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    स्थापना के 55 साल बाद भी हरियाणा की अदालतों में हिंदी भाषा लागू नहीं

    Hindi language is not applicable in Haryana courts sachkahoon

    मार्च, 2020 में हरियाणा विधानसभा ने बनाया कानूनी प्रावधान, लागू करने की नोटिफिकेशन लंबित : एडवोकेट हेमंत

    चंडीगढ़ (सच कहूँ/अनिल कक्कड़)। हरियाणा प्रदेश की स्थापना 1 नवंबर 1966 को हुई और उस तारीख को बीते 55 साल हो गए हैं। प्रदेश के गठन के बाद विधानसभा मार्फत बनाए गए हरियाणा राजभाषा कानून, 1969 द्वारा हिंदी भाषा को प्रदेश की आधिकारिक भाषा (राजभाषा) का दर्जा प्रदान किया गया। लेकिन असलियत यह है कि आज भी प्रदेश की अदालतों में हिंदी भाषा लागू नहीं हो पाई है। हालांकि मार्च 2020 में विधानसभा द्वारा इस बाबत कानूनी प्रावधान बनाया गया, लेकिन अभी भी उसका नोटिफिकेशन लंबित है।

    इस बाबत जानकारी देते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हेमंत कुमार ने बताया कि प्रदेश में स्थापित जिला सेशंस एवं अधीनस्थ न्यायालयों ( मैजिस्ट्रेट अदालतों) के दैनिक काम काज का विषय है तो आज से 16 महीने पूर्व 11 मई 2020 को हरियाणा सरकार के गजट में हरियाणा राजभाषा (संशोधन) कानून, 2020 को नोटिफाई किया गया, जिसे बीती मार्च, 2020 में हरियाणा विधानसभा द्वारा पारित किया गया था एवं 31 मार्च 2020 को इसे तत्कालीन राज्यपाल सत्यदेव नारायण आर्य की स्वीकृति प्राप्त हुई।

    अदालतों में हिंदी भाषा के उपयोग हेतु प्रावधान

    हेमंत ने आगे बताया कि इस संशोधन कानून द्वारा हरियाणा राजभाषा अधिनियम, 1969 में एक नई धारा 3 ए जोड़कर हरियाणा प्रदेश के सभी सिविल (दीवानी ) और क्रिमिनल (दंड) न्यायालयों, जो पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के अधीन हैं, सभी राजस्व, रेंट अदालतों एवं राज्य सरकार द्वारा गठित अन्य सभी प्रकार की कोर्टों और ट्रिब्यूनलों के आधिकारिक काम-काज में हिंदी भाषा का प्रयोग करने सम्बन्धी प्रावधान किया गया।

    वकीलों की असहमति भी बाधा

    हेमंत ने बताया कि यह भी सत्य है कि प्रदेश में वकीलों का एक वर्ग ऐसा भी है, जो जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में हिंदी भाषा के प्रयोग सम्बन्धी कानून बनने से सहज नहीं है एवं इसका पुरजोर विरोध कर रहा है। इसलिए उक्त कानून को गत वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट में और फिर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। हालांकि दोनों अदालतों ने उक्त कानून को लागू करने पर स्टे नहीं दिया था। 8 जून 2020 को भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश अरविंद शरद बोबडे ने हालांकि इस संबंध में याचिका के दौरान मौखिक तौर पर कथित टिप्पणी की थी कि अदालतों में हिंदी भाषा लागू करने में किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए, क्योंकि हमारे देश में अधिकांश लोग अंग्रेजी भाषा में सहज नहीं है।

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