पश्चिम बंगाल में दलबदल

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Trinamool Congress

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस लगातार भाजपा को झटके पर झटका दे रही है। कालियागंज से भाजपा विधायक सौमेन राय कोलकाता में राज्य मंत्री और पार्टी नेता पार्थ चटर्जी की मौजूदगी में टीएमसी में शामिल हो गए। इससे पहले बागदा से भाजपा विधायक विश्वजीत दास तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे जबकि विधायक तन्मय घोष ने तृणमूल कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की थी। दरअसल पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने टीएमसी में बड़ी सेंधमारी की थी। अब चुनावों के बाद राज्य में ठीक उसके उलट हो रहा है। आलम यह है कि भाजपा के कई विधायक और नेता टीएमसी से गलबहिया करने को बेताब हैं। राज्य में एक जमाने में सत्तारूढ़ रही पार्टी कांग्रेस पूरी तरह हाशिये पर खिसक चुकी है और दूसरी लगातार 34 साल तक शासन में रहने वाली मार्क्सवादी पार्टी भी अपनी विपक्षी पार्टी तक होने का रुतबा खो चुकी है।

राज्य में इस समय भाजपा प्रमुख विपक्षी पार्टी है। यह स्थिति इसने मई चुनावों के बाद ही अर्जित की है। इससे साफ जाहिर होता है कि विधानसभा चुनावों में ममता दी की तृणमूल कांग्रेस ने जो राजनैतिक विमर्श खड़ा किया था, उसके मुकाबले में केवल भाजपा ही टिक सकी। यह राज्य साम्यवादी विचारधारा से लेकर समाजवादी और गांधीवादी विचारों की प्रयोगशाला के रूप में जाना जाता रहा है। इतना ही नहीं, राज्य के विद्वान राजनैतिक विचारकों में विशिष्ट स्थान रखने वाले स्व. एम.एन. राय बंगाल के ऐसे सपूत रहे जिन्होंने केवल भारत में ही कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना में प्रमुख भूमिका नहीं निभाई बल्कि मैक्सिको की कम्युनिस्ट पार्टी की भी स्थापना की। वहीं दूसरी तरफ इसके ठीक विपरीत विचार रखने वाले एक समय तक हिन्दू महासभा के नेता रहे डा. श्यामप्रसाद मुखर्जी ने आजाद भारत में 1951 में घनघोर राष्ट्रवादी संगठन जनसंघ की स्थापना की।

यह बंगाल की धरती वैचारिक रूप से भी उतनी हरी-भरी रही जितनी कि भौतिक रूप से। इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि इस राज्य के लोगों का मानसिक रूप से राजनैतिक स्तर क्या हो सकता है? राज्य विधानसभा में भाजपा विधायकों की संख्या तीन से बढ़ कर 77 हो गई परन्तु इसके बाद भाजपा नेताओं का पार्टी छोड़ कर तृणमूल में शामिल होना बता रहा है कि उन्हें लोगों की राजनैतिक मानसिकता में परिवर्तन की उम्मीद नहीं है। बाबुल सुप्रियो हालांकि जमीन से जुड़े कोई कद्दावर नेता नहीं हैं क्योंकि सांसद होने के बावजूद वह पिछला विधानसभा चुनाव तक हार गये मगर इतना जरूर है कि वह बंगाल में बहती हवा के साथ चलना चाहते हैं। उनके दल-बदल की कैफियत बस इतनी सी है। वैसे नए चलन पर भाजपा का आरोप है कि चुनाव के बाद जो हिंसा हुई है, उससे डरकर, बाध्य होकर भाजपा कार्यकर्ता टीएमसी में शामिल हो रहे हैं।

 

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