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Tuesday, February 3, 2026
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    ब्रिटेन में आलू, टमाटर, खीरे का संकट

    (सच कहूँ न्यूज) अंग्रेजी हुकूमत से आजादी मिलने बाद जहां सात दशक में ही भारत उसको पीछे छोड़कर दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती इकोनॉमी बनकर उभर रहा है, वहीं जिन अंग्रजों के राज में कभी सूरज नहीं डूबता था, उनके देश में अर्थव्यवस्था में 300 साल की सबसे बड़ी गिरावट आई है। वहां सब्जियों का संकट खड़ा हो गया है। सुपर मार्केट के शेल्फ खाली पड़े हैं और उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही हैं। फिलहाल महंगाई चरम पर है। आम लोगों की बात छोड़िए, टीचर्स, स्वास्थ्य कर्मी और पेंशनधारी भी अपने खाने का खर्च नहीं उठा पा रहे और इनको भी फूड बैंक पर निर्भर होना पड़ रहा है। यहां के हालत की तुलना पाकिस्तान से की जा रही है।

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    ब्रिटेन में सुपर मार्केट में राशनिंग करनी पड़ रही है यानी पैसे देने के बावजूद कोई भी व्यक्ति दो से ज्यादा आलू, टमाटर, खीरा या अन्य सब्जी नहीं खरीद सकता। यह ब्रिटेन के किसी एक सुपर मार्केट की बात नहीं है, बल्कि चार सबसे बड़े सुपर मार्केट मॉरिसन, अस्दा, एल्डि और टेस्को ने ताजा फल और सब्जियां लेने की सीमा तय कर दी है। पूर्वी लंदन, लिवरपूल और ब्रिटेन के कई हिस्सों में दुकानों से पहले ही फल और सब्जियां गायब हैं।

    दरअसल हुआ यह कि ब्रिटेन के किसानों ने टमाटर और आलू की उपज पर ध्यान नहीं दिया और जहां से ये चीजें आयात की जाती थीं। वे देश भी संकट से जूझ रहे हैं या उत्पादन ज्यादा न होने के कारण ब्रिटेन को देना नहीं चाहते। सर्दियों में ब्रिटेन खीरे और टमाटर जैसी लगभग 90% वस्तुओं का दूसरे देशों से आयात करता है। इन महीनों में ब्रिटेन केवल 5% टमाटर और 10% सलाद वाले पत्तों का उत्पादन करता है।

    ब्रिटिश ग्रोअर्स एसोसिएशन के प्रमुख जैक वार्ड कहते हैं कि लागत बढ़ने और उपज का पर्याप्त पैसा नहीं मिलने के कारण नुक्सान के डर से किसानों का फल-सब्जी उगाने के प्रति रुझान काफी कम हो गया है। सरकार रॉयल बोटेनिकल गार्डन को सब्जी उत्पादकों की तुलना में ज्यादा सुविधा दे रही है। वहां काम आने वाली बिजली का खर्च तो सरकार उठाती है, लेकिन किसानों को कोई राहत नहीं दी जाती। ऐसे में सरकार को भी सुपर मार्केट्स के खाली शेल्फ देखने की आदत डाल लेनी चाहिए। जानकार बताते हैं कि मोरक्को अपनी खाद्य जरूरतों को देखते हुए टमाटर, प्याज और आलू के निर्यात में कमी ला सकता है और समस्या और बढ़ने की आशंका है।

    पिछले कुछ सालों से ब्रिटेन आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। छह साल में पांच प्रधानमंत्री बने हैं। 2016 में ब्रेग्जिट पर जनमतसंग्रह के समय से ही कारोबार में निवेश भी स्थिर हो गया। इससे ग्रोथ और कमजोर हुई है। 2019 में हुए ब्रेग्जिट का देश के कारोबार पर बहुत खराब असर हुआ। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्रेग्जिट से ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को सालाना 100 अरब पाउंड का नुक्सान हुआ। यदि ब्रिटेन यूरोपीय संघ का हिस्सा रहा होता तो शायद उसकी अर्थव्यवस्था में चार फीसदी कम गिरावट आती। दरअसल यूरोपीय संघ दुनिया का सबसे अमीर क्षेत्र है और ब्रेग्जिट के कारण इस ग्रुप के साथ व्यापार और मुश्किल हो गया। लिहाजा इसने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था का आगे बढ़ना मुश्किल कर दिया।

    ब्रिटिश इतिहास में सबसे कम अवधि तक प्रधानमंत्री के रूप में काम करने वाली लिज ट्रस तक अपने उत्तराधिकारी ऋषि सुनक के खिलाफ मोर्चा खोल चुकी है। द संडे टेलीग्राफ अखबार में एक लेख में उन्होंने लिखा- वह खुद प्रधानमंत्री के रूप में चीजों को बदलना चाहती थीं लेकिन राजनीतिक समर्थन की कमी के साथ-साथ एक शक्तिशाली आर्थिक प्रतिष्ठान द्वारा मुझे अपनी नीतियों को लागू करने का मौका नहीं दिया गया। ट्रस ने कहा कि 45 बिलियन पाउंड के अनफंडेड मिनी-बजट के बाद ब्रिटेन में आर्थिक संकट आया, लेकिन अब सुनक के कार्यकाल में देश मंदी की चपेट में आ गया है।

    यह बात और है कि ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्रियों बोरिस जॉनसन और लिज ट्रस के कार्यकाल में कीमतें आसमान को छूने लगी थी। जीवन यापन का खर्च बढ़ता गया। लिज ट्रस की आर्थिक नीतियां विफल रहीं। टैक्स कटौती के फैसले से न सिर्फ पाउंड बल्कि बान्ड मार्किट प्रभावित हुई और ब्याज दरों में बढ़ोतरी होती गई। अर्थव्यवस्था लगातार सिकुड़ती गई और उत्पादन और सेवाओं दोनों में गिरावट आई। जीडीपी में गिरावट ने भी कारोबारियों की चिंताओं को बढ़ा दिया। सुनक को आर्थिक मामलों की अच्छी समझ वाला माना जाता है। लेकिन नया साल शुरू होते ही उनके सामने चुनौतियां ही चुनौतियां खड़ी हो गईं। अब जब कि देश की अर्थव्यवस्था संकट में है और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी इस साल मंदी के संकेत दिए हैं। इससे देश को उबारना सुनक सरकार के लिए बड़ा टास्क है।
    राजेश जैन लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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