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    चुनावों में हो रहा बेतहाशा खर्च कितना सही

    Lok Sabha, Elections

    इस बार के लोकसभा चुनाव की खासियत यह है कि यह सबसे महंगे चुनाव होंगे। वैसे भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में चुनाव संपन्न करवाना अपने आप में एक चुनौती है। विशाल भूखंड और विशाल जनसंख्या को देखते हुए तय समय में शांतिपूर्ण,पारदर्शी और व्यवस्थित मतदान करवाना एक कठिन कार्य है। बड़ी बात यह है कि हर बार ये चुनाव ना केवल व्यवस्था की दृष्टि से बल्कि खर्च की दृष्टि से भी चुनौतीपूर्ण एवं महंगे साबित होते हैं। अगर बात करे साल 2019 के लोकसभा चुनाव कि तो, इस आगामी चुनाव का सबसे बड़ा तथ्य यह है कि यह लोकसभा चुनाव दलों तथा चुनाव आयोग के तमाम खर्च के लिहाज से सबसे महंगा चुनाव होने जा रहा है।

    चुनाव विशेषज्ञों के मुताबिक आगामी आम चुनाव ना केवल भारत के इतिहास में बल्कि दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश के सबसे खचीर्ले चुनाव में से एक होगा। एक अनुमान के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनाव में तमाम चुनावी कार्यों में करीब 35547 करोड रुपए खर्च हुए थे। लेकिन आगामी 2019 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा 50 हजार करोड़ तक पहुंचने की पूरी संभावना है। इस अनुमानित खर्च में से करीब ?10 करोड़ सरकारी खर्च होंगे, जबकि चुनाव आयोग के करीबन ?13 करोड़ खर्च होंगे। इसके अलावा सात सौ करोड़ विभिन्न केंद्रीय और सरकारी एजेंसियों पर खर्च किए जाएंगे।

    साथ ही साथ विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा अपने कोष से 1700 करोड़ रुपए खर्च किए जाने का अनुमान है। अगर सिर्फ सरकारी खर्च की बात करे तो 2009 के लोकसभा चुनावों में 1483 करोड़ और 2014 के लोकसभा चुनावों में ? 3870 करोड़ रुपए खर्च किए गए। भारत में इस समय 90 करोड मतदाता पंजीकृत है। अगर प्रति व्यक्ति के हिसाब से भी खर्च का हिसाब लगाया जाए तो यह भी एक बहुत बड़ी राशि होगी। इस तरह इस बार खर्च के मामले में सभी रिकॉर्ड टूटते नजर आ रहे हैं। इससे पहले 2014 का लोकसभा चुनाव देश का अब तक का सबसे महंगा चुनाव था। हर चुनाव से पहले चुनाव आयोग एक संभावित बजट बनाता है।

    उसमें अगर लोकसभा चुनाव हो तो केंद्र सरकार और अगर विधानसभा चुनाव हो तो फिर उसका खर्च संबंधित राज्य सरकारें वहन करती हैं। पैसे का इंतजाम टैक्स से मिलने वाली राशि से किया जाता है। वहीं प्रत्येक उम्मीदवार चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार बनी खर्च सीमा के भीतर ही व्यय कर सकता है। इसके अलावा पार्टियों के खर्च राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे और डोनेशन से प्राप्त धन से किए जाते हैं जिनकी सीमा नहीं है। चुनाव में तमाम खर्चे बढ़ने के विभिन्न कारण हैं। हालांकि देश में चुनाव प्रचार अभियानों में बेतहाशा खर्च और धनबल के दुरुपयोग को लेकर हमेशा प्रश्न उठाए जाते रहे हैं क्योंकि इससे राजनीतिक असमानता पैदा होती है। इसलिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए चुनाव खर्च की सीमा तय की गई है। इस वक्त चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों की खर्च सीमा प्रति उम्मीदवार 54 लाख से 70 लाख तक है। उसका खर्च उस उम्मीदवार के राज्य पर भी निर्भर करता है।

    हवाई यात्राएं और विज्ञापनों की तादाद बढ़ने लगी है और महंगाई भी बढ़ी है। खर्चे बढ़ने का एक कारण यह भी है कि उम्मीदवारों के लिए तो खर्च की अधिकतम सीमा तय है लेकिन दलों के लिए खर्च की कोई सीमा नहीं है। इस मुद्दे पर चुनाव आयोग ने विधि आयोग से दलों की चुनावी चंदे को लेकर जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 और चुनावी नियमों से संबंधित संहिता में संशोधन संबंधी सिफारिश की मांग की थी। संस्था ने इसके लिए फामूर्ला सुझाया था। इसके अनुसार एक राजनीतिक पार्टी जितने उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारती है उनके लिए सभी उम्मीदवारों की अधिकतम कुल खर्च राशि से पार्टी का कुल खर्च अधिक नहीं होना चाहिए यानी 70 लाख प्रति सीट के हिसाब से चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों के कुल खर्च की रकम से पार्टी का खर्च अधिक नहीं होना चाहिए। इस बात पर अभी कोई फैसला नहीं किया गया है।

    हालांकि प्रत्याशियों के लिए चुनावी खर्च पर आयोग का शिकंजा है। सभी प्रत्याशियों को लिखित में चुनावी खर्च का पूरा ब्यौरा देना होता है जो नामांकन के दिन से ही प्रभावी होता है। उन्हें अलग बैंक खाता खोलना होता है जिसमें 70 लाख तक की सीमा तक रुपए व्यय करने होते हैं। तय सीमा के भीतर चुनावी खर्च जमा न करवाने पर नामांकन रद्द किया जा सकता है। उम्मीदवारों के खर्च पर नजर रखने के लिए चुनाव आयोग इनकम टैक्स डिपार्टमेंट, प्रवर्तन निदेशालय आदि जांच एजेंसियों की मदद लेता है। यह एजेंसियां इस बात की जांच करती है कि चुनाव के दौरान विदेशी मुद्रा, हवाला और काले धन का इस्तेमाल तो नहीं हो रहा। लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग सोशल मीडिया कंपनियों गूगल,फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब आदि पर कड़ी नजर रखेगा। सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए कोड आॅफ कंडक्ट जारी किया गया है।

    नामांकन दाखिल करने से पहले उम्मीदवारों को सोशल मीडिया अकाउंट की जानकारी आयोग को देनी होगी। चुनाव आयोग की पूरी कवायद चुनाव प्रक्रिया को साफ सुथरा बनाने के लिए है और चुनाव आयोग की सख्ती का असर भी देखने में मिलता है। कई विधानसभा और लोकसभा चुनाव में आयोग ने ऐसे करोड़ों रुपए जब्त किए है जिनका हिसाब-किताब उम्मीदवारों के पास नहीं था। हालांकि लोकसभा चुनाव का दायरा विस्तृत होने से चुनाव आयोग की योजना भी बड़ी होगी। सक्रिय चुनाव आयोग गैरकानूनी खर्च पर लगाम जरूर लगा पाएगा। निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव के लिए आयोग की सक्रियता हमेशा सराहनीय रही है। लेकिन अब मुद्दा यह है कि लोकतांत्रिक पर्व की जगह धन तंत्र मजबूत होता जा रहा है। ऐसे में जरूरत है लोकतांत्रिक व्यवस्था की पवित्रता को बचाए रखने की।

    एक जरूरत है चुनाव सुधार किए जाने की। लेकिन प्रश्न यह भी है कि चुनाव सुधार करने वालों को ही जब एतराज ना हो तो फिर किसकी मजाल। देश में सभी को मूलभूत सुविधाओं की आज भी महती जरूरत है जैसे मैं खचीर्ले चुनाव कदापि जायज नहीं कहे जा सकते। आम जनता के कर से फिजूलखर्ची आम लोगों पर बोझ डालने वाला कदम है। चुनावों को सस्ता बनाने की कवायद तेज होनी चाहिए। राजनीति को पैसे के खेल से विमुक्त करने की जरूरत है ताकि लोकतंत्र को बचाया जा सके।

    नरपत दान चारण

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