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Saturday, February 7, 2026
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    यहां मिलता है सफलता का टॉनिक बढ़ेगा आपका ‘आत्मबल’

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    आज जिसे देखों पैसों के पीछे भाग रहा है, दुनियावीं ऐशो आराम को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक चला जाता है। पैसा कमाने की दीवानगी इंसान पर इस कदर हावी है कि ठगी, बेईमानी, रिश्वतखौरी, चोरी सब कुछ करने को तैयार है। लेकिन इसके बावजूद भी इंसान जानता है कि उसने पैसा तो बहुत जोड़ लिया, पाप की कमाई से अपने लिये हर आरामदायक वस्तु भी खरीद ली लेकिन आत्मिक शांति नहीं खरीद पाया। आज ‘‘सच कहूँ संस्कारशाला’’में पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के रूहानी सत्संगों के माध्यम से फरमाये गए उन अनमोल वचनों को आपके समक्ष लाया गया है, जो आपको बताएंगे कि आप किस तरह आत्मिक शांति को पा सकते हैं, किस तरह ईमानदारी से सफलता को छू सकते हैं।

    सत्संग में दिल और दिमाग पवित्र हो जाता है

    पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि सत्संग सबके लिए जरूरी है। सत्संग में आने से दिलो-दिमाग पवित्र हो जाता है, इंसान का एनर्जी लेवल बढ़ जाता है, आत्मबल बढ़ता है और आत्मबल बढ़ाने के लिए लोग पूरी दुनिया का चक्कर लगाते रहते हैं। लोगों के पास ऐशो-आराम के सब साधन होते हैं, लेकिन एक चीज नहीं होती और वो है आत्मिक शांति। और जब आत्मिक शांति नहीं होती बाकि सब चीजें फिजूल की लगती है। वही मौसम जो बहार का होता है जब अंदर गम-चिंता हो तो वो पतझड़ बन जाया करता है। इसलिए सबसे जरूरी है कि आत्मिक शांति, दिलो-दिमाग में हो। सत्संग में राम-नाम रूपी ऐसा टॉनिक मिलता है जिससे आपकी शक्ति आपको आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

    डायरी में लिखें रोजाना के खर्चे

    रोजाना के खर्चे संबंधि अपने अनुभव सांझा करते हुए पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि पूजनीय परम पिता जी का रहमोकर्म था घर बहुत बड़ा था। हम भी फावड़ा चलाते थे, खेती करते तो उसमें एक अलग ही आनंद आता। कमाई और खर्च का पूरा हिसाब रखते थे। आप कहते हो कि पता नहीं चलता कि पैसा किधर चला गया? अब पैसे के पंख तो लगे नहीं है जो उड़ गया। आपने उड़ाया तो उड़ा। तो घर में एक डायरी लगाओ। परम पिता जी के वचन है आज फिर दोहरा रहे हैं। डायरी में अपने खर्चे लिखा करो, आमदन लिखा करो आपको पता चल जाएगा, आपके पैसे उड़े नहीं आपने ही उड़ाए हैं या आपकी फैमिली में ही लगे हैं। और आप उससे सावधान हो जाओगे। उससे आमदनी को बढ़ा पाआगे तो ये बहुत जरूरी है। दूसरी बात दिमागी मेहनत और शारीरिक मेहनत और अच्छे कर्म कर के खाओ तो वो सुखदाई होता है।

    हक-हलाल की कड़ी मेहनत की कमाई करो

    पूज्य गुरु जी फरमाते है कि जब गर्मी का मौसम होता था और बरसात होने पर चींटियों के पर निकल आते थे। चींटियां बिल से इतने प्रेशर से बाहर निकलती थी। कई बार बच्चे खेलते थे तो उनके ऊपर कागज रख देते थे तो वो कागज ऊपर उड़ा कर ले जाती थी, क्योंकि इतनी स्पीड से निकलती थी। आज इंसान का भी यही हाल है, सुबह के टाईम में हर जगह जाम लगे होते हैं, क्योंकि चीटियां दाना चुगने जा रही होती हैं। क्यों? खुद तंदरूस्त रहूँ, परिवार को कमी न रहे तो कमाना तो पड़ता है न! यह गलत नहीं है। लेकिन जब इंसान उड़ने लगता है, यानि ठगी, बेईमानी, पाप, जुल्मों-सितम ये आदमी के पर निकलने की निशानी होती है।

    पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि और जब ये वाले पर निकलते हैं तो समझ लीजिए उसका खात्मा नजदीक है। हराम की कमाई के पैसोें से आप सोने की रोटी तो नहीं खा सकते, खाएंगे तो गेहूं की रोटी ही! वो रोटी फिर स्वाद नहीं लगती, हजम नहीं होती और इधर-दिहाड़ी मजदूरी करने वाले आठ-आठ रोटी खा जाते हैं, कम्पेयर करके देखो कि सुखी कौन है? वो मखमल के गद्दों पर करवटें बदलते-बदलते जिनकी सारी रात निकल जाती है या फिर वो जो हक-हलाल की कड़ी मेहनत की कमाई करके चैन की नींद सोने वाला।

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    दीनता-नम्रता और अपनी औकात याद रखो

    पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि भक्ति में शक्ति है और इंसान को संतुष्ट होना ही चाहिए। हम ये नहीं कहते कि इच्छाएं नहीं होती। इच्छाएं हैं तो आदमी है, इच्छाएं नहीं तो आदमी नहीं! इच्छा तो रहती है, लेकिन इच्छाओं का मक्कड़जाल नहीं होना चाहिए। जैसे मकड़ी जाल बुन लेती है, इतना मजबूत जाल बुन लेती है कि उसी में सूख कर मर जाती है। इतनी इच्छाएं पैदा मत करो कि पूरी होएं न और आपकी उम्र खत्म हो जाए। आदमी के 99 काम अगर भगवान पूरे कर दें, तो उतनी खुशी नहीं होती, जितना 100वां काम नहीं हुआ, उसका दु:ख होता है। तो दीनता-नम्रता और अपनी औकात याद रखो। कहने का मतलब कि दीनता-नम्रता इतनी हो कि सब-कुछ मिल भी जाएं, तो भी अहंकार न आने पाए। क्योंकि अंहकार जहां आ जाता है, वहां से मालिक का प्यार चला जाता है। वो खुशियां भी खुशियां नहीं लगती। इसलिए दीनता-नम्रता का पल्ला पकड़ कर रखो।

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    ठगी की कमाई, कई गुणा होकर निकलती है

    मेहनत की कमाई के बारे पूज्य गुरु जी, अपने बचपन की एक बात सुनाते हुए फरमाते हैं कि एक सज्जन थे। हम शायद पांच-छ: साल के रहे होंगे। वहां चनों का नीरा होता था। उसका गेट खुला होता था। वो सज्जन हमारे बापू जी के साथ बातें करने लगता और अपने ऊंट को खुला छोड़ देता। हमने देखा कि ये अच्छा बुद्धू बना रहा है। तो हमने कहा कि तू रोज ये जो ऊंट को चारा खिला रहा है बापू जी को बातें लगा-लगाकर, ये हक-हलाल की कमाई है। देखना कहीं तेरा ऊंट न मर जाए! तो हमने तो वैसे ही सादी बात कही थी। लेकिन अगले दिन उसका ऊंट मर गया। तो वो बापू जी से आकर कहने लगा कि आपका बेटा ऐसा-ऐसा बोला और मेरा ऊंट मर गया।

    तो बापू जी कहने लगे कि मैं भी तो रोज देखता था! ठग्गी तू मारे और दोष बेटे को देता है! अरे मेरे हक-हलाल के हैं भाई! अगर तू खिला रहा है, तो पूछ के खिला ले। पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि हमने देखा है कि हक-हलाल की कमाई चोर भी चुरा ले, तो वह बेचैन रहता है जब तक वो वापिस न कर दे। ये कलयुग तो है, लेकिन धर्म के कायदे-कानून आज भी हैं। हां, ठग्गी-बेईमानी से कोठियां बहुत बड़ी हो जाएंगी, ऐशो आराम की चीज हो जाएंगी, पर बात वहीं आती हैं कि सब-कुछ होते हुए भी अगर नींद न आई और रोटी ही न पची, तो क्या फायदा हुआ सारा कुछ होने का। बात तो जिंदगी में सुख होने की है। शरीर तंदरुस्त हो, परिवार में खुशियां हो। …सो इसलिए ठग्गी, बेईमानी, भ्रष्टाचार से बचकर रहो।

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