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    राजनीतिक निर्णयों के चक्करव्यू में फंसी शिक्षा

    Education

    शिक्षा समाज ही नहीं देश की तरक्की का भी आधार है। शिक्षा शास्त्रियों की नजर में शिक्षा एक गैर-राजनीतिक विषय है, जिस संबंधी कोई निर्णय लेने से पहले शिक्षा विशेषज्ञों की राय लेना आवश्यक है। लेकिन यह हमारा ही देश है जो शिक्षा पर राजनीतिक निर्णय थोपने से भी परहेज नहीं करता। केन्द्र की एनडीए सरकार ने 2009 में शिक्षा अधिकार एक्ट में बदलाव कर दिया है, अब 8वीं तक के बच्चों को न्यूनतम अंक न लेने पर फेल किया जाएगा। पूर्व यूपीए सरकार ने शिक्षा अधिकार एक्ट जारी किया था व प्रावधान रखा था कि आठवीं तक किसी भी छात्र को फेल नहीं किया जाएगा।

    नीतियों का एक खेल सा बन गया है, जिस भी पार्टी की सरकार आती है वह पूर्व सरकार के निर्णयों को पलटने में अपनी उपलब्धि मानती है। यह बिल्कुल उसी तरह है जैसे ईमारतों व सरकारी योजनाओं के नाम बदले जाते हैं। ऐसे निर्णयों के लिए फंड की आवश्यकता नहीं होती, शोहरत मुफ्त में मिल जाती है। मोदी सरकार ने योजना आयोग का नाम नीति आयोग कर दिया है। उत्तर प्रदेश में कुछ शहरों के नाम बदल दिये हैं। यह चलन राजनीतिक लाभ लेने के हैं परंतु इससे देश को मिलता कुछ नहीं।

    जहां तक शिक्षा का संबंध है, इन राजनीतिक निर्णयों से सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों का पढ़ाई बीच में छोड़ने का चलन रूका नहीं है। उन मुश्किलों को हल करने का प्रयास नहीं किया गया जो शिक्षा में वास्तविक रूकावट बन रहे हैं। बच्चे फेल होने या पास होने का मुद्दा अध्यापकों की कमी व स्कूलों में आवश्यक प्रबंधों के साथ जुड़े हुए हैं। फेल बच्चा नहीं होता बल्कि सरकार, माता-पिता और शिक्षा प्रशासन फेल होता है, जो अपेक्षित माहौल बनाने में नाकाम रहते हैं।

    सरकारी स्कूलों में माता-पिता व अध्यापकों में तालमेल ही नहीं बन सका है और बच्चों की मानसिकता व घरेलू माहौल के लिए कोई चर्चा नहीं हो पाती। ऐसे हालातों में केवल अध्यापक की ओर से दिए अंकों के आधार पर ही फेल या पास का निर्णय शिक्षा की कसौटी नहीं बन सकता। देश भर के स्कूलों में अध्यापकों व मुख्य अध्यापकों के रिक्त पड़े पदों को भरने के लिए कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। अध्यापक शब्द के साथ कॉन्ट्रैक्ट शब्द लगाकर अध्यापक की गरिमा को बिगाड़ कर रख दिया है।

    एक स्कूल में एक ही काम के लिए दो अध्यापकों पर कच्चे व पक्के अध्यापक का ठप्पा लगा दिया जाता है। बराबर योग्यता वाले अध्यापक को चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से भी कम वेतन देना हीनभावना व बेचैनी का कारण बन रहा है। परीक्षा का विरोध नहीं किया जा सकता परंतु परीक्षा ही शिक्षा की कसौटी नहीं। विभिन्न सरकारें एक -दूसरे के निर्णय को उलटने की अपेक्षा शिक्षा ढांचे की उन खामियों को ढूूंढेÞ जो बच्चे को कुछ सीखने में अड़चन पैदा कर रही हैं। राजनीतिक शेखीबाजी शिक्षा का नुक्सान करती है।

     

     

     

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