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    Air Pollution: ये है गंभीर आबोहवा की असली वजह, अकेली पराली जिम्मेदार नहीं, बढ़ती आबादी व बदलता मौसम बनता है कारण

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    Air Pollution: ये है गंभीर आबोहवा की असली वजह, अकेली पराली जिम्मेदार नहीं, बढ़ती आबादी व बदलता मौसम बनता है कारण

    Air Pollution: गर्मी के मौसम के बाद हर बार जब भी सर्दी का प्रवेश होता है। तभी बढ़ते प्रदूषण को लेकर देश की राजधानी दिल्ली से लेकर अरब देशों तक हाहाकार मच जाता है। दिल्ली व उत्तर प्रदेश में तो सामान्य दिनों में भी लोग खुले आसमान में तारे भी नहीं देख पाते। इसका मतलब यहाँ सामान्य दिनों में भी प्रदूषण इतना ही होता है,जितना वर्तमान में चल रहा है। फर्क सिर्फ यह है कि तब प्रदूषण वायुमंडल की ऊपरी परत में मौजूद रहता है। जबकि अब निचली परत में है। इस क्षेत्र में जनसंख्या का घनत्व अधिक होने के कारण लोगों की जीवन शैली इतनी दूषित हो चुकी है कि बढ़ते वायु प्रदूषण के लिए खुद जिम्मेदार हैं। बढ़ते प्रदूषण के लिए हर बार केवल किसानों को जिम्मेदार ठहरना उचित नहीं है। इसके लिए ग्लोबल वार्मिंग से लेकर बदलता मौसम व बढ़ती जनसंख्या के अलावा और भी अन्य कारक हैं जो इसके जिम्मेदार हैं।

    जिन पर कभी भी खुलकर विचार नहीं किया जाता। हालांकि इस विषय पर भारतीय रिसर्च संस्थाओं से लेकर अमेरिकन विश्वविद्यालय ने भी शोध किए हैं और शोध में यह सिद्ध भी हो चुका है कि इसके लिए प्रदूषण के विभिन्न कारक जिम्मेदार होते हैं। लेकिन दोष हर बार सिर्फ किसानों की पराली जलाने की घटना को दिया जाता है। हालांकि किसानों को भी पराली जलाने की अपेक्षा सरकार द्वारा निर्धारित किए गए तरीकों को अपनाना चाहिए। पराली जलाने से जहां एक तरफ वायु प्रदूषण होता है तो दूसरी तरफ भूमि की उर्वरक शक्ति को भी नुकसान होता है। इसके अलावा दशहरे से दिवाली के बीच पटाखों को लेकर भी सियासत होतीं है। लेकिन जब तक प्रदूषण के असली कारकों व भौगोलिक परिस्थितियों को नहीं समझा जाएगा, तब तक बदलते प्रदूषण में वायु प्रदूषण इसी तरह गंभीर स्थिति में पहुंचता रहेगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भी भारत में 32 अत्यधिक प्रदूषित शहर है।

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    अक्तूबर माह के अंतिम सप्ताह व नवंबर की शुरुआत में प्रदूषण बढ़ने के कारण

    आमतौर पर अक्तूबर माह को उत्तर पश्चिम भारत में मानसून के लौटने के तौर पर जाना जाता है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान हवाओं के बहने की दिशा पूर्व की ओर होती है, इस दौरान बंगाल की खाड़ी की ओर से आने वाली ये हवाएं अपने साथ नमी लेकर आती हैं। जिससे परत दर परत पूरे देश भर में बारिश होती है। पर जब मानसून लौटता है तो हवाओं के बहने की दिशा पूर्व से बदलकर उत्तर-पश्चिम हो जाती है। मानसून के पीछे हटने या लौट जाने को मानसून का निवर्तन कहा जाता है। मॉनसून इस दौरान उत्तर-पश्चिमी भारत से मानसून पीछे हटने लगता है और मध्य अक्तूबर तक यह दक्षिण भारत को छोड़ शेष समस्त भारत से वापिस लौट जाता है। लौटती हुई मानसून हवा बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प ग्रहण करके उत्तर – पूर्वी मानसून के रूप में तमिलनाडु में वर्षा करती है। कई बार लौटता हुआ या मानसून तमिलनाडु सहित संपूर्ण भारत में भारी वर्षा करता है।

    लौटते मॉनसून की 28 फीसदी हवा के साथ आता है जहर | Air Pollution

    नई स्टडी के मुताबिक, सर्दियों में दिल्ली सहित उत्तर भारत मे 72 प्रतिशत हवा उत्तर पश्चिम से आती है, जबकि शेष 28 प्रतिशत सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों से आती है। उत्तर-पश्चिम से आने वाली इन हवाओं के साथ राजस्थान और यहाँ तक कि कभी-कभी पाकिस्तान और अफगानिस्तान की धूल-मिट्टी भी दिल्ली और आस-पास के क्षेत्रों में पहुँच जाती है।
    यही कारण है कि वर्ष 2017 में इराक, सऊदी अरब और कुवैत में आए एक तूफान ने दिल्ली की वायु गुणवत्ता को काफी प्रभावित किया था। वर्तमान में भी मौसम की ऐसी परिस्थितियां जिम्मेदार है।

    तापमान में गिरावट आने से प्रदूषण वायुमंडल की निचली सतह पर बना रहता है

    इसके अलावा दूसरा प्रमुख कारण नवंबर के महीने में मौसम ठंडा होने लगता है।तापमान में गिरावट भी दिल्ली,हरियाणा, पंजाब व आस-पास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण के स्तर को प्रभावित करती है। जिसमें राजस्थान के साथ रखते पाकिस्तान के राज्य भी शामिल है। जैसे-जैसे तापमान में गिरावट आती है, तापीय व्युत्क्रमण के चलते एक परत बन जाती है, जिससे प्रदूषक वायुमंडल की ऊपरी परत में मिल नहीं हो पाते हैं। ऐसा होने पर वायु में प्रदूषकों की मात्रा वायुमंडल के निचली सतह पर बढ़ जाती है। सामान्य परिस्थितियों में ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटता जाता है। जिस दर से यह तापमान कम होता है, इसे सामान्य ह्रास दर कहते हैं। परंतु कुछ विशेष परिस्थितियों में ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटने की बजाय बढ़ने लगता है। इस प्रकार ऊँचाई के साथ ताप बढ़ने की प्रक्रिया को तापमान व्युत्क्रमण कहते हैं। इस तापमान व्युत्क्रमण के दौरान धरातल के समीप ठंडी वायु और उसके ऊपर गर्म वायु होती है। भूगोल में ऐसे वायु दाब के नाम से जाना जाता है।

    इसके अलावा, प्रदूषकों को फैलाने के लिए उच्च गति वाली हवाएँ बहुत प्रभावी होती हैं, लेकिन ग्रीष्म ऋतु की तुलना में शीत ऋतु में हवा की गति में कमी आती है। इन मौसम संबंधी कारकों के संयोजन से यह क्षेत्र प्रदूषण का शिकार हो जाता है। जब पराली के धुएँ और धूल के कण जैसे कारक शहर में पहले से व्याप्त प्रदूषण के स्तर में जुड़ जाते हैं, तो वायु की गुणवत्ता में ओर अधिक गिरावट आती है।

    बायोमास जलाना भी प्रदूषण का कारण | Air Pollution

    आईआईटी-कानपुर के शोधार्थियों ने दिल्ली व आसपास के क्षेत्र में वायु प्रदूषण पर आयोजित एक अध्ययन में यह भी पाया कि सर्दियों में दिल्ली में पर्टिकुलर मैटर में 17 से 26 प्रतिशत की वृद्धि बायोमास के जलने के कारण होती है। पिछले कुछ वर्षों में, वायु गुणवत्ता और मौसम पूर्वानुमान और अनुसंधान प्रणाली ने दिल्ली के वायु प्रदूषण में वृद्धि हेतु पराली के योगदान की गणना करने के लिए एक प्रणाली विकसित की है। इसी के तहत अब भी गणना की जाती है।
    पराली जलाने के चरम समय में वायु प्रदूषण में इसका योगदान 40 फीसदी तक बढ़ गया था। पिछले कुछ दिनों में यह 2 से 4 प्रतिशत हो गया है। इस अध्ययन का विश्लेषण किया जाए तो वायु की गुणवत्ता में गिरावट के हेतु केवल पराली जलाना ही ज़िम्मेदार नहीं है, बल्कि अन्य कारक भी इसमें शामिल हैं।

    फरवरी तक प्रदूषित रहती है दिल्ली एनसीआर |

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    पराली जलाने का समय सामान्य रूप लगभग 45 दिनों का होता है। किंतु दिल्ली में वायु, फरवरी माह तक प्रदूषित रहती है। क्या इसके लिए भी किसान जिम्मेदार है? उत्तर होगा नहीं। पर भौगोलिक स्थिति ग्लोबल वार्मिंग और मॉनसून के चक्कर को समझने की जरूरत है।

    अक्टूबर से जून तक बारिश न होना

    दिल्ली सहित हरियाणा में हवा की निम्न गुणवत्ता के लिए धूल और वाहनों का प्रदूषण दो सबसे बड़े कारण हैं। अक्तूबर और जून के बीच वर्षा की अनुपस्थिति के चलते शुष्क ठंड का मौसम होता है। इसी वजह से पूरे क्षेत्र में धूल का प्रकोप बढ़ जाता है। धूल PM 10 में 56 प्रतिशत और PM 2.5 में 38 प्रतिशत की वृद्धि हेतु ज़िम्मेदार है।

    वाहनों की भीड़ सबसे बड़ी बजह

    सर्दियों में प्रदूषण का दूसरा सबसे बड़ा कारण वाहनों का प्रदूषण है। यदि अकेले दिल्ली का जिक्र किया जाए तो यहां भारत के अन्य महानगरों से चार गुना अधिक वाहनों का प्रवेश होता है। जो वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक बनता है। सर्दियों में PM 2.5 का 20 फीसदी वाहन प्रदूषण से आता है। सामान्य रूप से वायु प्रदूषण प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों कारकों द्वारा होता है। प्राकृतिक कारकों में ज्वालामुखी क्रिया,वनों में आगजनी की घटना,कोहरा, परागकण,उल्कापात आदि शामिल हैं।

    प्राकृतिक स्रोतों से उत्पन्न प्रदूषण कम नुकसानदायक

    प्राकृतिक स्रोतों से उत्पन्न वायु प्रदूषण कम खतरनाक होता है, क्योंकि प्रकृति में स्व-नियंत्रण की क्षमता होती है। मानवीय क्रियाकलापों में पेड़ों की कटाई, कारखाने,परिवहन,ताप विद्युत गृह, कृषि कार्य, खनन,रासायनिक पदार्थो का प्रयोग तथा आतिशबाजी द्वारा वायु प्रदूषण में वृद्धि हो रही है।

    मनुष्य से लेकर पशु-पक्षियों पर भी होता है असर

    वायु प्रदूषण हवा में अवांछित गैसों की उपस्थिति से मनुष्य, पशुओं तथा पक्षियों को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इससे दमा, सर्दी, अंधापन, श्रवण शक्ति कमज़ोर होना, त्वचा रोग आदि बीमारियाँ पैदा होती हैं।
    वायु प्रदूषण के कारण अम्लीय वर्षा का खतरा बढ़ा है, क्योंकि वर्षा के पानी में सल्फर डाईऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड आदि ज़हरीली गैसों के घुलने की संभावना बढ़ी है,जिससे पेड़-पौधे,भवनों व ऐतिहासिक इमारतों को नुकसान पहुँचा है।

    धरती पर बढ़ता जा रहा तापमान,भविष्य के लिए खतरनाक

    बढ़ते हुए वायु प्रदूषण को देखते हुए वातावरण में कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा के दोगुनी होने की संभावना है। इस वृद्धि से पृथ्वी के तापमान में लगातार वृद्धि होगी जिसके परिणामस्वरूप ध्रुवीय बर्फ, ग्लेशियर आदि पिघलेंगे। इसके परिणामस्वरूप तटीय क्षेत्रों में बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि होगी, इससे भविष्य में कई तटीय देशों और राज्यों के डूबने की संभावना से भी नकारा नहीं जा सकता। यदि वर्षा के परिसंचरणमें बदलाव हुआ तो इससे कृषि उत्पादन प्रभावित होगा। मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ व पहाड़ी क्षेत्रों में बादल फटेंगे।

    इस बार हिमाचल व उत्तराखंड में देखा गया कुदरत का कहर

    इस बार हिमाचल व उत्तराखंड में ऐसा हुआ भी है। जिस वजह से भूस्खलन की घटनाएं देखने को मिली। पहाड़ के पहाड़ दरक गए। हिमाचल में उत्तराखंड में कई स्थानों पर इतनी मूसलाधार बारिश हुई की राष्ट्रीय राजमार्गों तक बह गए। यह सब वायुमंडल के बिगड़ते तापमान व प्रदूषण की वजह से ही है।

    भारत मे श्वास संबंधी रोग दुनिया भर में अग्रणी

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के की रिपोर्ट के अनुसार भारत देश श्वास संबंधी बीमारियों और अस्थमा से होने वाली मौतों के मामले में दुनिया में अग्रणी है। कम दृश्यता, अम्ल वर्षा और ट्रोपोस्फेरिक स्तर पर ओज़ोन की उपस्थिति के माध्यम से भी वायु प्रदूषण पर्यावरण को प्रभावित करता है। पर इस दिशा में कब और किसने ध्यान दिया? यह सोचने की बात है।

    शहरों से दूर हो कारखाने

    वायु प्रदूषण की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए कारखानों को शहरी क्षेत्र से दूर स्थापित किया जाना चाहिए। कारखानों की चिमनियों की अधिक ऊँचाई व इनमें फिल्टरों के उपयोग की अनिवार्यता आवश्यक है। साथ ही साथ किसी भी कारखाने की स्थापना के वक्त से लेकर हर वर्ष प्रदूषण किस तरह का अनापत्ति प्रमाण पत्र जांच के बाद ईमानदारी से जारी किया जाए। जनसंख्या के मामले में विश्व में पहले स्थान पर पहुंच चुके भारत देश की जनसंख्या की वृद्धि को स्थिर करने की आवश्यकता है ताकि खाद्य व आवास के लिए पेड़ों व वनों को न काटना पड़े। बल्कि ऐसे प्रयास जमीनी स्तर पर किए जाने चाहिए जिससे पेड़ों की संख्या बढ़े। साथ ही आम जनता को वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों का ज्ञान कराना भी ज़रूरी है, जिससे वे स्वयं प्रदूषण नियंत्रण के सार्थक उपायों को अपनाकर इसे नियंत्रित करने में योगदान दे सकें।

    प्रदूषण नियंत्रण के लिए जागरूकता जरूरी | Air Pollution

    प्रदूषण नियंत्रण के लिए सभी प्रकार के प्रचार माध्यमों का उपयोग करना चाहिए। प्रचार व प्रसार तथा जागरूकता के लिए केंद्रीय स्तर पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय व राज्य स्तर पर सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जा सकती है। गाडि़यों एवं दुपहिया वाहनों की ट्यूनिंग की जानी आवश्यक है। ताकि अधजला धुआँ बाहर आकर पर्यावरण को दूषित न करे। साथ ही सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा दिया जाना आवश्यक है। धुँआ रहित चूल्हा व सौर ऊर्जा की तकनीक को प्रोत्साहित करना चाहिए। इसमें केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजना को जोड़ा जा सकता है।

    ‘युद्ध प्रदूषण के विरुद्ध’ अभियान पर देना होगा जोर | Air Pollution

    दिल्ली सरकार ने हाल ही में बड़े स्तर पर एक प्रदूषण विरोधी अभियान शुरू किया है, जिसे ‘युद्ध प्रदूषण के विरुद्ध’ नाम दिया गया है। इसके अंतर्गत पेड़ों के प्रत्यारोपण की नीति, कनॉट प्लेस (दिल्ली) में एक स्मॉग टॉवर का निर्माण, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना और पराली को जलाने से रोकना जैसी मुहिम शामिल हैं। इससे दिल्ली सहित आसपास के राज्यों में खराब वायु गुणवत्ता का मुकाबला करने में मदद मिलेगी। जो सर्दियों के मौसम में और भी अधिक खराब हो जाती है।

    मेगा एयर प्यूरीफायर के रूप में काम करेगा स्मॉग टॉवर

    एक स्मॉग टॉवर, जो एक मेगा एयर प्यूरीफायर के रूप में काम करेगा, को दिल्ली सरकार और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को दिये गए सर्वोच्च न्यायालय के नवंबर 2019 के आदेश के अनुसार स्थापित किया गया है। पर यह कितना काम कर रहा है। इस पर भी गौर करने की जरूरत है। नीदरलैंड, चीन, दक्षिण कोरिया और पोलैंड के शहरों में हाल के वर्षों में स्मॉग टावरों का प्रयोग किया गया है। नीदरलैंड के रॉटरडैम में वर्ष 2015 में ऐसा पहला टॉवर बनाया गया था। जिसका नतीजा सकारात्मक दिखाई दे रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा एयर-प्यूरिफाइंग टॉवर शीआन, चीन में है। टॉवर प्रदूषित वायु के प्रदूषकों को ऊपर से सोख लेगा और नीचे की तरफ से स्वच्छ वायु छोड़ेगा।

    इलेक्ट्रिक वाहन को बढ़ाना होगा | Air Pollution

    सरकार का लक्ष्य वर्ष 2024 तक राजधानी में पंजीकृत कुल नए वाहनों में से एक-चौथाई वाहनों के लिये ईवीएस खाता बनाना है। इलेक्ट्रिक वाहन के लक्ष्य को इन वाहनों की खरीद हेतु प्रोत्साहन द्वारा, पुराने वाहनों पर मार्जिन लाभ देने, अनुकूल ब्याज पर ऋण देने और सड़क करों में छूट देने आदि के माध्यम से प्राप्त किया जाएगा। हाल ही में दिल्ली सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहन नीति को अधिसूचित किया जो ईवीएस के साथ निजी चार पहिया वाहनों के बजाय दोपहिया वाहन, सार्वजनिक परिवहन,सांझा वाहनों और माल-वाहक द्वारा प्रतिस्थापन पर सबसे अधिक ज़ोर देती है।

    इन कदमों के अलावा सरकार दिल्ली में थर्मल प्लांटों और ईंट भट्टों के साथ-साथ आस-पास के राज्यों में जलने वाली पराली से उत्पन्न प्रदूषण के रासायनिक उपचार पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए। सिर्फ आरोप- प्रत्यारोपण से काम नहीं चलने वाला। बीएस VI (क्लीनर) ईंधन की शुरूआत, इलेक्ट्रिक वाहनों हेतु प्रोत्साहन, आपातकालीन उपाय के रूप में ऑड-ईवन का प्रयोग दिल्ली सरकार द्वारा वायु प्रदूषण हेतु उठाए गए अन्य कदम हैं। जिन्हें जमीनी स्तर पर लागू किया जाना चाहिए।

    कोविड-19 के दौरान वायु की गुणवत्ता में हुआ था सुधार | Air Pollution

    याद होगा वैश्विक महामारी कोविड-19 के दौर में जब भारत सहित दुनिया के विभिन्न देशों में लॉकडाउन लगा तब वाहनों का आवागमन कम होने औद्योगिक क्षेत्र बंद होने के कारण वायु की गुणवत्ता में बहुत सुधार हुआ था। वह एक समय ऐसा था बेशक पूरी दुनिया कोरोनावायरस नाम की बीमारी से जूझ रहा था। लेकिन उसे वक्त वायु की गुणवत्ता शुद्ध थी। इसका मतलब यह साफ हो जाता है की वायु की गुणवत्ता के लिए सावधानी बरतने की जरूरत है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार जीवन जीने का अधिकार में शुद्ध वायु का भी जिक्र है। भारत में बढ़ते वायु प्रदूषण विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ-साथ यूनाइटेड नेशन भी चिंता जाता चुका है। पर इस दिशा में अब भारत सरकार व राज्य सरकारों को सियासत छोड़कर जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में उचित कदम उठाने होंगे ताकि आम लोगों को जीवन जीने का अधिकार से वंचित न होना पड़े।

    डॉ. संदीप सिंहमार वरिष्ठ लेखक,जलवायु विज्ञान के जानकार व टिप्पणीकार।

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