अयोध्या पर पाक की बदनियत

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पाकिस्तान ने भारतीय सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या मामले पर सुनाए निर्णय को यूनेस्को की धार्मिक स्वतंत्रता के मूल्यों के विपरीत बताकर एक बार फिर संकीर्ण सोच का प्रमाण दिया है। पाकिस्तान की पहली गलती यह है कि उसने संयुक्त राष्ट्र के संविधान और परंपराओं का पालन नहीं किया। संयुक्त राष्ट्र के संविधान के अनुसार कोई भी देश दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दे सकता। अयोध्या मामले में पाकिस्तान न तो कोई पक्ष था और न ही इस मामले का पाकिस्तान से कोई ताल्लुकात था।

अयोध्या मामले से संबंधित हिंदू-मुस्लिम पक्ष भारतीय थे और दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में अपना-अपना मुकदमा लड़ा, जो इस बात का प्रमाण है कि पैरवी करने वाले वकीलों को भारतीय संविधान व न्याय प्रणाली में पूर्ण विश्वास है। मुस्लिम पक्षों ने कभी भी इस मामले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ले जाने की बात नहीं की, इसीलिए भारत के किसी न्यायालय में चल रहे किसी मामले का दर्द पाकिस्तान को क्यों हुआ?, यह समझ से बाहर है। यूं भी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद का अंत हो गया है।

मामले के मुख्य पैरवीकार सुन्नी वक्फ बोर्ड ने न्यायालय के निर्णय के खिलाफ याचिका न दायर करने की बात भी कही है, जिससे स्पष्ट है कि सभी पक्षों ने न्यायालय को ही सर्वोपरि माना है। पाकिस्तान को यह बात याद होगी कि भारत के मुस्लमानों ने विवाद सुलझने की खुशी भी मनाई है और कई मुस्लिम संस्थाओं ने मंदिर निर्माण में सहयोग करने की भी पेशकश की है। भारत के हिंदू-मुस्लमानों ने इस निर्णय के बाद जो सौहार्द दिखाया है, वह काबिले-तारीफ है, अयोध्या में मंदिर ही नहीं मस्जिद भी बनेगी जिसके लिए जमीन भी सरकार देगी। बेहतर हो यदि पाकिस्तान अपने देश के अल्पसंख्यक लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता, सुरक्षा व मानवाधिकारों की सलामती को यकीनी बनाए।

 

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