महिलाओं ने लिखी सफलता की नई इबारत
International Women’s Day 2026: ओढ़ां (सच कहूँ/राजू)। कई बार इंसान के जीवन में ऐसी विकट परिस्थितियां आ जाती हैं, जिसमें उसे कुछ भी नजर नहीं आता। कुछ लोग ऐसी परिस्थितियों में घुटने टेक देते हैं तो वहीं भी होते हैं, जो हार न मानकर हिम्मत-हौसले को इस कदर ढाल बना लेते हैं कि कभी बुरे समय को भी नतमस्तक होना पड़ जाता है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर हम आपको कुछ ऐसी महिलाओं से रू-ब-रू करवा रहा है, जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारी और वक्त के साथ स्वयं को मजबूत बनाते हुए वक्त को ही बदल दिया। कभी बुरे समय को याद कर सिहर उठने वाली इन महिलाओं को आज जिंदगी से कोई शिकवा नहीं है। आज ये महिलाएं समाज में प्रेरणास्त्रोत बन रही हैं। Sirsa News
पति के मौत के बाद लगा था सब-कुछ खत्म हो गया
गांव पन्नीवाला मोटा निवासी 35 वर्षीय रोशनी देवी के पति की अढ़ाई वर्ष पूर्व अचानक मृत्यु हो गई थी। पति की मृत्यु के बाद रोशनी देवी के समक्ष अपने 4 बच्चों व स्वयं को संभालना बड़ी चुनौती बन गया। घर की आर्थिक दशा काफी कमजोर थी। पति की कोई चल-अचल संपत्ति भी नहीं थी। रोशनी को एक बार तो लगा कि जैसे सब-कुछ खत्म हो गया, लेकिन उसने किसी पर आश्रित न होकर दिहाड़ी-मजदूरी करते हुए अपने चारों बच्चों को बड़ी मुश्किल से पाला-पोषा और पढ़ाया-लिखाया। मौजूदा समय में रोशनी देवी मंडी कालांवाली में अटल कंटीन पर कार्य कर रही है।
कुछ पैसे कंटीन से आ जाते हैं, कुछ विधवा पेंशन से आ जाते हैं तो कुछ घर में टिफिन सर्विस से आ जाते हैं। इस पैसे से रोशनी देवी अपना घर व बच्चों को संभाल रही है। उसकी 3 बेटियां व एक बेटा है। जिनमें सबसे बड़ी 19 वर्ष की, उससे छोटी 17 वर्ष की तथा उससे छोटी बेटी 15 वर्ष की है। वहीं बेटा 13 वर्ष का है। चारों बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। रोशनी देवी की 2 बेटियां बीएससी कर रही हैं तो वहीं एक बेटी 12वीं कक्षा में पढ़ती है। वहीं बेटा 9वीं कक्षा में पढ़ता है। रोशनी देवी अपने हिम्मत-हौसले को ढाल बनाकर अपने बच्चों को सफलता की राह पर अग्रसर कर रही है। रोशनी देवी का कहना है कि उसके पति जगदीश का सपना था कि वह अपनी बेटी को डॉक्टर बनाएगा। वह अपने पति का सपना एक दिन जरूर पूरा करेगी।
बच्चों के लिए छोड़ दिया घर, उच्च शिक्षा दिलवाकर बनाया सफल | Sirsa News
गांव नुहियांवाली की बेटी सुमित्रा देवी का विवाह वर्ष 1996 में ढाणी बचन सिंह (ऐलनाबाद) निवासी लालचंद के साथ हुआ। शादी के 6 वर्ष बाद लालचंद की मृत्यु हो गई। एक तो पति की मौत में स्वयं और दूसरा 3 मासूम बच्चों (2 लड़की व 1 लड़का) को संभालना सुमित्रा के लिए काफी चुनौतीपूर्ण था। ये समय उसके लिए अति विकट था, ऐसे में उसके माता-पिता ने उसमें हौसला भरा। सुमित्रा ने जैसे-तैसे कर स्वयं को परस्थितियों से लड़ने के लिए मजबूत बनाया। सुमित्रा ने ठान लिया कि वह अपने बच्चों को एक सफल इंसान बनाएगी चाहे उसके लिए उसे घर-बार ही क्यों न छोड़ना पड़े।
सुमित्रा अपने तीनों बच्चों को शिक्षित करने के लिए 6 वर्ष तक अपने घर को छोड़कर राजस्थान के सीकर में रही। आज सुमित्रा के बड़ी बेटी 26 वर्षीय अंजनी स्वास्थ्य विभाग में मेडिकल आॅफिसर है। तो वहीं उससे छोटी बेटी 24 वर्षीय प्रीति बागवानी में बीएससी कर आगे की तैयारी कर रही है। वहीं बेटा 23 वर्षीय प्रिंस आईआईटी करने के बाद आज मुंबई में एक अच्छी नौकरी कर रहा है। सुमित्रा जब बीता हुआ समय आज याद करती है तो सिहर उठती है, लेकिन आज बच्चों को सफल देखकर उसे अब जिंदगी से कोई शिकवा नहीं है।
परिवार ने दिया हौसला तो खुद को संभाला और हालातों पर पाया काबू
गांव पन्नीवाला मोटा निवासी 57 वर्षीय निर्मला देवी का 5 वर्ष पूर्व पति का साथ छूट गया। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पति रामसिंह किराये पर गाड़ी चलाकर व एक छोटी-सी दुकान चलाकर परिवार का पालन-पोषण करता था। कोरोना काल में रामसिंह की मृत्यु हो गई। हालांकि 3 बेटियों की शादी पति के रहते हो चुकी थी, लेकिन एक बेटा व एक बेटी अभी कुंवारे हैं। पति की मौत के बाद घर व 2 बच्चों को संभालना निर्मला देवी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। काफी समय तक तो निर्मला पति की मौत के सदमे से उभर भी नहीं पाई थी।
परिवार के लोगों ने उसमें जीने का हौसला भरा। जिसके बाद उसने ठान ली कि वह बेटा-बेटी दोनों को अच्छी शिक्षा दिलवाकर अपने पैरों पर खड़ा करेगी। इसके लिए निर्मला देवी ने पति की दुकान को संभाला और जैसे-तैसे कर अपने बच्चों को पढ़ाया और घर को संभाला। निर्मला देवी के बेटे की डेढ़ वर्ष पूर्व सरकारी नौकरी लग गई, जबकि बेटी पुलिस की तैयारी कर रही है। निर्मला देवी की आँखें आज भी उस समय को याद कर नम हो जाती हैं।
जिम्मेदारी कंधों पर आई तो सर्वजीत कौर ने थामा ट्रैक्टर का स्टेयरिंग | Sirsa News
गांव ओढ़ां निवासी 42 वर्षीय महिला सर्वजीत कौर एक छोटी खेतिहर किसान है। महिला के एक बेटा व एक बेटी सहित 2 बच्चे हैं। थोड़ी-सी भूमि होने के चलते खेती कार्य से पति-पत्नी दोनों अपनी आर्थिक दशा में सुधार लाने में असक्षम थे। इसी बीच महिला सर्वजीत कौर के पति बलकरण सिंह की सेहत बिगड़ने के चलते वह चारपाई के अधीन हो गया। एक तो पहले से ही आर्थिक दशा कमजोर थी और ऊपर से पति के बीमार होने के चलते घर का पूरा बोझ सर्वजीत कौर के कंधों पर आ गया। खेती संभालने वाला कोई न होने के चलते सर्वजीत कौर ने खुद को मजबूत करते हुए ये ठान लिया कि वह किसी पर आश्रित न होकर खुद खेती करेगी। खेती कार्य से पूरी तरह से परीचित न होने के चलते शुरूआत के दौर में सर्वजीत कौर को काफी परेशानी झेलनी पड़ी।
पूरी जिम्मेदारी उसके कंधों पर आने के बाद उसने स्वयं ही ट्रैक्टर का स्टेयरिंग थाम लिया। अपने पति से पूछ-पूछकर धीरे-धीरे वह खेती कार्य में इस कदर निपुण हो गई कि बुआई-बिजाई व सिंचाई तक खुद करने लग गई। सर्वजीत कौर ने अपने दम पर अपने दोनों बच्चों को बेहतर ढंग से पढ़ा-लिखाकर सफलता की राह पर अग्रसर किया। उसने अपने बच्चों की पढ़ाई के समक्ष आर्थिक दशा या कार्य को कभी आड़े नहीं आने दिया। आज उसकी बेटी मौजूदा समय में बठिंडा में एक निजी बैंक में अस्सिटेंट मैनेजर है तो वहीं बेटा बीए की पढ़ाई कर रहा है। Sirsa News















