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    डॉ. प्रदीप जैन जिन्होंने अपने सपनों से नहीं, लोगो की साँसो से इतिहास रचा

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    Baraut News: डॉ. प्रदीप जैन जिन्होंने अपने सपनों से नहीं, लोगो की साँसो से इतिहास रचा

    जिन्होंने 37 साल पहले लिया था ग्रामीण अंचल को बेहतर चिकित्सा देने का संकल्प

    • संघर्ष की तपिश, सेवा की साधना और संवेदना की शक्ति—जिसने बड़ौत को दिया अपना अक्षय चिकित्सक

    बड़ौत (सच कहूँ संदीप दहिया)। Baraut News: बड़ौत के अक्षय नर्सिंग होम के एमड़ी डॉ. प्रदीप जैन बड़ौत क्षेत्र में चिकित्सा सेवा का ऐसा नाम हैं, जिन्होंने डॉक्टर की भूमिका को केवल उपचार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे मानवीय संवेदना और सामाजिक दायित्व से जोड़ा। शहरों की सुविधाजनक राह छोड़ ग्रामीण अंचल को अपनी कर्मभूमि बनाया। वर्ष 1989 में बड़ौत आकर उन्होंने अभावों, संघर्षों और सीमित संसाधनों के बीच सेवा का दीप जलाया डॉ. प्रदीप जैन के जीवन की नींव बचपन में ही पड़ गई थी। Baraut News

    उनके मन में एक ही सवाल गूंजता रहता था—दूसरों के दर्द को कैसे कम किया जाए, बीमार चेहरे पर मुस्कान कैसे लौटाई जाए। इसी भावना ने उन्हें डॉक्टर बनने की राह दिखाई। जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, अजमेर से MBBS और MD की पढ़ाई पूरी कर उन्होंने अपने सपने को साकार किया। पिता राजस्थान में डिस्ट्रिक्ट जज के पद से सेवानिवृत्त हुए, लेकिन डॉ. प्रदीप जैन ने सुविधाओं की बजाय सेवा का मार्ग चुना।

    शहर की चमक ठुकरा, बड़ौत खींच लाई ग्रामीण पीड़ा | Baraut News

    अक्टूबर 1989 में जब अधिकांश डॉक्टर बड़े शहरों की ओर दौड़ रहे थे, तब डॉ. प्रदीप जैन ने दिल्ली की चमक छोड़कर बड़ौत की धूल को अपनाया। यहां न अच्छे अस्पताल थे, न जागरूकता। छोटी बीमारी भी लोगों को दिल्ली और मेरठ की दौड़ लगवाती थी। वर्धमान हॉस्पिटल में डेढ़ वर्ष की निःस्वार्थ सेवा के बाद उन्होंने अपना छोटा सा क्लिनिक शुरू किया। बिजली नहीं, गर्मी बेहाल करती थी। दिन भर की मेहनत के बाद भी सुकून की नींद नसीब नहीं होती थी, मगर हौसला कभी नहीं टूटा।

    1994 की वह सुबह, ज़ब हुई अक्षय नर्सिंग होम की स्थापना

    अपने व्यवहार, संवेदना और निष्ठा से डॉ. प्रदीप जैन ने लोगों के दिल जीते। 1994 में उन्होंने अक्षय नर्सिंग होम की नींव रखी। गांव-गांव जाकर स्वास्थ्य शिविर लगाए, लोगों को बीमारियों के प्रति जागरूक किया और दिन-रात मेहनत की। सपना सिर्फ एक था—क्षेत्र को बेहतर और सुलभ चिकित्सा मिले। मेहनत रंग लाई और क्षेत्रवासियों ने उन्हें असीम प्रेम और भरोसा दिया। उनकी जीवन संगिनी डॉ. निकेता जैन (MS गायनोकोलॉजी) ने भी सेवा-यात्रा में कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया।

    कोरोनाकाल का केवट: जब अक्षय नर्सिंग होम बना जीवन की अंतिम आस

    जब कोरोना ने अपनों को पराया कर दिया, तब डॉ. प्रदीप जैन ने इंसानियत को नहीं छोड़ा। बड़ौत में अक्षय नर्सिंग होम ही वह एकमात्र सहारा बना, जिसने कोरोना पीड़ितों का साहस और धैर्य के साथ इलाज किया। सैकड़ों जिंदगियां बचीं, अनगिनत घरों में फिर से चूल्हे जले। Baraut News

    वे मरीजों की जिंदगी के केवट बने—जिनकी सूझ-बूझ ने मौत के मुंह से भी लोगों को वापस खींच लिया।

    5. “टूटे नहीं, झुके नहीं—अपहरण, अफवाहें और फिर भी अडिग विश्वास”

    सफलता के साथ संघर्ष भी आया। करीब 20 वर्ष पहले पत्नी और बच्चों के अपहरण जैसी भयावह घटना, अफवाहों का दौर—पर डॉ. प्रदीप जैन कभी नहीं टूटे। आज वे सिर्फ एक डॉक्टर नहीं, बल्कि क्षेत्रवासियों के दिलों पर राज करने वाले सेवक हैं। उनकी कहानी बताती है कि जब सेवा ही संकल्प बन जाए, तो संघर्ष भी सफलता की सीढ़ी बन जाता है।

    जीवन दर्शन: फिट रहना, समय पर जांच और समाज के लिए चिंता

    दिनभर की भागदौड़ के बावजूद डॉ. प्रदीप जैन रोज़ाना दो घंटे योग और व्यायाम करते हैं। डॉ प्रदीप जैन अपनी सेहत के साथ दूसरों की सेहत क़ो सही रखना अपनी जिम्मेदारी समझते है। उन्होंने चेताया कि खराब लाइफस्टाइल के कारण मोटापा, हृदय रोग और अन्य बीमारियां बढ़ रही हैं, इसलिए समय पर जांच अनिवार्य है।

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