दूध में मिश्री की तरह घुल-मिलकर रहें सब

Supreme Court sachkahoon

भारत बहुत महान देश रहा है चूंकि इसके लोगों ने इसे बहुुत महान बनाया था, भारत गुलाम दीन-हीन भी रहा क्योंकि उस दौर के भारतीय ऐसे रहे होंगे। भारत को अभी भी महान बनने से कोई नहीं रोक सकता। अगर इस देश में कुछ चालाक, स्वार्थी एवं धर्म की वेशभूषा में घूम रहे अधार्मिक लोगों को परख लिया जाए और उन्हें काबू कर लिया जाए। नुपूर शर्मा नामी महिला नेता की वजह से फैले तनाव से एक राजस्थान से व दूसरे महाराष्टÑ से दो आदमियों की जान जा चुकी है। जान लेने वालों के तरीके से देश के कई शहरों में दहशत का माहौल है। दहशत इसलिए कि पता नहीं कब दंगा भड़क जाए और लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाएं। जिनकी भावनाएं आहत हुई हैं उन्होंने देश भर में नुपूर शर्मा के विरुद्ध कई जगहों पर पुलिस प्राथमिकी दर्ज करवाई है, इस सबके बावजूद नुपूर र्श्मा के ऊपर कोई असर नहीं और वह सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई।

भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने देश को खतरे में देखकर न केवल नुपूर को डांटा बल्कि उसकी हैसियत भी याद दिलाई। दरअसल, धर्म कोई भी बुरा या निंदनीय नहीं है परन्तु इसे मजहबी नफरतों में डूबे नुपूर व गौस मोहम्मद, रियाज अत्तारी जैसे लोगों ने बुरा बनाया हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में साफ कहा कि नुपूर जैसे लोग खुद भी धार्मिक नहीं हैं, धर्म ऐसे लोगों के लिए सस्ती लोकप्रियता पाने का जरिया है, नफरत फैलाने का जरिया मात्र है। जो धर्म को मानते हैं वह अपने धर्म के जितना ही दूसरे धर्म का भी सम्मान करते हैं। अफसोस इस बात का है कि आज भी देश में धर्मों की ठेकेदारी करने वालों के पीछे हुजूम चल रहा है। जबकि देश समाज की हजारों-हजार समस्याएं हैं जिनसे सभी धर्मों के लोग परेशान हैं। जरूरत है कि कट्टरता व हिंसा की बात करने वाली शिक्षाओं को नए दौर के अनुसार किनारे किया जाए।

पिछले कुछ सालों से केसवाजी, लड़ाई-झगड़े में समर्थन जुटाने के लिए धर्म का इस्तेमाल बेजा स्तर तक बढ़ चुका है। इसे प्रत्येक धर्म के प्रमुख जनों द्वारा रोका जाना चाहिए। जैसे कि उदयपुर की घटना के बाद बहुत से मुस्लिम बुद्धिजीवियों, धर्मधिकारियों ने अपने स्तर पर लोगों से शांति बनाए रखने की अपील कर साबित किया है अन्यथा नुपूर व गौस मोहम्मद ने जो काम कर दिया है उससे अब तक हजारों बेकसूर मारे जा चुके होते व देश का करोड़ों-अरबों का नुक्सान हो गया होता। इस दौर में धार्मिक नफरत फैलाने वालों जितना ही मीडिया का एक वर्ग भी जिम्मेवार है जो अपने पेशेवर काम के लिए लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करने वालों को मंच मुहैया करवाता है और उससे उठने वाले शोर के मजे लेता है।

नुपूर शर्मा के साथ चली डिबेट से पहले कुछ मुस्लिमों द्वारा शिवलिंग पर नफरती टीका टिप्पणियों को भी नहीं किया जाना चाहिए था। सरकार को तत्काल नफरत फैलाने की ताक में बोल रहे लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए थी। परन्तु देश में बहुत बार देखा गया है कि जब जरूरत होती है तब कार्रवाई नहीं होती जब आग फैल जाती है तब फिर कसूरवार लोगों के साथ-साथ बेकसूरों को भी सरकारी उत्पीड़न का शिकार बनाया जाता है। यहां अगर सरकार शिकार बनाएगी तो उससे बचने के रास्ते न्यायलय के रूप में देशवासियों के पास हैं, लेकिन धर्म का ठेका लेने वालों से बचना होगा जिसके लिए देश में धार्मिक सुधार की लहर चलाए जाने की आवश्यकता है ताकि सभी धर्मों को मानने वाले दूध में मिश्री की तरह मिलकर रहें इसके लिए जरूरत बस इतनी है कि नफरत की आग बुझानी होगी व धर्मों में दिए शांति, समृद्धि, अध्यात्मिक उन्नति के संदेशों को आत्मसात करना होगा।

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