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    घुसपैठिए रोहिंग्याओं की घर वापसी जरूरी

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    असम में अवैध रूप से रह रहे सात रोहिंग्या घुसपैठियों की वापसी का सिलसिला सरकार का स्वागत योग्य कदम है। सात रोहिंग्याओं को प्रत्यर्पित कर म्यांमार भेजा जाएगा। हालांकि यह संख्या बहुत कम है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के अनुसार ही 14,000 रोहिंग्या भारत में रह रहे हैं। जबकि इनके अनाधिकृत तौर से रहने की संख्या करीब 40,000 है। फिलहाल जिन सात अवैध आव्रजकों को वापस भेजा जाएगा, वे असम के सिलचर जिले के एक बंदीगृह में रह रहे हैं। इन्हें मणिपुर में मोरेह सीमा की पोस्ट पर म्यांमार प्रशासन को सौंपा जाएगा।

    इन घुसपैठियों को म्यांमार के राजनयिकों का काउंसलर एक्सेस दिया गया था। इसी के जरिए इनकी सही पहचान कर घर वापसी हो रही है। इनकी म्यांमार के नागरिक होने की पुष्टि तब हुई, जब इस देश के रखाइन राज्य का प्रमाणिक पता मिला। हालांकि संयुक्त राष्ट्र ने इनकी वापसी पर आपत्त्ति जताई है। वहीं दूसरी तरफ मानवाधिकार हनन का कथित बहाना बनाकर वकील प्रशांत भूषण ने सर्वोच्च न्यायालय में इनके भारत में ही बने रहने के बाबत एक याचिका दायर की है। इस पर फिलहाल सुनवाई नहीं हुई है।

    भारत में गैरकानूनी ढंग से घुसे रोहिंग्या किस हद तक खतरनाक साबित हो रहे हैं, इसका खुलासा अनेक रिपोर्टों में हो चुका है, बावजूद भारत के कथित मानवाधिकारवादी इनके बचाव में बार-बार आगे आ जाते हैं। जबकि दुनिया के सबसे बड़े और प्रमुख मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि म्यांमार से पलायन कर भारत में शरणार्थी बने रोहिंग्या मुसलमानों में से अनेक ऐसे हो सकते हैं, जिन्होंने म्यांमार के अशांत रखाइन प्रांत में हिंदुओं का नरसंहार किया है?

    रोहिग्ंयाओं ने 25 अगस्त 2017 को इस प्रांत के दो ग्रामों में 99 हिंदुओं की निर्मम हत्या कर उन्हें धरती में दफन कर दिया था। रोहिंग्या आतंकियों ने अगस्त 2017 में रखाइन में पुलिस चौकियों के साथ म्यांमार के गैरमुस्लिम बौद्ध और हिंदुओं पर कई जानलेवा हमले किए थे। इस हमले में हजारों बौद्ध और हिंदु मारे गए थे। नतीजतन म्यांमार सेना ने व्यापक स्तर पर आतंकियों के खिलाफ अभियान चलाया। जिसके परिणामस्वरूप करीब 7 लाख रोहिंग्याओं को पलायन करना पड़ा। इनमें से 40,000 से भी ज्यादा भारत में घुसपैठ करके शरण पाने में सफल हो गए, शेष बांग्लादेश चले गए।

    संयुक्त राष्ट्र ने सेना की इस कार्रवाई को जातीय सफाया करार दिया था । सैनिकों पर रोहिंग्याओं की हत्या और उनके गांव नेस्तनाबूद करने के आरोप लगे थे। इसके उलट सेना ने भी रोहिंग्याओं पर ऐसे ही आरोप लगाए थे। इनमें उत्तरी रखाइन में हिंदुओं के कत्लेआम का मामला भी शामिल है। बाद में संगठन की रिपोर्ट से पुष्टि हुई है कि रोहिंग्याओं ने दो ग्रामों मोंगडाव और मंग सेक में 99 हिंदुओं को मार डाला था। इनमें ज्यादातर महिला और बच्चे थे। संगठन को यह जानकारी इन ग्रामों में किसी तरह बचे रह गए आठ हिंदुओं ने दी थी।

    दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने पिछले साल रोहिंग्या मुसलमानों को देश में नहीं रहने देने की नीति पर शीर्ष अदालत में एक हलफनामा देकर साफ कर दिया था कि रोहिंग्या गैर कानूनी गतिविधियों में शामिल हैं। ये अपने साथियों के लिए फर्जी पेनकार्ड, वोटर आईडी और आधार कार्ड उपलब्ध करा रहे हैं। कुछ रोहिंग्या मानव तस्करी में भी शामिल हैं। इन पर इंसानी मांस खाने के भी आरोप हैं। यह मांस खाते हुए ये यूट्यूब पर देखे जा सकते है। देश में करीब 40,000 रोहिंग्या रह रहे हैं, जो सुरक्षा में सेंध लगाने का काम कर रहे हैं। इनमें से कई आतंकवाद में लिप्त हैं।

    इनके पाकिस्तान और आतंकी संगठन आईएस से भी संपर्क है। ये संगठन देश में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं। देश में जो बौद्ध धर्मावलंबी हजारों साल से शांतिपूर्वक रह रहे हैं, उनके लिए भी ये हिंसा का सबब बन सकते हैं। 2015 में बोधगया में हुए बम विस्फोट में पाकिस्तान स्थित आंतकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने रोहिंग्या मुस्लिमों को आर्थिक मदद व विस्फोटक सामग्री देकर इस घटना को अंजाम दिया था। वैसे भी भारत के किसी भी हिस्से में रहने व बसने का मौलिक अधिकार भारतीय नागरिकों को है, घुसपैठियों को नहीं। किसी भी पीड़ित समुदाय के प्रति उदारता मानवीय धर्म है, लेकिन जब घुसपैठिए देश की सुरक्षा और मूल्य भारतीय समुदायों के लिए ही संकट बन जाएं, तो उन्हें खदेड़ा जाना ही बेहतर है।

    गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू ने संसद में जानकारी दी थी, कि सभी राज्यों को रोहिंग्या समेत सभी अवैध शरणार्थियों को वापस भेजने का निर्देश दिया है। सुरक्षा खतरों को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। आशंका जताई गई है कि जम्मू के बाद सबसे ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थी हैदराबाद में रहते हैं। केंद्र और राज्य सरकारें जम्मू-कश्मीर में रह रहे म्यांमार के करीब 15,000 रोहिंग्या मुसलमानों की पहचान करके उन्हें अपने देश वापस भेजने के तरीके तलाश रही है। रोहिंग्या मुसलमान ज्यादातर जम्मू और साम्बा जिलों में रह रहे हैं।

    इसी तरह आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में 3800 रोहिंग्यों के रहने की पहचान हुई है। ये लोग म्यांमार से भारत-बांग्लादेश सीमा, भारत-म्यांमार सीमा या फिर बंगाल की खाड़ी पार करके अवैध तरीके से भारत आए हैं। आंध्र प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के अलावा असम, पश्चिम बंगाल, केरल और उत्तर प्रदेश में कुल मिलाकर लगभग 40,000 रोहिंग्या भारत में रह रहे हैं।

    जम्मू-कश्मीर देश का ऐसा प्रांत है, जहां इन रोहिंग्या मुस्लिमों को वैध नागरिक बनाने के उपाय तत्कालीन महबूबा मुफ्ती सरकार द्वारा दिए गए थे। इसलिए अलगाववादी इनके समर्थन में उतर आए थे। इसी प्रेरणा से श्रीनगर, जबलपुर और लखनऊ में इनके पक्ष में प्रदर्शन भी हुए थे। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को प्रस्तुत शपथ-पत्र में साफ कहा है कि रोहिंग्या शरणार्थियों को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत देश में कहीं भी आने-जाने, बसने जैसे मूलभूत अधिकार नहीं दिए जा सकते हैं। ये अधिकार सिर्फ देश के नागरिकों को ही प्राप्त हैं। इन अधिकारों के संरक्षण की मांग को लेकर रोहिंग्या सुप्रीम कोर्ट में गुहार भी नहीं लगा सकते, क्योंकि वे इसके दायरे में नहीं आते हैं। जो व्यक्ति देश का नागरिक नहीं है, वह या उसके हिमायती देश की अदालत से शरण कैसे मांग सकता है ?

    2012 से देश में इन्होंने अवैध तरीकों से प्रवेश किया था। कई ने पैन कार्ड व वोटर आईडी भी बनवा लिए। इसी पहलू के बूते पांच साल से भी ज्यादा वर्षों से रह रहे शरणार्थियों ने भारत सरकार एवं सुप्रीम कोर्ट से मानवीय आधार पर वापस भेजने की योजना को टालने का अनुरोध किया है। ऐसी परिस्थिति में संयुक्त राष्टÑ और मानवाधिकार संगठन भारत पर दबाव डाल रहे हैं कि वह इन मुसलमानों को योजनाबद्ध तरीके से भारत में बसाने का काम करे।

    प्रमोद भार्गव

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