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    Mahabharata: महाभारत काल से चली आ रही है हरियाणा के पिहोवा में ये प्रथा

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    Mahabharata: महाभारत काल से चली आ रही है हरियाणा के पिहोवा में ये प्रथा

    Mahabharata: पिहोवा, जसविंद्र। महाराजा पृथु की नगरी पृथुदक पिहोवा अपने धार्मिक महत्व के चलते विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाभारत सहित पुराणों ग्रथों में मां सरस्वती की इस नगरी को हरिद्वार, पुष्कर व गया बिहार से भी अधिक महत्व दिया है। पुराणों के अनुसार भगवान कृष्ण के कथन पर महारा युधिष्ठिर ने महाभारत युद्घ में अपने परिजनों व मारे गए वीरों की आत्मिक शांति के लिए यहीं पर क्रिया क्रम, गति व पिंडदान किया था। यहां के पुरोहितों के पास गुरूनानक देव जी, गुरू रामदास जी, गुरू अर्जुन देव जी , गुरू हर गोबिंद राय की वंशावली भी लिखी हुई है। इतना ही नहीं महाराजा रणजीत सिंह के परिवार का लेखा-जोखा भी इन बहियों में सुरक्षित है। पुरोहित विनोद पंचौली ने अपनी बही में दर्ज 1905 व 1906 संवत के लिखे गए लेख में दिखाया कि उस वक्त यहां पर व्यापारी घोड़े व बैल बेचने के लिए भी आते थे। इससे पता चलता है कि आज से सैकड़ो वर्ष पूर्व यहां पर पशु मंड़ी भी लगती थी।

    अभिलेख के रूप में मौजूद है रिकार्ड | Mahabharata

    पंडितों के पास कर्ई प्राचीन अभिलेख रिकार्ड के रूप में सुरक्षित हैं। इसे बही या पौथी के नाम दिया गया है। पुरोहितों ने व्यवसाय व धार्मिक रस्मों की पूर्ति के लिए इन्हें सहेज रखा है। यहां के पंडित पुरोहितों के पास 17वीं शताब्दी के 300 से 400 वर्ष पुराने रिकार्ड देखे जा सकते हैं। जहां पर यात्रियों को उसकी वंशावली बताकर उनके पूर्वजों के नाम व हस्ताक्षर दिखाए जाते हैं। तीर्थ पर आने वाले प्रत्येक यात्री का भविष्य के लिए उनके आने का प्रयोजन परिवार के सभी सदस्यों के नाम लिखकर हस्ताक्षर करा लिए जाते हैं। जो रिकार्ड का एक हिस्सा बन जाते हैं।

    राजाओं की संपत्ति का है विवरण | Mahabharata

    इनके अतिरिक्त प्राचीन राजा महाराजाओं द्वारा अपने मंत्रियों व कुल पुरोहित द्वारा भेजे गए दान का भी वर्णन है। पुरोहित को कई बार दान में पूरा गांव ही दे दिया जाता था। राजा महाराजा कई बार विदेशी भाषा में भी दान पट्टा लिखकर दे जाते थे। 165 वर्ष पूर्व परशियन भाषा में एक पट्टा पटियाला के महाराजाधिराज ने अपने पुरोहित पंडित गोपाल जी स्वरूप लाल को दिया । उस समय मोहम्मदपुरा गांव दो कुएं जिनकी वार्षिक आय 300 रूपए थी व किशनपुरा नामक पूरा गांव दान में पुरोहित को दे दिया। एक अन्य पुरोहित के बहि से प्राप्त अभिलेख में लिखा है कि भदोड़ शहर के रईस जब पिंजुपुरा गांव में कब्जा लेने जा रहे थे तो पिहोवा में अपने पुरोहित को मिले व उन्हें लिख दिया कि गांव का कब्जा मिलने पर वह अपने तीर्थ पुरोहित को छह मण अनाज हर फसल पर देंगे। यह लेख सम्वत 1894 का है।

    बंटवारे के वक्त बिछड़ों को मिलाया

    बंटवारे के वक्त भारत पाक के बीच हुई कत्लेआम के बाद जब माहौल सामान्य हुआ तो नई पीढिय़ों को इन्हीं बहियों से पता चला कि उनके परिवार के ताऊ चाचा दादा आज किस जगह पर रह रहे हैं।

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