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Saturday, February 21, 2026
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    बंजर भूमि में बहार छा गई, सच्ची सरकार आ गई …

    Shah Mastana Ji
    Shah Mastana Ji बंजर भूमि में बहार छा गई, सच्ची सरकार आ गई ...

    सच्ची सरकार आ गई
    भाईचारा प्रेम जब मिटने लगा
    हर रिश्ते में दरार आ गई ,
    तरस खाकर करने उधार रूहों का
    सच्ची सरकार आ गई ।
    कार्तिक की पूर्णमासी ,
    हर रूह के मस्तक पर उज्जास था ।
    सुखी कलियां जी उठी ,
    रूहानियत के बादशाह का आगमन बड़ा खास था उनके दर से कोई खाली जाए ।
    न किसी की भूख बर्दाश्त थी ,
    हर मस्तक पर रौनक और मुस्कान हो ।
    केवल उनकी यही अरदास थी ,
    साधुओं को मिठाई खिलाकर ।
    उनकी भूख मिटाते थे ,
    मेहनत हक हलाल का खाना खुद अपनाते ,
    और सिखाते थे ।
    जी उठा आलम सारा ,
    बंजर भूमि में बहार छा गई ।
    सच्ची सरकार आ गई ,
    सादगी के पुंज , प्रेम प्रतीक ।
    और महानों के महान थे ,
    कण – कण , ब्रह्मण्ड उनके वश में और दुनिया के अरमान थे ।
    प्यासे की प्यास मिटी और भूखों का सहारा हुआ नंगे को कपड़ा , तंग को धन ,
    भव में डूबते को किनारा हुआ ।
    हर बुराई मिटने लगी ,
    अंधेरे में उजाला हुआ ,
    रूहानियात की महक जो छा गई ।
    सच्ची सरकार आ गई ।।
    जन्म मरण के दुख फिर मिटाने लगे ,
    देकर नाम का वरदान , शराब के गंदे नशों से
    मुक्त कराने लगे ।
    काल हुआ चिड़चिड़ा क्योंकि ,
    रूहों को छुड़ाने की मर्ज उसे दुखा गई
    सच्ची सरकार आ गई ।
    भाईचारा प्रेम की लहर चली ,
    अच्छाइयों का पौधा खिल उठा
    काल बड़ा छटपटाया ,
    साम्राज्य उसका हिल उठा ।
    जब सचखंड ले जाने को उनके ,
    मसीहा की पतवार आ गई ।
    सच्ची सरकार आ गई ।।
    तरस खाकर करने उधार रूहों का
    सच्ची सरकार आ गई ।।

    लेखक – कुलदीप स्वतंत्र