ‘‘पूर्ण सतगुरू अपने मुरीदों का साथ कभी नहीं छोड़ता’’

    13 मई 1987 :- पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज गांव मोठमाजरा, जिला जींद में सत्संग फरमा रहे थे। एक शंकावादी व्यक्ति ने कहा कि जो व्यक्ति नाम लेकर नियमों को उल्लंघन करता है तो सतगुरू उसे कैसे लेकर जाएगा, क्योंकि उसने अपने सतगुरू का हुक्म तो माना नहीं। इस पर पूजनीय परम पिता जी ने फरमाया, ‘‘मान लो जमींदार किसी मंडी से बैल खरीदकार लाता है।

    अचानक रास्ते में किसी दुर्घटना में बैल की टांग टूट जाती है तो क्या जमींदार बैल को वहीं रास्ते में छोड़कर अपने घर खाली चला जाएगा? कदापि नहीं बल्कि डॉक्टर से उसका ईलाज करवाएगा और उसे अपने घर ले जाएगा।’’ इसी तरह पूर्ण सतगुरू अपने मुरीदों को कभी नहीं छोड़ता, चाहे वे सारे नियमों को उल्लंघन की क्यों न कर दें। गलतियों की सजा सुक्ष्म मंडलों पर देकर सतगुरू स्वयं उसे सतलोक पहुंचा देते हैं। सत्संग की समाप्ति के बाद पूजनीय परम पिता जी ने नाम अभिलाषी लोगों को नाम-शब्द देकर मोक्ष प्रदान किया।

    2 फरवरी 1988:- पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज गांव उचाना, जिला करनाल में पधारे। वहां पर कई सत्संगियों ने अपने घरों में पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के मुबारक चरण टिकवाने के लिए तैयारी कर रखी थी। सत्संगियों द्वारा विनती करने पर पूजनीय परम पिता जी ने वहां पर कई घरों में अपने पावन चरण टिकाए। इसके उपरांत पूजनीय परम पिता जी सत्संग फरमाने के लिए स्टेज पर विराजमान हो गए।

    कई घरों में जाने के बावजूद भी एक घर रह गया, जिसमें पूजनीय परम पिता जी नहीं जा सके। वह परिवार अत्याधिक उदास हो गया। उसकी तड़प को देखते हुए पूजनीय परम पिता जी ने सत्संग शुरू होेने से पहले फरमाया, ‘‘भाई, जो घर रह गया है, उसके घर भी जाएंगे।’’ पूजनीय परम पिता जी ने बहुत ही प्रभावशाली सत्संग फरमाया और 3088 लोगों को नाम-शब्द दिया। तदोपरांत पूजनीय परम पिता जी उनके घर गए और उन्हें भरपूर खुशियां प्रदान की।

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