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    Lohri festival : जानें क्यों जलाई जाती है आग और कौन था ‘दुल्ला भट्टी’

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    नवविवाहित दंपति और नवजात शिशु के लिए के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है लोहड़ी पर्व | Lohri festival

    Edited By Vijay Sharma

    सच कहूँ डेस्क। सबसे पहले तो सच कहूँ परिवार अपने सभी पाठकों को लोहड़ी पर्व (Lohri festival ) की शुभकामनाएं देता है। सच कहूँ डेस्क आज पाठकों को  इस पर्व की महत्वता और इतिहास क्या है इसके बारे में बतायेगा। लोहड़ी पंजाब और हरियाणा का प्रमुख त्योहार है। हर साल 13 जनवरी को देशभर में धूमधाम से लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है। यह फसल से जुड़ा हुआ त्योहार है और इस दिन सिख लोग फसल पकने की खुशी मनाते हैं। यह त्योहार नवविवाहित दंपति और घर आए नवजात शिशु के लिए के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

    इस दिन शाम को लकड़ियों की ढेरी पर लोहड़ी जलाई जाती है। पंजाब, हरियाणा और हिमाचल में नववधू और बच्चे की पहली लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इस दिन अग्नि के चारों ओर खड़े होकर लोकगीत गाए जाते हैं और नए धान के साथ खील, मक्का, गुड़, रेवड़ी और मूंगफली अग्नि में अर्पित की जाती हैं। अग्नि के चारों तरफ परिक्रमा भी की जाती है।

    दुल्ला भट्टी से जुड़ी ये लोककथा है प्रचलित

    वैसे तो लोहड़ी को लेकर दक्ष और भगवान कृष्ण से जुड़ी मान्यताएं भी प्रचलित हैं। लेकिन एक और मान्यता है जो अकबर के शासन काल के दौरान की है। कहा जाता है कि अकबर के शासन काल में दुल्ला भट्टी नाम का एक शख्स था जो कि पंजाब प्रांत में रहता था। दुल्ला भट्टी बहादुर योद्धा था। संदलबार नाम की एक जगह थी जहां गरीब घर की लड़कियों को अमीरों को बेच दिया जाता था। यह जगह अब पाकिस्तान में है। यहां एक किसान सुंदरदास रहता था जिसकी दो बेटियां सुंदरी और मुंदरी थीं। गांव का ठेकेदार जो कि मुगल था, सुंदरदास को खुद से बेटियों की शादी कराने के लिए धमाकता है। जब यह बात दुल्ला भट्टी को पता चली तो उसने ठेकेदार के खेत जला दिए और सुंदरी और मुंदरी की शादियां वहां करवाई जहां उनका पिता चाहता था। तभी से लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है।

    लोहड़ी पर क्यों जलाते हैं आग ?

    • लोहड़ी के दिन आग जलाने को लेकर माना जाता है कि यह आग्नि राजा दक्ष की पुत्री सती की याद में जलाई जाती है।
    • एक बार राजा दक्ष ने यज्ञ करवाया और इसमें अपने दामाद शिव और पुत्री सती को आमंत्रित नहीं किया।
    • निराश होकर सती ने पिता से पूछा कि उन्हें और उनके पति को इस यज्ञ में निमंत्रण क्यों नहीं दिया गया।
    • इस बात पर अहंकारी राजा दक्ष ने सती और भगवान शिव की बहुत निंदा की।
    • इससे सती बहुत आहत हुईं और क्रोधित होकर खूब रोईं।
    • उनसे अपने पति का अपमान देखा नहीं गया और उन्होंने उसी यज्ञ में खुद को भस्म कर लिया।
    • सती के मृत्यु का समाचार सुन खुद भगवान शिव ने वीरभद्र को उत्पन्न कर उसके द्वारा यज्ञ का विध्वंस करा दिया।
    • तब से माता सती की याद में आग जलाने की परंपरा है।

    पौराणिक कथा अनुसार

    लोहड़ी का पावन लोक गीत

    सुंदर मुंदरिये हो, तेरा कौन विचारा हो,
    दुल्ला भट्ठी वाला हो, दुल्ले दी धी व्याही हो,
    सेर शक्कर पाई हो, कुड़ी दे जेबे पाई हो,
    कुड़ी दा लाल पटाका हो, कुड़ी दा सालू पाटा हो,
    सालू कौन समेटे हो, चाचे चूरी कुट्टी हो,
    जमीदारां लुट्टी हो, जमीदारां सदाए हो,
    गिन-गिन पोले लाए हो, इक पोला घट गया,
    जमींदार वोहटी ले के नस गया, इक पोला होर आया,
    जमींदार वोहटी ले के दौड़ आया,
    सिपाही फेर के लै गया, सिपाही नूं मारी इट्ट, भावें रो ते भावें पिट्ट,
    साहनूं दे लोहड़ी, तेरी जीवे जोड़ी..

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