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Thursday, April 9, 2026
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    कविता : किसान का बेटा हूँ…

    Son-of-Farmer

    किसान का बेटा हूँ ,
    खेतों में किस्मत बोता हूँ।
    खून पसीने से सींचता हूँ,
    कुदरत की मार भी सहता हूँ ।
    किसान का बेटा हूँ…

    खेतों में अपनी किस्मत खोते देखा हूँ।
    कभी सुखाड़ में तो कभी बाढ़ में,
    पिता के आँखों मे आँसू देखा हूँ।
    किसान का बेटा हूँ…

    अपनी फसलों को खेतों में जलते देखा हूँ।
    खुशियों को पिता के पसीनों में बहते देखा हूँ,
    फिर भी सब कुछ सह कर भी हंसते देखा हूँ।
    किसान का बेटा हूँ…

    मांग रहा हूँ कुछ बारिश की बूंदें।
    अपनी किस्मत को हरा-भरा होते देखना हैं,
    परिवार को खुश देखना चाहता हूँ।
    किसान का बेटा हूँ…

    बहन की शादी रचाने को, कर्ज को चुकाने को,
    भाई को पढ़ाने को, गिरवी रखे घर को छुड़ाने को ।
    खेती से ही परिवार को खुशहाल देखना चाहता हूँ।
    किसान का बेटा हूँ…
    प्रेम विशाल, बिहार

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