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    बच्चों को अच्छा नेक इंसान बनाओं, न कि नोट छापने की मशीन: पूज्य गुरु जी

    बच्चों पर अपनी सारी इच्छाएं मत मढ़ो

    सरसा। समय के अलग-अलग दौर का जिक्र करते पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि पहले बच्चा होता था, तो लोग सोचा करते थे कि मेरा बच्चा बड़ा होकर ‘इन्सानियत’ के झंडे बुलंद करेगा। सतयुग के समय में भक्ति इबादत किया करेगा। सबसे ज्यादा भक्ति मेरा बेटा ही करेगा। अच्छा नेक इन्सान बंनेगा। मालिक के दर्शन भी मेरा बेटा ही करेगा। और आज के दौर में, बच्चा अभी गर्भ में ही होता है, कहते हैं कि मेरा बेटा नोटों की मशीन बनेगा, ऐसा अकसर सुनने में आता है। पहले से ही शुरुआत हो जाती है। इतनी इच्छाएं उसके साथ मढ़ दी जाती हैं कि कई बच्चे तो इसी सें डिप्रेशन में आ जाते हैं। दु:खी हो जाते हंै। हम नहीं कहते कि सारे मां-बाप गलत गाईड करते हैं। पर बच्चे की भी तो इच्छाएं होती हैं।

    मैरिट के पीछे भाग रहे मां-बाप, बच्चे कर रहे खुदकुशी

    पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि आज के दौर में मां-बाप का एक पैमाना सा बन गया है, एक होड़ सी लगी हुई है कि बच्चों की मैरिट आनी चाहिए। भाई! खुद चाहे कभी स्कूल के पीछे से निकला हो। खुद की थर्ड डिवीजन रही हो, खुद चनों की बोरी दे दे कर पास हुआ हो। पर कहते हैं कि मेरे बच्चे की मैरिट होनी चाहिए। इच्छा रखना गलत नहीं, सही है। लेकिन इतनी इच्छा मत रखो कि बच्चे पर प्रेशर पड़ जाए और उसे लगे कि मेरा पेपर सही नहीं तो वो खुदकुशी कर ले। ये बिल्कुल गलत है।

    बच्चे को गाईड करो कि बेटा पूरा दिलों-दिमाग से पेपर देना, मैं चाहता हूं कि तू बहुत अच्छे नम्बर ले। मैं चाहता हूं कि तू सबसे कम्पीटिशन में नम्बर वन पर आए, पर बेटा अगर नम्बर कम भी आते हैं, तो इसका मतलब ये नहीं कि तू कमजोर है। अनपढ़ होकर अकबर ने पूरे देश में राज कर लिया था। पर आप कहते हैं कि देख ले अगर नम्बर कम आए तो फिर…।

    अपने बच्चों को मोटिवेट करें मां-बाप

    पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि बच्चों को मोटिवेट करने का एक तरीका होता है। सही ढंग से मोटिवेशन करना चाहिए कि हां, बेटा तू इस ढंग से पढ़ाई किया कर। सुबह दो घंटे, शाम को दो घंटे कम से कम। अगर कोई इंजीनियरिंग या कोई मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है तो उसको कहो, बेटा ये विषय तभी ले अगर वह आठ से दस घंटे पढ़ेगा। दो-दो, तीन-तीन घंटे करके भी पढ़ सकता है। लगातार पढ़ने से भी कई बार दिमाग पर प्रेशर पड़ जाता है। ऐसे में इन्सान, इन्सान नहीं रहता, बल्कि रोबोट बन जाता है।

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    हर किसी की इच्छा होती कि उसका बेटा-बेटी बुलंदियों पर जाए। पर इच्छा पूरी करने के तरीके होते हैं। जैसे आपको पहले भी बोला था कि भाई! बच्चे को कहो कि सुमिरन करेगा तो मैं तुझे दस रूपए, पचास रूपए, सौ रूपए जितने भी आप दे सकते हो, आप अपनी कमाई के हिसाब से वो बांध दो कि बेटा! तू दस मिनट सुमिरन करना। दस रूपए मैं तुझे दंूगा ही दूंगा। तो बच्चा सुमिरन करेगा। उसका दिमाग और शार्प होगा। तो पढ़ाई के लिए हमें लगता नहीं कि कहना पड़ेगा। वो नेचुरली टॉप की तरफ जाएगा।

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    बच्चे सूरजमुखी की मानिंद, तो अभिभावक सूरज

    पूज्य गुरू जी फरमाते हैं कि बच्चे सूरजमुखी की कली की मानिंद होते हैं, और माँ-बाप सूरज की तरह। अगर सूरज ही काला पीला है तो मुखी क्या करेगी बेचारी? कहने का मतलब मां-बाप ही ध्यान नहीं देते। मां-बाप तो गप्प मारते हैं सारा दिन, ताश खेलते हैं। तो बेटा कौन सा तीर मारेगा, वो भी ताश खेलेगा। बच्चों को अच्छा बनाने के लिए मां-बाप को भी बराबर तपस्या करनी होगी। कोई-कोई होता है जो टैलेंटेड होता है। जिसको किसी की जरूरत नहीं होती।

    उसकी लगन होती है उसी लगन से टॉपर बन जाता है। हालांकि उनके बैकग्राऊंड में कोई भी उतना पढ़ा-लिखा नहीं होता है। पर वो गॉड-गिफ्टेड होते हैं। लेकिन ऐसी चीज भी बनाई जा सकती है। अगर पत्थर को तराश कर हीरा बना सकते हैं, तो इन्सान के अंदर इतना दिमाग है उसको टॉपर क्यों नहीं बनाया जा सकता। पर पेपर के लास्ट दिनों में नहीं, अपितु साल के शुरूआत में ही बनाना चाहिए।

    फार्मूले को इमेज बनाकर दिमाग में फिट करो, तो बेहतर होगी पढ़ाई

    कई बार बच्चे पूछते हैं कि पिता जी आप कैसे पढ़ते थे। जब छुट्टियां होती थी तो हमें ये होता था कि अगला सिलेबस आ जाए, किताबें मिल जाएं। हमारे हिंदी, पंजाबी लगती थी। बड़ा चाव होता था उनको पढ़ने का। और उनको हम छुट्टियों में पहले ही पढ़ कर रख देते थे। और पूरा साल कहीं से भी कोई सवाल पूछ ले तो जवाब दे देते थे। क्योंकि रूचि से पढ़ते थे। जैसे नॉवेल पढ़ा जाता है, टीवी सीरियल देखते हैं। बड़े इंटरेस्ट से पढ़ते थे। और छुट्टियां होते ही होमवर्क पूरा करते थे।

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    90 प्रतिशत स्कूल में ही होमवर्क कर लिया करते थे। फिर गेम शुरु। शाम तक गेम खेलते। रात को कबड्डी चलती। पर कबड्डी जाने से पहले शाम को खाना खाने के बाद दो घंटे जरूर पढ़ते। पढ़ते वक्त हम माता जी को कह देते कि कमरे में कोई मत आए। क्योंकि हम उसको इमेज बना-बना कर पढ़ते थे। किसी भी फार्मूले को इमेज बनाते, उसको लिखते और उसकी इमेज फिट कर लेते मार्इंड में। और जब भी कभी जरूरत पड़ती याद कर लेते थे। इतने गेम के बाद भी अच्छे नम्बर आ ही जाते थे। क्योंकि माईंड के जैसा कोई कैमरा ही नहीं, जो मालिक ने बख्शा है।

    खेल के साथ पढ़ाई भी जरूरी

    पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि बच्चे में पढ़ने का शौक होना चाहिए। गेम अपनी जगह और पढ़ाई अपनी जगह। आज कल के प्लेयरों के किताबों पर मिट्टी की परत जम जाती है। जब पेपर आते हैं तो बोलेंगे, अच्छा ये सब्जेक्ट भी है! इतनी मोटी बुक!! कहने का मतलब पढ़ाई करो, गेम भी खेलो। तालमेल बना कर रखो।

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