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    Kisan news: क्या होगा अगर खत्म हो जाएंगे खेत…

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    क्या होगा अगर खेत खत्म हो जाएंगे...

    आपको पता ही होगा कि पहले के लोग कैसे हुआ करते थे। उनका (Kisan news) खान-पान क्या था, कितनी हिम्मतवाले थे, कठिन परिश्रम करने में यकीन करने वाले, सारा-सारा दिन खेत में बिताने वाले, खेतों को ही अपना सब कुछ समझने वाले यानि बहुत ही मेहनती। लेकिन आज ना तो वो खान-पान रह गया है, ना ही वो लोग और ना ही वो खेत। क्योंकि आज का जवान नशों में अपनी जवानी बर्बाद करने में तुला हुआ है, जिसके आदी लोग खेतों को तो क्या अपने घरों तक को बेच कर खा चुके हैं और वो शहर की फैक्ट्रियों, मिलों आदि के काले धूएं में अपनी जिन्दगी झोंकने में लगे हुए हैं।

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    जिन लोगों के पास थोड़े बहुत खेत हैं भी वो आज (Kisan news) खेतों में मेहनत करने को राजी नहीं बल्कि खेतों को बेचकर गाड़ियां आदि खरीदकर घूम-फिरकर, जिन्दगी को ऐशो-आराम में गुजारने में खुश हैं और जब वो पैसा खत्म हो जाता है फिर कर्ज के बोझ में दबकर बैठ जाते हैं। इसलिए आज गांवों में घुसने पर आपको एक खामोशी सी महसूस होगी। गांवों में घरों के बाहर जो खाटें बिछी दिखती थी वो आज ना के बराबर हैं, गांवों की वो रौनकें खत्म सी हो गई हैं। एक रिपोर्ट की मानें तो जो गांव में खेती के जानकार बड़े-बूढ़े या किसान हुआ करते थे वो खत्म होते जा रहे हैं, जो थोड़े बहुत हैं भी वो भी खत्म ही हो जाएंगे।

    डाउन टू अर्थ की एक खबर के मुताबिक यूनिवर्सिटी आॅफ (Kisan news) कॉलोराडो बोल्डर ने एक शोध किया है जिसके परिणाम नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित किए गए हैं। उस रिपोर्ट के अनुसार सदी के अंत तक दुनिया भर में मौजूद खेतों की संख्या घटकर आधे से कम रह जाएगी। ऐसे में क्या किसानों द्वारा सदियों से संजोया उनका खेती के प्रति ज्ञान भी खत्म हो जाएगा। आंकड़ों के मुताबिक 2020 में दुनिया भर में खेतों की कुल संख्या 61.6 करोड़ थी। इसके बारे में अनुमान है कि वो सदी के अंत तक करीब 56 फीसदी की गिरावट के साथ घटकर 27.2 करोड़ रह जाएगी। हालांकि रिसर्च के मुताबिक मौजूदा खेतों का आकार बढ़कर दोगुना हो जाएगा। यह जानकारी यूनिवर्सिटी आॅफ कॉलोराडो बोल्डर द्वारा किए अध्ययन में सामने आई है।

    यह अपनी तरह का पहला अध्ययन है जिसके तहत साल (Kisan news) दर साल खेतों की संख्या में आने वाली कमी और उसके प्रभावों को ट्रैक किया गया है। इस अध्ययन के अनुसार अमेरिका, यूरोप में ही नहीं बल्कि आने वाले समय में अफ्रीका और एशिया जैसे क्षेत्रों में भी ग्रामीण किसान खेतों की घटती संख्या को देख सकेंगे। ऐसा ही कुछ उप सहारा अफ्रीका में भी महसूस किया जा सकेगा। लेकिन वो सदी के काफी बाद में होगा।

    अगर युवा खेती में दिलचस्पी नहीं लेगा तो जो पीढ़ियों (Kisan news) से खेती चली आ रही है वो भी खत्म हो जाएगी और अगर खेती खत्म हो जाएगी तो लाजिमी है कि उपज भी खत्म ही हो जाएगी। जब उपज ही नहीं रहेगी तो आम इंसान खाएगा क्या? अनाज कहां से लाएगा? उक्त रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि आज दुनिया में एक तिहाई अनाज का उत्पादन सीमान्त किसान करते हैं तथा छोटे और सीमांत किसानों के पास दुनिया की केवल 12 प्रतिशत कृषि भूमि ही है। खाद्य और कृषि संगठन के मुताबिक दुनिया के 70 प्रतिशत खेत एक हेक्टेयर से भी छोटे हैं। अगर इस संबंध में भारत की बात की जाए तो भारत में लगभग 14.6 करोड़ खेत हैं, जबकि कृषि भूमि 15.7 करोड़ हेक्टेयर। भारत में 86 प्रतिशत खेती वाली जमीन 2 हेक्टेयर से भी छोटे हैं।

    शोधकतार्ओं के अनुसार जैसे ही किसी देश की अर्थव्यवस्था (Kisan news) मजबूत होती है वैसे ही अधिक लोग शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन करते हैं। परिणाम यह होता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में इन खेतों को देखने के लिए बहुत कम लोग रह जाते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि खेतों की घटती संख्या और बढ़ता आकार खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करेगा। इसके साथ ही किसानों द्वारा सदियों से खेती के बारे में संजोया ज्ञान भी खत्म हो जाने का खतरा है। शोधकतार्ओं के अनुसार खेतों की कम संख्या का मतलब है कि खेती करने वाले किसान कम हैं। क्या होता है कि किसानों के पास उनके दादा-परदादा का सदियों में इकट्ठा किया हुआ ज्ञान होता है। लेकिन जैसे-जैसे किसानों की संख्या घटेगी उसके साथ ही यह सदियों पुराना ज्ञान भी खत्म हो जाएगा। क्योंकि जैसे-जैसे खेतों का आकार बढ़ेगा और वो सशक्त होंगे साथ ही मशीनों और तकनीकों का उपयोग बढ़ेगा। नतीजन सदियों पुराने पारम्परिक ज्ञान भी लोगों के लिए बेमानी हो जाएगा।

    रिसर्च के मुताबिक दशकों से अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में खेतों के आकार में वृद्धि और संख्या में गिरावट हो रही है। अमेरिका कृषि विभाग ने भी इसकी पुष्टि की है जिसके आंकड़ों के मुताबिक 2007 की तुलना में देखें तो अमेरिका में खेतों की कुल संख्या में दो लाख की गिरावट आई है। वहीं पता चला है एशिया, मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका, ओशिनिया, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्रों में खेतों की संख्या में गिरावट का दौर 2050 तक शुरू हो जाएगा। वहीं उपसहारा अफ्रीका में सबसे देर में सदी के अंत तक इसकी शुरूआत होगी। देखा जाए तो भले ही आने वाले वर्षों में दुनिया में कृषि भूमि की कुल मात्रा में बदलाव नहीं होगा, लेकिन खेतों पर कम लोगों का अधिकार रह जाएगा। ऐसे समय में जब जैव विविधता को बचाना सबसे बड़ा मुद्दा है। यह उसे खतरे में डाल सकता है। Kisan news

    खेतों की कमी से न केवल जैव विविधता बल्कि खाद्य आपूर्ति पर भी प्रभाव पड़ेगा। आपकी जानकार हैरानी होगी कि छोटे और सीमान्त किसान दुनिया में एक तिहाई से अधिक भोजन का उत्पादन कर रहे हैं। यह छोटे और सीमान्त किसान दुनिया की केवल 12 फीसदी कृषि भूमि को जोत रहे हैं। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार दुनिया में करीब 70 प्रतिशत खेत आकार में एक हेक्टेयर से भी छोटे हैं, जबकि यह कुल कृषि भूमि का केवल 7 प्रतिशत हिस्से पर है, वहीं 14 प्रतिशत खेतों का आकार एक से दो हेक्टेयर के बीच है, जो कुल कृषि भूमि का केवल चार प्रतिशत ही है। वहीं 2 से 5 हेक्टेयर आकार के दस प्रतिशत खेत हैं, जो कुल कृषि भूमि का 6 प्रतिशत हिस्सा ही हैं, वहीं 50 हेक्टेयर से बड़े खेत दुनिया में एक फीसदी से भी कम हैं, पर वो कुल कृषि भूमि के 70 फीसदी हिस्से पर काबिज हैं। Kisan news

    इनमें से कुछ खेत तो 1,000 हेक्टेयर से भी ज्यादा बड़े हैं, जो कुल कृषि भूमि के करीब 40 प्रतिशत हिस्से पर हैं। वहीं बात भारत की, की जाए तो देश में 15.7 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि पर 14.6 करोड़ खेत हैं जो कुल 86 प्रतिशत खेत आकार में 2 हेक्टेयर से भी छोटे हैं। जोकि कुल कृषि भूमि के 47 प्रतिशत से भी कम हिस्से पर हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि इन छोटे और सीमान्त किसानों पर विशेष तौर पर ध्यान दिया जाए। Kisan news

    वर्तमान पर नजर डालें तो दुनिया में करीब 60 करोड़ खेत हैं, जो 800 करोड़ लोगों का पेट भर रहे हैं। लेकिन सदी के अंत तक यह संख्या आधी रह जाएगी जिससे आधे किसानों पर पहले से कहीं ज्यादा लोगों की भूख शांत करने की जिम्मेवारी आ जाएगी। यह स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे हम इन किसानों को इसके लिए तैयार करेंगें। साथ ही इन किसानों की शिक्षा और मदद के लिए क्या कुछ कदम उठाने पड़ेंगे। इसके लिए जो कुछ भी कदम उठाने पड़ें, वो जरूर से जरूर उठाने चाहिएं और किसानों को खेती के लिए तैयार करना चाहिए।

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