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    Greenery: हरियाली का विकास और विनाश

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    Greenery: शिमला योजना को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए 11 अगस्त की तारीख तय की है। भले ही यह मामला विचारधीन है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई से पहले ही जो टिप्पणी की है वह वर्तमान संदर्भ में एक बहुत ही प्रासंगिक और तत्काल आवश्यकता की ओर भी इशारा करती है। कोर्ट ने कहा है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन आवश्यक है। मामला यह है कि शिमला योजना को लेकर एनजीटी ने 2017 में जो गाइडलाइन जारी की थी, वर्तमान हिमाचल सरकार जो योजना जारी कर रही थी, वह एनजीटी की गाइडलाइन के विपरीत थी।

    मुद्दा यह है कि राज्य सरकार जिस प्रकार की योजना लागू करने का प्रयास कर रही है, उससे तय है कि हरियाली पर कुल्हाड़ी चलेगी। विकास परियोजना से पर्यावरण प्रभावित होना तय है। यहां एनजीटी की आपत्तियों को उचित समझना चाहिए। सत्ताधारी दलों के हित इसी बात में सुरक्षित हैं कि नए निर्माणों से विकास की छवि जनता के समक्ष पेश करें। वोट बैंक की लालसा में पर्यावरण को अनदेखा नहीं करना चाहिए। जहां तक ​​एनजीटी की समझ और दृष्टिकोण का प्रश्न है, यह सरकारी संस्था राजनीतिक पक्षपात से रहित है। एनजीटी भाजपा सरकार की योजना पर भी सवाल उठा चुका है और अब कांगे्रस सरकार के कार्य पर भी आपत्ति जताई है।

    गलत रणनीति के तहत होने वाले विकास कार्यों को रोकना एनजीटी का कार्य है, जिसे वह बिना स्वार्थ के कर भी रहा है। भ्रष्टाचार के कारण बिल्डर ऐसे नक्शों को पास करने में जल्दबाजी कर रहे हैं जहां पेड़ों, पहाड़ों, झीलों और झरनों की प्राकृतिक छटा और प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है। अवैध खनन ने भूखंडों की सुंदरता और प्राकृतिक स्वरूप को बदल दिया है। कंक्रीट की बहुमंजिला इमारतें बन चुकी हैं। केंद्र और राज्य में विभिन्न पार्टियों की सरकार होने के कारण और राजनीतिक एकजुटता की कमी के कारण अब तक कोई संयुक्त अभियान नहीं चल सका।

    पहाड़ों में होटलों का निर्माण हो गया हैं, होटलों की भीड़ में धार्मिक स्थल नजर नहीं आते। होटलों के साथ आधुनिक जीवन शैली ने धार्मिक संस्कृति को धुंधला कर दिया है। शायद इसी कारण मध्य प्रदेश की एक धार्मिक संस्था ने अपने एक मंदिर को विश्व विरासत का दर्जा देने से इनकार कर दिया है, क्योंकि वहां होटल बनने से धार्मिक संस्कृति को ठेस पहुंचने का खतरा था। जहां तक ​​शिमला योजना की बात है तो जंगलों, पहाड़ों, झीलों, नदियों को नुक्सान पहुंचाने वाली परियोजनाओं को रोकना जरूरी है क्योंकि पर्यावरण न केवल मानव जीवन है बल्कि संस्कृति का भी अभिन्न अंग भी है।

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