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Thursday, February 12, 2026
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    चन्दा बॉन्ड के खरीददार क्यों छुपाए जा रहे?

    Canda brand

    अजीब लोकतंत्र है मेरे देश का, हर आॅफिस, हर सभा, हर भाषण सुबह शाम बात लोकतांत्रिक आदर्शों की हो रही है लेकिन इस लोकतंत्र की झंडाबरदार बनी राजनीतिक पार्टियां इस लोकतंत्र के हर तंत्र में भ्रष्टाचार की गुंजाइश को मिटने नहीं देना चाहती। अभी देश में चुनावी चंदे के बॉन्डस को लेकर गर्मागर्मी हो रही है। यह गर्मागर्मी जायज भी है क्योंकि जिस पार्टी को देश वासियों ने काला धन वापिस लाने के लिए चुना, अब वही पार्टी सरकार में बैठकर चुनावी चंदे पर मुंह सिले बैठी है।

    कांगे्रस ने संसद के भीतर व बाहर हर जगह पूछ लिया क्यों चंदा देने वालों के नाम छिपाए जा रहे हैं? भारतीय रिजर्व बैंक ने भी कहा था कि चुनावी चंदा के बॉन्डस राजनीतिक भ्रष्टाचार को बढ़ाने वाले हैं फिर भी पूर्व वित्त मंत्री स्वर्गीय अरुण जेटली ने इन्हें स्वीकृति दे दी क्यों? इतना ही नहीं चुनावी चंदे की शर्त किसी व्यक्ति, कंपनी की कमाई का कुल 15 प्रतिशत तक ही होगा, को भी हटा लिया अर्थात कोई कितना भी चंदा दे दे क्यों? देश में बहुत पहले से बात उठ रही है कि उद्योगपति राजनीतिक दलों को जो चंदा देते हैं वह दरअसल एक सौदेबाजी की कीमत है

    जोकि सरकार बनने पर राजनेता उद्योगपतियों को सूद सहित ही नहीं बल्कि भारी मुनाफे के साथ, मिलने वाले भावी चंदे तक जोड़कर लौटाते हैं। उद्योगपति ये वसूली करों में राहत पाकर, सरकारी गारंटी पर दिखावटी प्रोजेक्ट में ऋण लेकर, सरकारी ठेकों की रायल्टी को कम दरों पर भुगतान कर न जाने कैसे-कैसे हथकंडों से प्राप्त करते हैं। राजनेताओं को उद्योगपतियों का चंदा देने व रियायतें पाने का यही खेल देश भर में संगठित भ्रष्टाचार की जड़ है।

    संगठित भ्रष्टाचार ही वह अपराध है जिससे एक ओर यहां देश के संसाधन लूट लिए जाते हैं वही आबादी का एक बहुत बड़ा वर्ग मूलभूत सुविधाओं के लिए मोहताज बना रहता है। उद्योगपतियों के द्वारा राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले इलेक्ट्रोल बांड में सरकार है कि दानदाता का नाम छिपा रही है क्यों? फिर ऐसा भी कहा जा रहा है

    कि चुनावी चंदे का करीब 80 फीसदी धन भाजपा के खाते में गया, जोकि बहुत हैरानीजनक भी है। अब भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस व कालेधन का हर परिवार को 15 लाख देने, अलग पार्टी की पहचान रखने वाली, राष्टÑवादी पार्टी, न खाएंगे न खाने देंगे कहती रहने वाली पार्टी की सरकार इलेक्टोरल बांड पर क्यों कांग्रेस व विपक्षीयों को रूला रही है? सरकार ने दानदाताओं की लिस्ट ही तो देनी है, सबको बतां दे कि किसने कितना चंदा बॉन्ड खरीदा है ताकि देश भी छाती ठोक के कह सके कि उसने क्यों भाजपा को चुना।

     

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