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    सीमा पर खून खराबा-भारत इसे कैसे रोके?

    Bloodshed at the border - how should India stop it
    पूरा विश्व पूर्णतया या आंशिक रूप से लॉकडाउन की स्थिति में है और कोरोना महामारी से अपने अस्तित्व को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। इस महामारी से ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सहित विभिन्न क्षेत्रों के अनेक शीर्ष पदाधिकारी भी प्रभावित हैं। शायद मानव इतिहास में पहली बार संपूर्ण विश्व एक साझे अदृश्य दुश्मन का मुकाबला कर रहा है।
    14वीं सदी में प्लेग से लाखों लोग मारे गए थे किंतु यह यूरोप तक सीमित रहा और संपूर्ण विश्व में इस महामारी के प्रकोप को देखते हुए लोग भविष्य को लेकर सशंकित हैं। भय के इस माहौल में यह खबर सुनकर अत्यंत दुख हुआ कि उत्तर कश्मीर के केरन सेक्टर में हमारे पांच कमांडो वीरगति को प्राप्त हुए। इनमें से तीन कमांडो दुश्मन के विरुद्ध कार्यवाही के दौरान मौके पर ही शहीद हो गए और दो ने सेना के अस्पताल में दम तोड़ा। इन कमांडो के मृत शरीरों के बगल में पांच आतंकवादियों के शव बताते हैं कि इनके बीच काफी निकटता से संघर्ष हुआ और यह वास्तव में बहुत आहत करने वाली बात है कि जब संपूर्ण विश्व मानव के अस्तित्व के लिए मुकाबला कर रहा है तो हमारी सीमाओं पर पाकिस्तान द्वारा भ्रमित लोगों द्वारा ऐसी कार्यवाही की जा रही है।
    प्रश्न यह भी उठता है कि हम सीमा पर अपने लोगों का खून बहाना किस तरह बंद करें। नियंत्रण रेखा पर भारतीय सीमा के भीतर जासूसी ड्रोन द्वारा पैरों के निशान से घुसपैठियों की उपस्थिति का पता चला था। उसके बाद ऑपरेशन रंडोरी बेहक चलाया गया और हमारी सेना के स्पेशल फोर्स कमांडो को हिमाच्छादित केरन सेक्टर में लगभग 10 हजार फुट की ऊंचाई पर हवाई जहाज द्वारा पहुंचाया गया। सेना के सूत्रों के अनुसार ये कमांडो फिसलकर एक खाई में गिरे जहां घुसपैठिए छुप रहे थे। इन सभी घुसपैठियों को मार दिया गया और इस संघर्ष में हमारे पांच कमांडो भी वीरगति को प्राप्त हुए। पिछले रविवार की इस घटना से कुछ प्रश्न उठते हैं जिनके तुरंत उत्तर दिए जाने की आवश्यकता है। तात्कालिक चुनौती यह है कि आतंकवादियों द्वारा सीमा पार से ऐसी कार्यवाही फिर से की जा सकती है क्योंकि इस समय पूरे देश का ध्यान कोरोना महामारी के नियंत्रण पर है। हालांकि सेना हमेशा सतर्क रहती है किंतु हो सकता है राजनीतिक नेतृत्व का ध्यान इस ओर न जाए। दूसरा, आतंकवादी हमारे देश के संसाधनों को अन्यत्र लगाने के लिए विवश करें और कश्मीर में समस्या पैदा करते रहें और तीसरा, भारत तब तक सीमा पर इस खून खराबे को नहीं रोक सकता जब तक सीमा पार आतंकवाद का स्थायी समाधान न हो।
    इस स्थिति से निपटने के लिए भारत को दोहरी रणनीति की आवश्यकता है। पहला, कश्मीर घाटी में शांति, सौहार्द, व्यवस्था और स्वाभिमान बनाए रखना ताकि अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों को वहां हस्तक्षेप करने का बहाना न मिले। कश्मीर में किसी तरह के असंतोष से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का उस ओर ध्यान जाएगा और भारत को अपनी उर्जा और संसाधनों का उपयोग उस ओर मोड़ना पडेगा। दूसरा, भारत को अपने हिस्से वाले कश्मीर की रक्षा के बजाय पाक अधिकृत कश्मीर को प्राप्त करने पर ध्यान देना होगा। रणनीति में ऐसे बदलाव से लक्ष्य बदल जाएगा और पाकिस्तान के साथ वार्ता की शर्तें भी बदल जाएंगी। ऐतिहासिक दृष्टि से कश्मीर पर हमेशा कब्जा रहा है। उनका आत्मनिर्णय के लिए संघर्ष 1947 में भारत के विभाजन से पहले से चल रहा है। मुगलों ने 1589 में कश्मीर पर कब्जा किया और उसके बाद कश्मीर पर कश्मीरियों को शासन करने का अवसर नहीं मिला। मुगलों के बाद 1753 से लेकर 1819 तक वहां पर अफगानों ने 1819 से 1846 तक सिखों ने और 1846 से 1947 तक डोगरों ने राज किया। डोगरोंं ने कश्मीर को अंग्रेजों से 75 लाख नानकशाही रूपए में खरीदा।
    डोगरा राजा हरी सिंह भारत के विभाजन के समय स्वतंत्रता चाहते थे किंतु पाक समर्थित कबीलाइयों द्वारा राज्य पर हमले के बाद उन्होने कश्मीर का भारत में विलय किया। 1947 में कश्मीर के भारत में विलय के बाद से ही केन्द्र कश्मीर के संबंध में अपनी भूमिका और जिम्मेदारियों के प्रति चिंतित रहा किंतु यह प्रक्रिया अधूरी रही क्योंकि पाकिस्तान में कश्मीर के कुछ हिस्से पर अवैध कब्जा किया। 5 अगस्त 2019 को भारत ने कश्मीर के बारे में 1947 के बाद एक बडा कदम उठाते हुए अनुच्छेद 370 को समाप्त किया जिसके अंतर्गत कश्मीर घाटी को विशेष दर्जा प्राप्त था और इसे एक संघ राज्य क्षेत्र बनाया। भारत सरकार ने कश्मीर के विकास के लिए अनेक विकास परियोजनाएं बनायी हैं किंतु उन्हें पूरा कराने के बजाय वह डोमिसाइल कानून ले आयी। इससे सरकार की प्राथमिकताओं का अंदाजा नहीं लगता है।
    राज्य में सामान्य स्थिति बहाल होने पर विकास कार्यों में तेजी आएगी तो फिर लोग नए कानून का समर्थन करेंगे। डोमिसाइल कानून के प्रति लोगों में आक्रोश है और यह एक तरह से एनआरसी लागू करने के समान है। जब हमारा देश विकास के एक नए चरण और विश्व में विशेष स्थिति प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है और हमारे शक्तिशाली प्रधानमंत्री दूसरी बार चुने गए हैं तो हम राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर जैसे विवाद में फंस गए हैं। रणनीति का दूसरा हिस्सा पाक अधिकृत कश्मीर को वापस प्राप्त करना है। सेना के जनरल, गृह मंत्री और अन्य नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि पाक अधिकृत कश्मीर भारत का है और यह समय की बात है कि भारत उसे कभी भी वापस ले लेगा। किंतु इस संबंध में कोई कूटनयिक, राजनीतिक या सैनिक रणनीति देखने को नहीं मिली। हम केवल बड़ी-बड़ी बातें करते जा रहे हैं और इससे लाभ नहीं मिलेगा।
    देश में कोरोना महामारी पर अंकुश लगने के बाद हमें पाकिस्तान को कहना चाहिए कि वह पाक अधिकृत कश्मीर को खाली करे। भारत को उसे संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव को लागू करने के लिए कहना चाहिए जिसके अंतर्गत पाक अधिकृत कश्मीर से पाकिस्तानी सेना की वापसी होगी या शिमला समझौता लागू करने के लिए कहें और कश्मीर का एकीकरण करें। कश्मीर के एकीकरण के बाद भारत के अभिन्न हिस्से के रूप में उसकी संस्कृति की रक्षा के लिए उसे कुछ स्वायत्तता दी जा सकती है। भारत को कश्मीर के एकीकरण और भारत के एक राज्य के रूप में उसके विकास के बारे में एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए और यही सीमा पर खून-खराबा रोकने का उपाय है। इस निर्णायक कदम के बिना हम तात्कालिक उपाय करते रहेंगे। पाक समर्थित आतंकवादी हमलों का जवाब देते रहेंगे, देश में तथा देश के बाहर निहित स्वार्थी तत्वों के हस्तक्षेप के लिए कूटनयिक प्रयास करते रहेंगे।
    प्रो. डीके गिरी

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