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    आशा की जोत जलाते ये कश्मीरी युवा

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    कुछ राह से भटके युवाओं के कारण बेशक आज घाटी अपनी बेबशी पर आंसू बहा रही हो, पर उजला पक्ष यह भी है कि इसी कश्मीर के युवा पढ़ाई-लिखाई और खेलकूद में देश और प्रदेश का गौरव बढ़ाने में पीछे नहीं हैं।

    इसी माह आए जेईई के परिणामों में कश्मीर के 9 युवाओं ने सफलता के झण्डे गाड़े हैं, वहीं पिछले दिनों ही देश की सर्वोच्च सम्मानजनक सेवा भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा में कश्मीर के 14 युवाओं का चयन इस बात का प्रमाण है कि वहां के युवा शांति चाहते हैं, देश के प्रति उनकी निष्ठा है। पत्थरबाजी उनकी पहचान नहीं होकर संजीदा और जिम्मेदार युवा की अपनी पहचान बनाने में जुटे हुए हैं।

    2016 की परीक्षा में शीर्ष 10 में अपना नाम शामिल कराना कश्मीर की कश्मीरीयत की पहचान है। अपने निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए घाटी के युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे अलगाववादियों, राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे राजनेताओें, सेना को हतोत्साहित करने में जुटे बरसाती मेंढकों, विरोध के लिए राष्टÑधर्म से भी परहेज करने वाले प्रतिक्रियावादियों के गाल पर इससे बड़ा तमाचा क्या होगा कि शिक्षा का क्षेत्र हो या खेल का मैदान कश्मीर के युवा पीछे नहीं हैं। केवल अशांत चार जिलों का कश्मीर नहीं है, यह नहीं भूलना चाहिए ब्यानवाजी करने वालों को।

    मजे की बात यह है कि इसमें बहुत अधिक श्रेय उसी सेना को जाता है, जो पत्थर की मार भी झेल रही हैं, फिदायिनी हमलों को विफल करने मेंं भी जुटी है, देश की सरहद की रक्षा में अपनी जान भी हथेली पर रखकर चल रही है, नेताआें की फिसलती गैरजिम्मेदाराना ब्यानों के बावजूद अपना संयम बनाते हुए कश्मीर में कहा जाए, तो एक-साथ कई मोर्चों पर संघर्ष करते हुए कश्मीरियों का जीवन संवारने में भी लगे हैं। सेना द्वारा संचालित अध्ययन केन्द्रों का ही यह कमाल है कि कश्मीर के युवा प्रतियोगी परीक्षाओं में न केवल अव्वल आ रहे हैं, बल्कि सफलता का परचम लहरा रहे हैं।

    अलगाववादी नेताओं, पाकिस्तान की जी-हजूरी में ब्यानबाजों से पूछा जाए कि देश की गौरव कश्मीर घाटी को अशांत कर वहां के युवाओं और आम नागरिकों के परिवार को सिवाय बर्बादी के उनकी देन क्या है? पाकिस्तान से पैसा लेकर कश्मीर की भावी पीढ़ी को बर्बाद करने वाले इन नेताआेंं के कितने बच्चे घाटी में रह रहे हैं, वहां के स्कूलों में पढ़ रहे हैं,

    पाकिस्तान के रोज सीजफायर कर आग उगलते गोलों-मोर्टारों से दो चार हो रहे हैं। आपके बच्चें, आपको परिवार के सदस्यों, आपके रिश्ते नातेदारों को आगे करके खिलाफत के नारें लगाओ तब कोई बात हो। निहीत स्वार्थों के चलते घाटी के केवल चार जिलों के कारण देश के मुकुट कश्मीर के हालातों को बेकाबू करने में लगे देशद्रोहियों को इन युवाओं से सबक लेना चाहिए कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सेना के सहयोग से अपना भविष्य को संवारने का प्रयास कर रहे हैं।

    सांप्रदायिक असहिष्णुता का हो हल्ला मचाकर देश में नकारात्मक वातावरण बनाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों को समझ जाना चाहिए कि देश की युवा धड़कन अब उनके बहकावे में नहीं आने वाली। युवाओं की परिपक्वता बढ़ती जा रही है।

    पिछले सालों से देश में ही देश-विरोधी नारे लगाने, देश की सरहद की रक्षा करते अलगाववादियों और घुसपैठियों से संघर्ष करते सैनिकों की जगह पत्थरबाजों से सहानुभूति रखने, आत्महत्या तक को शहीद का दर्जा देने, कभी धर्म, कभी बीफ, कभी अन्य तरह से डर दिखाने, सरकार के सार्वजनिक हित के निर्णयों को भी प्रश्नों के घेरे में खड़े करने, संसद में गतिरोध, हत्या-आत्महत्या या साधारण बातों को भी अतिवादी बताकर गाल बजाने वालों से देश आजिज आ चुका है। पिछले दिनों के चुनाव परिणामों से यह साफ हो जाता है कि सरकार के कठोर निर्णयों को आम आदमी पसंद करता है।

    देश के लिए इससे अधिक दुर्भाग्यजनक बात क्या होगी कि देश के सेनाध्यक्ष को गली का गुंडा उस दल के नेता द्वारा कहा जा रहा है, जिस दल ने वर्षों शासन किया। क्या सत्ता ही सबकुछ है? सबसे बड़ी चिंता और निराशा अपने आपको बुद्धिजीवी कहलाने वाले ब्यानवाजों को लेकर है। क्या बुद्धिजीवी होना देश से भी ऊपर हो जाता है? दुर्भाग्य है कि देशहित या देश का सम्मान या देश की मर्यादाओं की रक्षा बुद्धिजीवियों के लिए कोई मायने नहीं रखती। कश्मीर आज कठिन संघर्ष के दौर से गुजर रहा है।

    ऐसे में देश के राजनेताओं, बुद्धिजीवियों का देश के प्रति अधिक दायित्व हो जाता है। सेना के मनोबल को बनाए रखना सबका दायित्व हो जाता है। विरोध के नाम पर विवेक को धकेला जा रहा है। कश्मीरियों के दु:ख-दर्द की साथी सेना पर पत्थरबाजी करने वालों को प्रोत्साहित किया जाना, सेना के खिलाफ आए दिन ब्यान देना कहां कि समझ कही जा सकती है?

    खैर जो भी हो, यह शुभ संकेत है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा में 10वां स्थान प्राप्त करने वाले बिलाल मोहिउद्दीन हो या जम्मू-कश्मीर क्रिकेट टीम के परवेज रसूल, शुभम खजूरिया, मेहराद्दीन वाडू, निशानेबाज चैन सिंह, सब जूनियर यूथ कराटे चैंपियनशीप के स्वर्ण पदक विजेता हासिन मंशूर या सब जूनियर किक बॉक्सिंग वर्ल्ड चैंपियनशीप की स्वर्ण पदक विजेता तजामुल इस्लाम और इन जैसे अन्य कश्मीरी युवा देश का गौरव बढ़ा रहे हैं। घाटी के युवाओं में यह जज्बा पैदा करके ही वहां के युवाआें के भविष्य को संवारा जा सकता है।

    पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घाटी के युवाओं से पत्थर की जगह हुनर को अपनाने का आहवान किया था। आज देश को इसी की आवश्यकता है। वादियों में धरती के साक्षात स्वर्ग के दर्शन करने आने वाले पर्यटकों, पश्मिना शॉल की बेहतरीन कारीगरी, कश्मीर की सेब की मिठास, सूखे मेवों के स्वाद से कश्मीर की कश्मीरियत को बनाए रखा जा सकता है।

    देश में ही देश-विरोधी नारे लगाने, सेना पर पत्थर फैंकने, विदेशी धन के भरोसे युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ कर अपनी रोटियां सेंकने, दूसरों के बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर अधिक कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है, यह सभी को समझ लेना चाहिए।

    -डॉ़ राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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