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Saturday, February 28, 2026
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    कर्म और भक्ति

    Sant-Tukaram
    Sant-Tukaram
    एक जिज्ञासु संत तुकाराम की खोज में निकल पड़ा। पूछते-पूछते वह संत तुकाराम के पास पहुँचा। उसने देखा तुकाराम एक दुकान में बैठे कारोबार में व्यस्त हैं। वह दिन भर उससे बात करने की प्रतीक्षा करता रहा और तुकाराम सामान तोल-तोल कर बेचता रहे। दिन ढला तो वह बोला,‘मैं परमज्ञानी संत की शरण में ज्ञान पाने गया था, तो उन्होनें मुझें आपके पास भेज दिया। लेकिन मैंने तो आपको सारा दिन केवल कारोबार करते देखा। प्रभु भजन या धूप-दिया-बाती करते नहीं देखा। मैं समझ नहीं पा रहा कि परम संत आपक ों संत क्यो मानतें है?’’ इस पर तुकाराम बोले,‘‘मेरे लिए मेरा काम ही पूजा है। मैं कारोबार भी प्रभु की आज्ञा मानकर करता हूँ। जब-जब मैं सामान तोलता हूँ और तराजू की डंडी संतुलन में स्थिर होती हैं तब-तब में भीतर जाकर मन कि परीक्षा लेता हूँ जाग रहा है न? तू समता में स्थित है या नहीं? साथ-ही-साथ ईश्वर का स्मरण कर लेता हूँ। मेरा हर पल, हर कर्म ईश्वर की आधारना है।’’ उस जिज्ञासु ने संत तुकाराम के चरण स्पर्श किए। कर्म और भगवत-भक्ति का परम ज्ञान पाकर उसका हृदय प्रफु ल्लित हो उठा था।

    लोकमान्य तिलक

    नदी कि सूखी तलहटी थी। कं कड़-पत्थरों में हीरा, माणिक और पन्ना खोजने वाला खोजी थकान से श्रांत-क्लांत हो गया था। वह अत्यंत परेशान होकर अपने साथियों से बोला,‘‘में अपनी इस खोज से पूरी तरह निराश हो गया हूँ। क ई दिनों की निरंतर मेहनत से मैंने अब तक कोई निन्यानवे हजार नौ सौ निन्यानवे पत्थर बटोर लिए होंगे,परन्तु मुझे अपनें ढेर मे हीरे, माणिक और पन्ना का एक कण भी नही मिला।’’ इस पर उसके एक साथी ने हँसकर कहा,‘‘एक पत्थर की गिनती पूरी एक लाख हो जाएगी। शायद उसी में तुम्हारा अरमान पूरा हो जाए और कोई मिल इच्छित पत्थर ले जाए।’’ निराश साथी ने नदी की तलहटी से एक और पत्थर उठा लिया। वह दूसरे पत्थरों से अधिक भारी था। उस चमकीले पत्थर को देखकर वह चिल्लाने लगा,‘‘दोस्तो गजब हो गया यह तो हीरा है। असल में हीरे की खान मिल गई।’’लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक भी जीवन यज्ञ में अनवरत प्रयास की निरंतर आहुति देने में ही जीवन की सफलता का अनुभव करते थे। उन्होंने लिखा था,‘‘संसार में एक ही वस्तु क ो में परम पवित्र मानता हूँ, वह है मनुष्य का अपनी प्रगति के लिए किया गया अनवरत प्रयास। मानव मात्र के प्रति निश्छल प्रेमभाव रखते हुए और ईर्ष्या-द्वेष आदि भावनाओं की कलुषित छायाओं से दूर रहकर निष्काम भाव से श्रमरत रहने की भावना ही जीवन की सर्वोच्च साधना है।’’

     

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