टेलीकॉम सेक्टर: गहराता संकट और संभावनाएं

Telecom sector

सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद भारत के टेलीकॉम सेक्टर पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। यह क्षेत्र कारोबार के हिसाब से सबसे ज्यादा क्षमता वाला क्षेत्र रहा है। कुछ दशक पहले तक विश्व की बड़ी-बड़ी टेलीकॉम कंपनियां भारत के टेलीकॉम बाजार में उतरना चाहती थी। लेकिन आज स्थिति उलट है, और भारतीय बाजार में टेलीकॉम कंपनियों की कुल संख्या 4 तक सीमित हो गई है। जो पहले 15 के करीब होती थी। देश को जोड़ने में टेलीकॉम के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। पिछले एक दशक पहले तक भारत की जीडीपी में टेलीकॉम सेक्टर की हिस्सेदारी 8-9% तक होती थी। इस बेहतरीन सेक्टर को पहली बार झटका तब लगा जब लगभग 122 लाइसेंस कैंसिल कर दिए गए जिसके परिणाम स्वरूप 15 से 20 टेलीकॉम कंपनियां भारत से निकल गई।

सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद समायोजित सकल राजस्व जिसको एजीआर के नाम से भी जानते हैं, का करीब 74 हजार करोड़ रुपए एयरटेल और वोडाफोन को भारत सरकार को देना है। इस आदेश के बाद निश्चित तौर पर टेलीकॉम सेक्टर में संकट गहरा गया है। टेलीकॉम कंपनियों के अनुसार पिछले एक तिमाही में लगभग 54 हजार करोड रुपए का घाटा वोडाफोन का और 23 हजार करोड रुपए का घाटा एयरटेल का हुआ है। वर्तमान समय में निश्चित तौर पर कंपनियां सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित की गई राशि चुकाने की स्थिति में नहीं दिख रही हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार का यही रुख बना रहता है, तो निश्चित तौर पर यह भारत के टेलीकॉम सेक्टर के साथ-साथ बैंकिंग व्यवस्था और भारत की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करेगा।

भारत में रिलायंस जिओ के टेलीकॉम सेक्टर में उतरने के बाद से भारत के टेलीकॉम सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बढ़ी परिणाम स्वरूप अन्य कंपनियों को भी भारतीय बाजार में बने रहने के लिए अपने दामों में कमी करनी पड़ी। इसके साथ-साथ उनके उपभोक्ताओं में कमी भी देखने को मिली। भारत में हर वर्ष लगभग 16 से 21 प्रतिशत कनेक्शन बढ़ रहा है। कंपनियों को घाटे से उबारने के लिए आवश्यक है कि निर्णायक मंडल को एक मूल्य निर्धारित करना होगा, जिससे कम मूल्य में कोई भी कंपनी सेवा ना दे सके। ऐसी बाध्यता कंपनियों पर आरोपित करनी होगी जिससे कंपनियां सुरक्षित माहौल में प्रतिस्पर्धा के साथ जनता को बेहतर सेवाएं दे पाए।

टेलीकॉम कंपनियों को 2005-08 के बीच टेलीकॉम सेक्टर को बढ़ाने के लिए आमंत्रित किया गया और उनको लाइसेंस के तौर पर सरकार ने कुछ सुविधाएं भी दी। लेकिन 2019 में भारत सरकार द्वारा कहा जाता है कि 2005 में हमने जो सुविधाएं दी उसका 40 प्रतिशत रेवेन्यू देना होगा यह तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है। टेलीकॉम सेक्टर के संकट के लिए रेगुलेटर के साथ-साथ नीति निर्माता भी जिम्मेदार हैं।

लेकिन हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल नहीं उठा सकते, क्योंकि कोर्ट का फैसला कानूनों और साक्ष्यों पर आधारित है। जिस तरह की नीतियां बनाई गई थी कोर्ट ने उसी के आधार पर अपना फैसला दिया है। इस फैसले के अंतर्गत ऐसी कई कंपनियां आ रही हैं जिन्होंने लोगों को सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए इंटरनेट सेवा के लिए स्पेक्ट्रम खरीदा था। उदाहरण के रूप में आप दिल्ली मेट्रो को ले सकते हैं। दिल्ली मेट्रो ने मेट्रो में यात्रा करने वालों के लिए इंटरनेट सुविधा उपलब्ध कराने के लिए कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया था। फिर भी दिल्ली मेट्रो को इस फैसले के अंतर्गत कुछ राशि का भुगतान करना पड़ेगा। जिससे स्पष्ट होता है कि हमारी नीतियों में ही कमियां थी।

यह संकट यदि ज्यादा दिन तक बना रहता है तो निश्चित तौर पर यह एफडीआई को प्रभावित करेगा। मौजूदा समय में जहां भारत की जीडीपी दिन-प्रतिदिन गिरती जा रही है। अर्थव्यवस्था की स्थिति बदहाल है ऐसे समय में यदि विदेशी निवेशक भी भारत से दूर भागने लगे तो परिस्थितियां और भी विकराल रूप ले सकती हैं। इसलिए आवश्यकता है कि केंद्र सरकार को जल्द से जल्द कोई बीच का रास्ता निकालना होगा।

जिससे टेलीकॉम सेक्टर की कंपनियां भारत में बनी रहें और उन पर जो देनदारियां हैं, उसका भी कोई विकल्प निकल सके। केंद्र सरकार को कंपनियों की देनदारियों को किस्तों में बदलकर नया रूप देने की आवश्यकता है। जिससे कंपनियों पर अतिरिक्त बोझ ना पड़े और आसानी से एक निश्चित अंतराल में अपनी देनदारियों को अदा कर सकें। यदि किसी कारण बस इस सेक्टर में प्रतिस्पर्धा कम होती है तो निश्चित तौर पर नुक्सान आम आदमी का होने वाला है। इसलिए समय की आवश्यकता है कि टेलीकॉम सेक्टर में प्रतिस्पर्धा को कम होने से रोका जाए।
-कुलिन्दर सिंह यादव

 

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